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मोदी की जलवायु नीति: कितनी हक़ीक़त, कितना फ़साना

मोदी की क्लाइमेट पॉलिसी: कितनी हक़ीक़त, कितना अफसांना
Getty Images
मोदी की क्लाइमेट पॉलिसी: कितनी हक़ीक़त, कितना अफसांना

इस हफ़्ते अमरीका में दो शख़्सियत कैमरे पर छाई रहीं. एक भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और दूसरी स्वीडन की 16 वर्षीय पर्यावरण कार्यकर्ता ग्रेटा थनबर्ग.

इनमें से एक सुर्ख़ियों के सरताज नेता हैं और दूसरी धरती पर संभावित विनाशलीला से आक्रोशित एक छात्रा, जो दुनिया भर में चल रहे क्लाइमेट आंदोलनों और विरोध प्रदर्शनों का चेहरा बन गई हैं.

हफ़्ते की घटनाओं को याद कीजिए. जहां एक ओर न्यूयॉर्क में नरेंद्र मोदी 50 किलोवॉट क्षमता के गांधी सोलर पार्क का उद्घाटन करते हैं. वहीं ग्रेटा धरती को 'ख़तरे में डालने के लिये ज़िम्मेदार' विश्व नेताओं को 'हाउ डेयर यू' कहकर ललकारती हैं.

एक ओर मोदी भारत के सौर ऊर्जा लक्ष्य को 1,75,000 मेगावॉट से बढ़ाकर 4,50,000 मेगावॉट करने का ऐलान करते हैं तो दूसरी ओर ग्रेटा बाल अधिकारों के हनन के लिये 5 बड़े देशों के ख़िलाफ़ संयुक्त राष्ट्र में शिकायत करती हैं.

मोदी की क्लाइमेट पॉलिसी: कितनी हक़ीक़त, कितना अफसांना
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भारत के प्रधानमंत्री के साथ ग्रेटा का ज़िक्र सिर्फ़ इसलिए क्योंकि जहां एक मुखर यूरोपीय छात्रा दुनिया भर में क्लाइमेट एक्शन के लिए विश्व नेताओं को चुनौती दे रही है. वहीं नरेंद्र मोदी के सामने भारत को क्लाइमेट का विश्व नायक बनाने की अपार संभावनाएं और चुनौतियां दोनों मौजूद हैं लेकिन मोदी का लक्ष्य ग्रेटा से कहीं अधिक कठिन है और वह सिर्फ़ बैनरों, नारों, भाषणों और कैमरे से निकली तस्वीरों से ही हासिल नहीं होगा.

जलवायु परिवर्तन: विश्व मंच पर मोदी का क़द

सत्ता में आने के बाद से नरेंद्र मोदी पर्यावरण के मामले में ख़ुद को वर्ल्ड लीडर के तौर पर स्थापित करने की कोशिश में हैं. उनकी पार्टी और सरकार के तमाम मंत्री जलवायु परिवर्तन की जंग में उनकी कामयाबियां गिनाते हैं लेकिन हक़ीक़त आख़िर क्या है?

मोदी ने 2014 में प्रधानमंत्री बनने के बाद कुछ महत्वाकांक्षी क़दम उठाए भी हैं. मिसाल के तौर पर 2022 तक भारत की कुल साफ़ ऊर्जा का लक्ष्य 1,75,000 मेगावॉट रखना वास्तव में एक बड़ी छलांग थी.

अब प्रधानमंत्री ने इस लक्ष्य को दोगुने से अधिक 4,50,000 गीगावॉट करने की घोषणा कर दी है. हालांकि यह नहीं बताया है कि भारत यह लक्ष्य कब तक हासिल करेगा.

