ममता के लिए सिर्फ 2014 चुनाव ही नहीं है 'एक मुद्दा'

5 फरवरी का दिन न सिर्फ भाजपा के लिए बल्कि बंगाल के लिए भी कुछ खास था। सियालदह और हावड़ा स्टेशन पर आने वाले लोगो को देखकर कोई भी यही कह सकता था कि यह भीड़ वामपार्टियों और टीएमसी की होने वाली रैली के लिए ही है लेकिन लोगों के जनसमुदाय ने दिखा दिया कि इसकी तैयारी भाजपा कार्यकर्ताओं ने काफी पहले ही कर दी थी। वहीं मोदी ने अपने भाषण के दौरान सुभाष चंद्र बोस, रवींद्र नाथ टैगोर और स्वामी विवेकानंद का नाम लेकर देश को दिशा देने में किये गये उनके योगदान को याद कर जनता के दिल को छू लिया। जिसके बाद उन्होने संभावित तीसरे मोर्चे पर भी प्रहार किये, जिसका प्रमुख वामपंथी दलों को ही माना जा रहा है। मोदी ने प्रणव मुखर्जी को प्रधानमंत्री न बनाये जाने की बात कहकर कांग्रेस पर वंशवाद का पालन करने का करारा प्रहार किया और जनता को इसे न भूलने की बात कहकर कांग्रेस को वोट न करने की अपील की।
रैली में उन्हें मिले जनसमर्थन के बाद अब वाम दलों और टीएससी के लिए भाजपा की उपेक्षा करना आसान नहीं है, जनता ने पहले ही वाम दलों को बाहर कर उन पर अविश्वास जाहिर कर दिया, जबकि टीएमसी भी पिछले एक साल में कुछ अच्छा काम नहीं कर सकी है, ऐसे में पश्चिम बंगाल में भाजपा को लाभ मिल सकता है।
दक्षिण भारतीय पार्टियों को भी दिया संदेश
मोदी ने रैली में ममता बनर्जी के परिवर्तन के नारे को सराहा वहीं एआईडीएमके, डीएमके और बीजद को साफ संदेश दे दिया कि जनसमर्थन भाजपा के पक्ष में ही है। मोदी ने साफ कर दिया कि अब विधानसभा नहीं बल्कि लोकसभा चुनाव आने वाले हैं। इसलिए जनता भाजपा को वोट करे, जिससे केंद्र में भाजपा रहे और राज्य में टीएमसी और दोनों मिलकर जनता की भलाई के लिए काम कर सकें। गौर हो सर्वे दिखा रहे हैं कि एनडीए को बहुमत नहीं मिलेगा जबकि टीडीपी, टीएमसी, एआईडीएमके को बेहतर सीटें मिल रही हैं, जिसने भाजपा की चिंताओं को कुछ हद तक बढ़ा दिया है।
टीएमसी के साथ गठबंधन के दरवाजे खुले रखे
मोदी ने भाषण के दौरान टीएमसी के साथ चुनाव बाद गठबंधन की संभावना को भी बनाये रखा। उन्होने ममता सरकार को घेरने वाले कई मुद्दों शारदा चिट फंड घोटाला और राज्य में महिलाओं के खिलाफ होने वाले अपराधों पर भी कुछ नहीं बोला। हालांकि टीएमसी ने चुनाव बाद भाजपा के साथ आने पर स्थितियां स्पष्ट नहीं की हैं।
बंगाल के लिए सिर्फ 2014 चुनाव ही मुद्दा नहीं
देश भर में चल रही 'मोदी लहर' के कारण भले ही ममता बनर्जी के लिए यह रैली आश्चर्यजनक न हो लेकिन अगर भाजपा पश्चिम बंगाल में कुछ सीटें जीतने में कामयाब हो जाती है, तो बेहतर प्रशासन और विकास के वादे के साथ 2016 के विधानसभा चुनाव में तृणमूल कांग्रेस के लिए एक बड़ी चुनौती बन जाएगी। वैसे भी राज्य की टीएमसी सरकार बांग्लादेश से हो रही घुसपैठ को नहीं रोंक सकी और न ही राज्य में निवेश का माहौल बना सकी है। भाजपा का वोट प्रतिशत इस समय राज्य में 18 फीसदी बताया जा रहा है लेकिन 'मोदी प्रभाव' के बाद इसमें बढ़ोत्तरी हो सकती है। वहीं मोदी अपनी योजनाओं के कारण देश के युवाओं को रिझाने में कामयाब रहे हैं अत: ममता की कमजोरी से सीपीएम (आई) की राज्य में वापसी हो सकती है जिसे भाजपा के साथ मिलकर ही ममता रोंक सकती हैं। ऐसे में यह देखना रोचक होगा कि अगले एक दशक में पश्चिम बंगाल में राजनीतिक हालात क्या करवट लेते हैं? मोदी की यह रैली कई मायने में राज्य के लिए बेहद महत्वपूर्ण साबित होगी।












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