MUDA Case: सेक्शन 17A क्या है? जिसके आधार पर सिद्दारमैया के खिलाफ होगी भ्रष्टाचार के मामले की जांच
Siddaramaiah MUDA Case: कर्नाटक हाई कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में मुख्यमंत्री सिद्दारमैया की उस याचिका को खारिज कर दिया है, जिसमें उन्होंने भ्रष्टाचार के एक कथित मामले में अपने ऊपर मुकदमा चलाने की गवर्नर थावरचंद गहलोत की मंजूरी को चुनौती दी थी। अदालत के इस फैसले ने भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम की धारा 17ए को चर्चा में ला दिया है।
यह मामला मैसूर अर्बन डेवलपमेंट अथॉरिटी (MUDA) में कथित घोटाले से संबंधित है। इसमें मूडा पर आरोप है कि उसने कथित रूप से मुख्यमंत्री सिद्दारमैया की पत्नी पार्वती को कौड़ियों के मोल वाली जमीन के बदले में मैसूर के प्राइम लोकेशन पर 14 प्लॉट विकसित करके दिए। विपक्ष इसे करीब 4 हजार करोड़ रुपए का घोटाला बता रहा है।

भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम की धारा 17ए
भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम (PCA) में धारा 17ए को 26 जुलाई, 2018 को एक संशोधन के माध्यम से जोड़ा गया था। इसका उद्देश्य लोक सेवकों को हल्के या अनुचित जांच के खिलाफ अतिरिक्त सुरक्षा मुहैया करना है।
इस प्रावधान की वजह ये है कि कानून लागू करने वाली एजेंसियों को पीसीए के तहत लोक सेवकों के कथित अपराधों को लेकर कोई भी जांच शुरू करने से पहले सक्षम प्राधिकारी से पूर्व मंजूरी लेना अनिवार्य है।
पीसीए की धारा 17ए की महत्वपूर्ण बातें-
पूर्व मंजूरी आवश्यक: इसका मतलब पुलिस अधिकारियों को लोक सेवकों पर लगे आरोपों की जांच शुरू करने से पहले मंजूरी लेना जरूरी है। यानी इस प्रक्रिया को पूरा किए बिना भ्रष्टाचार से जुड़े मामलों में उनके खिलाफ कार्रवाई शुरू नहीं की जा सकती है।
तुच्छ जांच से सुरक्षा: इस धारा से लोक सेवकों को बेवजह की परेशानियों से छुटकारा मिल जाता है, जिसका मकसद ये है कि जांच के नाम पर उन्हें अपनी जिम्मेदारियों को निभाने में किसी तरह की रुकावटों का सामना नहीं करना पड़े।
न्यायिक व्याख्या: कर्नाटक हाई कोर्ट के फैसले से यह साफ होता है कि इस धारा के तहत भी सीएम के खिलाफ शिकायतों की जांच को सक्षम अधिकारी (गवर्नर) की ओर से मंजूरी दिया जाना पर्याप्त है। इस केस में सक्षम अधिकारी के तौर पर राज्यपाल इसलिए उपयुक्त हैं, क्योंकि वही मुख्यमंत्री की नियुक्ति करते हैं।
हालांकि, कर्नाटक हाई कोर्ट ने भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) की धारा 218 के तहत मुकदमा चलाने की मंजूरी को खारिज कर दिया है। कोर्ट ने कहा, 'राज्यपाल के कथित जल्दबाजी में लिए गए फैसले से आदेश पर कोई प्रतिकूल प्रभाव नहीं पड़ा है......यह आदेश पीसीए की धारा 17ए के तहत मंजूरी तक सीमित है और बीएनएसएस की धारा 218 के तहत अनुमति देने वाला आदेश नहीं है।'
बीएनएसएस की धारा 218
बीएनएसएस की धारा 218 लोक सेवकों और जजों के खिलाफ मुकदमे से संबंधित है, जो दंड प्रक्रिया संहिता (सीआरपीसी) की धारा 197 के पिछले प्रावधानों के स्थान पर है। यह धारा लोक सेवकों के विरुद्ध मुकदमे की मंजूरी देने के लिए एक व्यवस्थित प्रक्रिया स्थापित करती है।
बीएनएसएस की धारा 218 की अहम बातें-
मंजूरी की आवश्यकता: लोक सेवकों पर केस चलाने से पहले राज्य या केंद्र सरकार से मंजूरी आवश्यक है। इससे यह सुनिश्चित होता है कि राजनीतिक वजहों से न्यायिक प्रक्रिया में दखल न पड़े।
फैसले के लिए समय-सीमा: सरकार को मंजूरी के आग्रह पर 120 दिनों के अंदर फैसला लेने की आवश्यकता है। अगर वह इसमें असफल रहती है तो मान लिया जाएगा कि स्वत: मंजूरी मिल गई।
न्यायिक निगरानी: यह प्रावधान सरकार के फैसले की न्यायिक समीक्षा का इंतजाम करता है, जिससे मनमानेपन रोक लगती है।
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