भारत ने फ्रांस के साथ मिलकर जो अंतरराष्ट्रीय सोलर अलायंस बनाया है वह एक बड़ी पहल है
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भारत ने फ्रांस के साथ मिलकर जो अंतरराष्ट्रीय सोलर अलायंस बनाया है वह एक बड़ी पहल है

इसी तरह 2015 में ऐतिहासिक पेरिस समझौते के वक़्त भारत ने फ़्रांस के साथ मिलकर अंतरराष्ट्रीय सोलर अलायंस (आईएसए) की घोषणा की, जिसका मुख्यालय भारत में है.

यह भी नेतृत्व और साफ़ ऊर्जा की दिशा में मोदी सरकार का बड़ा क़दम माना जायेगा. आईएसए में अभी 100 से अधिक सदस्य देश हैं और इसके पीछे दुनिया भर में सोलर पावर का इस्तेमाल बढ़ाने और उसे सस्ता करने की सोच है.

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और फ़्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों को संयुक्त राष्ट्र की ओर से दिए गए चैंपियंस ऑन द अर्थ सम्मान में भी इस अलायंस का ज़िक्र है.

नरेंद्र मोदी के शासन काल में उजाला जैसी योजनाओं से एलईडी का इस्तेमाल भी बढ़ा.

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क्या मोदी ने तैयार की नई नीतियों की ज़मीन?

नरेंद्र मोदी और उनकी सरकार को उपलब्धियों का श्रेय देते वक़्त यह याद रखना ज़रूरी है कि विश्व मंच पर भारत की क्लाइमेट पॉलिसी में बड़ा बदलाव जयराम रमेश के पर्यावरण मंत्री रहते आया.

साल 2009 में हुए कोपेनहेगन सम्मेलन में भारत ने लीक से हटकर ऐलान किया कि वह कार्बन उत्सर्जन कम करने के लिए स्वतंत्र रूप से क़दम उठायेगा और इस दिशा में अमीर देशों की पहल का इंतज़ार ही करता नहीं रहेगा.

पहली बार भारत ने तय किया कि वह विकास के लिए अपने अधिकारों की लड़ाई लड़ेगा लेकिन ग्लोबल वॉर्मिंग से जंग के मामले में विकसित देशों के आलस और निकम्मेपन के पीछे छिपकर नहीं बैठेगा.

इस बड़े नीतिगत बदलाव वाले क़दम पर उस वक़्त बीजेपी ने यूपीए सरकार की तीखी आलोचना की और मनमोहन सिंह पर विकसित देशों के दबाव में झुकने का आरोप लगाया. लेकिन जयराम रमेश का तर्क था कि भारत हमेशा दूसरों देशों द्वारा पहल करने का इंतज़ार नहीं कर सकता और न ही वह देश का प्रति व्यक्ति कार्बन उत्सर्जन कम होने का बहाना बना सकता है.

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विरोधाभासी क़दम

साफ़ ऊर्जा से लेकर तमाम देशों के साथ अलायंस बनाकर आगे बढ़ने की नींव उन्हीं फैसलों से पड़ी. भारत ने जलवायु परिवर्तन वार्ता में विकासशील देशों की ताक़त बढ़ाने के लिए दक्षिण अफ्रीका, ब्राज़ील और चीन का एक महत्वपूर्ण गठजोड़ बनाया जिसे 'बेसिक' देशों का समूह कहा गया.

तत्कालीन अमरीकी राष्ट्रपति बराक ओबामा भारत की सदस्यता वाले ऐसे समूहों से अहम मुद्दों पर समझौता करने को विवश हुए.

बेहतर एलईडी, रेफ्रिजरेटर और एयर कंडीशनर जैसे बिजली उपकरणों के लिए मानक तय करने के लिए देश में ब्यूरो ऑफ़ एनर्जी एफ़िसेंसी (बीईई) कार्बन उत्सर्जन कम करने में भूमिका निभाता है. इस ब्यूरो (बीईई) की स्थापना तो 2002 में ही हो गई थी.

