मुंबई में कोरोना के मरीज पर प्लाज्मा थेरेपी का किया गया सफल परीक्षण

मुंबई। कोरोना वायरस के इलाज के लिए हर संभव प्रयास किए जा रहे हैं। इसके टीका बनाने के लिए पूरी दुनिया शोध कर रही है। लेकिन फिलहाल कोई भी देश कोरोना का टीका अभी तक नहीं ढूंढ सका है। हालांकि इसके इलाज के लिए प्लाज्मा थेरेपी का इस्तेमाल किया जा रहा है, जिसमे कोरोना संक्रमित मरीज जो ठीक हो चुका है, उसके रक्त के प्लाज्मा को कोरोना पॉजिटिव मरीज के भीतर डाला जाता है, जिससे उसकी रोग प्रतिरोधक क्षमता यानि एंटीडोट बढ़ जाती है और उसे कोरोना वायरस से लड़ने की ताकत मिलती है। महाराष्ट्र में भी प्लाज्मा थेरेपी का पहला परीक्षण सफल रहा है।

दूसरा परीक्षण जारी

दूसरा परीक्षण जारी

महाराष्ट्र के स्वास्थ्य मंत्री राजेश तोपे ने कहा कि कोविड-19 के मरीज पर प्लाज्मा थेरेपी का पहला परीक्षण सफल रहा है। मुंबई के लीलावती अस्पताल में कोरोना वायरस से संक्रमित मरीज पर इसका परीक्षण किया गया था। हम अब दूसरा परीक्षण मुंबई के बीवाईएल नायर अस्पताल में मरीज कर रहे हैं। हमे उम्मीद है कि यह भी सफल होगा। बता दें कि इससे पहले दिल्ली में भी इस प्लाज्मा थेरेपी का मरीजों पर परीक्षण किया गया, जिसमे से दो मरीजों को इसका लाभ भी मिला था। लेकिन केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय की ओर से प्लाज्मा थेरेपी को लेकर कहा गया है कि इस बात के भी कोई साक्ष्य नहीं हैं कि इससे कोरोना का इलाज किया जा सकता है।

क्या कहना है कि केंद्र सरकार का प्लाज्मा थेरेपी पर

क्या कहना है कि केंद्र सरकार का प्लाज्मा थेरेपी पर

स्वास्थ्य मंत्रालय के संयुक्त सचिव लव अग्रवाल ने कहा है कि प्लाज्मा थेरेपी विधि को लेकर प्रयोग जारी है, हालांकि इस बात का कोई सबूत नहीं है कि इसे उपचार के रूप में इस्तेमाल किया जा सकता है। ये कितनी प्रभावी कोरोना के खिलाफ होगी, इसके लिए ICMR बड़े स्तर पर अध्ययन कर रहा है। हालांकि उन्होंने यह साफ किया है कि प्लाज्मा थेरेपी को कोरोना के इलाज के तौर पर इस्तेमाल किया जा सके, अभी ऐसा कोई साक्ष्य नहीं है।

क्या है दावा

क्या है दावा

दावा किया जा रहा है कि कोरोना संक्रमण से पूरी तरह ठीक हुए लोगों के खून में एंटीबॉडीज बन जाती हैं, जो उसे संक्रमण को मात देने में मदद करती हैं। प्लाज्मा थैरेपी में यही एंटीबॉडीज, प्लाज्मा डोनर यानी संक्रमण को मात दे चुके व्यक्ति के खून से निकालकर संक्रमित व्यक्ति के शरीर में डाला जाता है। डोनर और संक्रमित का ब्लड ग्रुप एक होना चाहिए।

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