इन दो घटनाओं से मुलायम सिंह यादव पहचाने जाने लगे दबंग नेता के रूप में, जब पुलिस इंस्पेक्टर को दी थी पटखनी

नई दिल्ली, 22 नवंबर। समाजवादी पार्टी के संरक्षक और उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री मुलायम सिंह यादव का आज जन्मदिन है। मुलायम सिंह यादव आज 82 साल के हो गए हैं। देश के तमाम दिग्गज नेताओं ने मुलायम सिंह यादव को जन्मदिन की बधाई दी है। यूपी की सियासत से लेकर केंद्र में रक्षा मंत्री के पद तक मुलायम सिंह यादव का राजीतिक सफर बहुत लंबा रहा है। भले ही मुलायम सिंह यादव अब स्वास्थ्य संबंधी दिक्कतों की वजह से राजनीति से दूर हैं, लेकिन वो यूपी के साथ-साथ देश की सियासत के एक मंझे हुए खिलाड़ी माने जाते हैं और यही वजह है कि देश का बड़े से बड़ा नेता आज भी मुलायम सिंह यादव के आगे नतमस्तक होता है।

मुलायम के जन्मदिन के मौके पर आज हम आपको उनके जीवन से जुड़ी दो बड़ी घटनाओं के बारे में बताते हैं, जिसकी वजह से उनकी छवि एक दबंग नेता के रूप में बनी थी।

मुलायम की दबंगई की पहली घटना

मुलायम की दबंगई की पहली घटना

- पहली घटना है साल 1960 की। ये वो वक्त था, जब मुलायम सिंह यादव पहलवानी किया करते थे और शायद यही वजह है कि मुलायम सिंह यादव आज 82 वर्ष के होने के बाद भी चलने-फिरने में पूरी तरह सक्षम हैं। अब वापस उस घटना पर आते हैं, जब मुलायम सिंह ने पुलिस इंस्पेक्टर को उठाकर पटक दिया था। दरअसल, मैनपुरी के करहल में एक कवि सम्मेलन चल रहा था। दर्शकों की यहां बहुत भीड़ थी और इस सम्मेलन में मशहूर कवि दामोदर स्वरूप 'विद्रोही' भी मौजूद थे।

- दामोदर स्वरूप ने जैसे ही सम्मेलन के मंच पर अपनी लिखी हुई कविता 'दिल्ली की गद्दी सावधान' को पढ़ना शुरू किया तो एक पुलिस इंस्पेक्टर ने उस कवि को कविता पढ़ने से रोका। साथ ही मंच से डांटकर भगा दिया। पुलिसवाले ने उस वक्त कहा था कि आप सरकार के विरोध में ऐसी कविता नहीं पढ़ सकते। ये देख मुलायम सिंह यादव आगबबूला हो गए और तेजी से भागते हुए मंच की तरफ आए और उन्होंने पुलिस इंस्पेक्टर को उठाकर मंच पर पटक दिया।

- आपको जानकर हैरानी होगी कि जब मुलायम सिंह यादव मुख्यमंत्री बने तो उन्होंने कवि दामोदर स्वरूप 'विद्रोही' को उत्तर प्रदेश हिंदी संस्थान के साहित्य भूषण सम्मान से नवाजा।

मुलायम की दबंगई की दूसरी घटना

मुलायम की दबंगई की दूसरी घटना

- ये बात साल 1990 की है, जब उत्तर प्रदेश में राम मंदिर आंदोलन अपने चरम पर था। वैसे तो राम मंदिर आंदोलन की शुरुआत 1986 से हो गई थी, लेकिन लालकृष्ण आडवाणी जैसे नेताओं के नेतृत्व के बाद इस आंदोलन को और गति मिली और 1990 में तो आंदोलन अयोध्या में विवादित जमीन तक पहुंच गया था। विवादित जमीन पर स्थित मस्जिद को गिराए जाने की अटकलें उस वक्त अयोध्या ही नहीं बल्कि पूरे देश के अंदर जोरों पर थी। मुलायम सिंह यादव उस वक्त प्रदेश के मुख्यमंत्री थे।

15-20 कारसेवकों की हुई थी गोलीबारी में मौत

15-20 कारसेवकों की हुई थी गोलीबारी में मौत

- अयोध्या में कारसेवकों की भारी भीड़ जुट गई थी और लालकृष्ण आडवाणी उस भीड़ का नेतृत्व करने के लिए आने वाले थे, लेकिन आडवाणी जी को लालू प्रसाद यादव ने बिहार में ही रोक लिया था। इसके बाद तनाव की स्थिति पैदा ना हो तो मुलायम सिंह यादव ने पुलिस को कारसेवकों पर गोली चलवाने के आदेश दे दिए थे। 30 अक्टूबर का वो दिन था, जब पुलिस ने कारसेवकों को अयोध्या से खदेड़ दिया था। अफरातफरी और गोलीबारी में 15-20 कारसेवकों की मौत हो गई थी।

- साल 2017 में मुलायम सिंह यादव ने अपने 79 वें जन्मदिन पर समर्थकों को संबोधित करते हुए ये कहा था कि उन्होंने कारसेवकों पर गोली चलाने का जो आदेश दिया था बिल्कुल सही था। उन्होंने कहा था कि इस घटना में मारे गए कारसेवकों की मौत पर चर्चा के लिए वो अटल बिहारी वाजपेयी से भी मिले थे।

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