उपराष्ट्रपति चुनाव में नकवी रेस से बाहर, अब कौन सी भूमिका देगी बीजेपी?
शतरंज के शौकीन मुख्तार अब्बास नकवी भाजपा के लिए किस रोल में फिट होंगे ? इस सवाल पर काफी माथापच्ची हो रही है। 65 साल के नकवी 4 बार सांसद रह चुके हैं। संसदीय जीवन से रिटायरमेंट के बाद नकवी बीजेपी में कौन सी भूमिका निभाएंगे
नई दिल्ली, 16 जुलाई : मुख्तार अब्बास नकवी सेवानिवृत्त हो चुके हैं। एनडीए ने उपराष्ट्रपति पद के लिए जगदीप धनखड़ को कैंडिडेट बनाया है। ऐसे में अब कयास लगाए जा रहे हैं कि नकवी को भाजपा में कौन सी जिम्मेदारी मिलेगी। नकवी तीन बार राज्य सभा के सांसद रह चुके हैं। दो बार उत्तर प्रदेश और एक बार झारखंड की राज्य सभा सीट से संसद पहुंचे नकवी ने लगभग तीनों कार्यकाल पूरे किए। केवल दूसरे कार्यकाल में नकवी ने 11 दिन पहले इस्तीफा दिया था। कबड्डी, शतरंज और वॉलीबॉल में रुचि लेने वाले नकवी सियासी तौर पर किस भूमिका में दिखेंगे, इस पर राजनीतिक पंडितों के बीच अटकलें लगाई जा रही हैं।

पसमांदा मुसलमानों पर पीएम के आह्वान का अर्थ
भाजपा के अंदरखाने की खबर रखने वाले कुछ राजनीतिक पत्रकारों ने टीवी पर चर्चा में ये स्वीकार किया है कि हैदराबाद में हुए अधिवेशन में पीएम मोदी ने पसमांदा मुस्लिमों के बीच भाजपा की पैठ बनाने का आह्वान किया था। उन्होंने अल्पसंख्यकों का जिक्र कर पसमांदा मुस्लिम का जिक्र किया था। इस संबंध में सियासी पंडितों और जानकारों की मीडिया रिपोर्ट में कहा गया है कि पसमांदा मुसलमानों का जिक्र सोची समझी रणनीति है। भाजपा मुस्लिम समुदाय के उस पक्ष पर फोकस कर रही है जो पारंपरिक रूप से विपक्षी दलों की सियासी पूंजी (वोट) माने जाते हैं।
धनखड़ उपराष्ट्रपति कैंडिडेट, नकवी पर सस्पेंस
पसमांदा फारसी शब्द है। इसका इस्तेमाल पिछड़े या पीछे छूटने के अर्थ में होता है। भारत में आर्थिक और सामाजिक रूप से पिछड़े अल्पसंख्यक मुसलमानों को पसमांदा श्रेणी में गिना जाता है। ऐसे में कयास लगाए जा रहे थे कि मुस्लिम रिप्रेजेंटेशन के नाम पर नकवी को वाइस प्रेसिडेंट बनाया जा सकता है। हालांकि, धनखड़ के कैंडिडेट बनने पर नकवी की भावी भूमिका पर सस्पेंस और बढ़ गया है। नकवी का मानना है कि सीखना कभी बंद नहीं करना चाहिए क्योंकि जीवन सिखाना बंद नहीं करता। (Never stop learning because life never stops teaching)। ऐसे में देखना दिलचस्प होगा कि जीवन की सेकेंड इनिंग नकवी को अब क्या सिखाती है।
क्या चुनावी राज्यों में मिलेगी जिम्मेदारी ?
गुजरात और हिमाचल प्रदेश में इस साल विधानसभा चुनाव होने हैं। ऐसे में माना जा रहा है कि नकवी को भाजपा संगठन में अहम जिम्मेदारी दी जा सकती है। भाजपा में नकवी पार्टी के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष, राष्ट्रीय महासचिव भाजपा की युवा इकाई भारतीय जनता युवा मोर्चा (BJYM) के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष रह चुके हैं। उनके संगठनात्मक कौशल से पार्टी अच्छे से परिचित है। शायद इसीलिए संसदीय कार्यकाल के अंतिम दौर में नकवी को राज्य सभा में सदन का उप नेता बनाया गया था। इस भूमिका में नकवी को आक्रामक तरीके से विपक्ष के आरोपों का मुंहतोड़ जवाब देते भी देखा जा चुका है।
मंत्रियों के इस्तीफे के बाद संगठन का जिम्मा
नकवी से पहले भी कई बड़े नेताओं को संगठन में अहम भूमिका में लाया गया जा चुका है। जुलाई 2021 में मोदी कैबिनेट रीशफल के दौरान वरिष्ठ भाजपा नेताओं का इस्तीफा सामने आया था। इनको संगठन में अहम जिम्मेदारी मिली है। कानून मंत्री रविशंकर प्रसाद और केंद्रीय सूचना और प्रसारण मंत्री प्रकाश जावड़ेकर को भाजपा ने संगठन में अहम दायित्व दिया है।
क्या संवैधानिक पद सुशोभित करेंगे नकवी ?
मुख्तार अब्बास नकवी फिलहाल भाजपा की राष्ट्रीय कार्यकारिणी के सदस्य हैं। 2022-23 के विधानसभा चुनावों के अलावा 2024 में लोक सभा चुनाव भी होने हैं। इसके मद्देनजर नकवी को संगठन से इतर किसी राज्य में राज्यपाल भी बनाया जा सकता है। संभव है उन्हें पश्चिम बंगाल का राज्यपाल भी नियुक्त किया जाए। ऐसा इसलिए क्योंकि राज्यपाल जगदीप धनखड़ के उपराष्ट्रपति पर का उम्मीदवार बनने के बाद पश्चिम बंगाल के गवर्नर की पोस्ट खाली हो गई है। यूं तो राज्यपाल और राष्ट्रपति-उपराष्ट्रपति के पद संवैधानिक और न्यूट्रल होते हैं लेकिन गाहे-बगाहे मुस्लिम रीप्रेजेंटेशन की बात निकल ही आती है और इस पैमाने पर एकमात्र मुस्लिम राज्यपाल आरिफ मोहम्मद खान केरल में हैं। भाजपा आलोचकों को खामोश करने के लिए नकवी को गवर्नर का पोस्ट ऑफर कर सकती है।
नकवी वकील भी हैं
15 अक्टूबर 1957 को तत्कालीन इलाहाबाद (अब प्रयागराज) में जन्मे मुख्तार अब्बास नकवी ने पत्रकारिता की पढ़ाई के बाद कानून की डिग्री भी हासिल की। इलाहाबाद यूनिवर्सिटी से डिग्री लेने वाले नकवी पेशेवर वकील भी हैं। 1984 में सीमा नकवी से निकाह करने वाले नकवी एक बेटे के पिता भी हैं।
सियासी सफर की शुरुआत
नकवी का राजनीतिक सफर 1975 की इमरजेंसी के दौर में शुरू हुआ। तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के कार्यकाल में लगाए गए आपातकाल के दौरान नकवी आंदोलनों में शामिल हुए। जेल भी गए। 1980 में नकवी ने जनता पार्टी (सेक्युलर) की टिकट पर विधानसभा चुनाव के दंगल में हाथ आजमाए। हालांकि, सफलता नहीं मिली। नकवी ने निर्दलीय प्रत्याशी के रूप में अयोध्या लोक सभा सीट से भी किस्मत आजमाई, लेकिन जीत नहीं मिली। बाद के दौर में नकवी भाजपा से जुड़े और लोक सभा सांसद, राज्य सभा सदस्य के अलावा कैबिनेट मंत्री रहे। राज्य सभा से रिटायरमेंट से पहले लगभग एक साल तक राज्य सभा में डिप्टी लीडर की पोस्ट पर रहे।
नकवी के संसदीय जीवन पर एक नजर-
- वर्ष 1998-99 में नकवी 12वीं लोक सभा में उत्तर प्रदेश की रामपुर सीट से निर्वाचित हुए। तत्कालीन वाजपेयी सरकार में नकवी को संसदीय कार्य मंत्रालय का अतिरिक्त प्रभार दिया गया था। इसके साथ वे सूचना और प्रसारण मंत्रालय में राज्य मंत्री भी रहे।
- मई, 2014 में नरेंद्र मोदी नीत सरकार बनने के बाद नवंबर 2014 में मुख्तार अब्बास नकवी को अल्पसंख्यक कार्य मंत्रालय (Minister of State in the Ministry of Minority Affairs) में राज्यमंत्री का पोर्टफोलियो मिला।
- जुलाई, 2016 में नकवी को स्वतंत्र प्रभार के साथ अल्पसंख्यक कार्य राज्यमंत्री बनाया गया। इसके बाद सितंबर 2017 में नकवी अल्पसंख्यक कार्य मंत्री बने।
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