ब्यूरो ऑफ़ एनर्जी एफ़िसेंसी के पूर्व अध्यक्ष और जलवायु परिवर्तन पर प्रधानमंत्री के पैनल के सदस्य डॉ. अजय माथुर ने कहा, "रेफ्रिजरेटर और एसी जैसे उपकरणों के मानक (स्टैंडर्ड) 2007 में बनाए गए और निर्माता कंपनियों को दो साल का वक़्त दिया गया. साल 2009 से यह मानक अनिवार्य कर दिए गए. इसी तरह एनर्जी कन्ज़रवेशन बिल्डिंग कोड को भी 2007 में लाया गया और 2009 में इसने तेज़ी पकड़ी."

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी एक ओर देश के लिए 4,50,000 मेगावॉट साफ़ ऊर्जा का लक्ष्य तय कर रहे हैं वहीं अपने ताज़ा अमरीका दौरे में उन्होंने बड़ी-बड़ी तेल और गैस कंपनियों के सीईओ के साथ बैठक की है.

मोदी की मौजूदगी में भारत और अमरीकी गैस कंपनियों के बीच 250 करोड़ अमरीकी डॉलर का क़रार हुआ. माना जा रहा है कि अगले तीन सालों में अमरीकी तेल और गैस कंपनियां भारत के साथ 10,000 करोड़ डॉलर तक का क़रार कर सकती हैं.

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जलवायु परिवर्तन विशेषज्ञ हरजीत सिंह कहते हैं, "तेल, गैस और कोयला बिजलीघर आने वाले दिनों में देशी की अर्थव्यवस्था पर बोझ बनेंगे तो सरकार क्या सिर्फ़ अमरीकी सरकार को ख़ुश करने के लिए इन बिजलीघरों और पाइप लाइनों पर जनता का पैसा लुटा रही है."

सवालों में घरेलू नीति

भारत ने 2015 में पेरिस डील के तहत वादा किया है कि वह 300 करोड़ टन कार्बन डाइ ऑक्साइड सोखने लायक जंगल लगायेगा. लेकिन मोदी सरकार की नई वन नीति जंगलों के ख़िलाफ़ है.

प्रस्तावित वन नीति - जिसका ड्राफ्ट पिछले साल रिलीज़ हुआ और अभी उसे अंतिम रूप दिया जाना है. कम घनत्व वाले जंगलों को निजी कंपनियों को देने की बात करती है. जानकार कहते हैं कि निजी कंपनियां केवल आर्थिक मुनाफ़े वाला पेड़ (टिंबर फॉरेस्ट) लगाएंगी.

दिल्ली स्थित द एनर्जी एंड रिसोर्सेज़ इंस्टीट्यूट (टैरी) में सीनियर फ़ेलो और वन मामलों के विशेषज्ञ डॉ. योगेश गोखले कहते हैं, "मॉनिटरिंग (निगरानी) के कड़े नियमों के बिना इस तरह का क़दम क़त्तई उचित नहीं है. न तो यह जंगल पर निर्भर आदिवासियों के लिये ठीक है और न ही इससे जैव विविधता से भरपूर स्वस्थ जंगल बनेगा जो ग्लोबल वॉर्मिंग का असर कम कर सके."

इसी तरह जंगल के आकार को लेकर मोदी सरकार के आंकड़ों पर ही पिछले कुछ सालों में सवाल उठे हैं. पिछले साल (2018 में) स्टेट ऑफ़ फ़ॉरेस्ट रिपोर्ट में सरकार ने कहा कि भारत के जंगलों में बढ़ोतरी हुई है लेकिन बाद में पता चला कि सरकार ने वृक्षारोपण को भी जंगल की परिभाषा में शामिल कर लिया.

जानकारों का कहना है कि वृक्षारोपण सिर्फ़ एक 'ट्री-कवर' है जबकि जंगल का अर्थ जैव विविधता से भरपूर इकोसिस्टम है. इसके बाद संयुक्त राष्ट्र के विशेषज्ञ पैनल ने भी फॉरेस्ट कवर में बढ़ोतरी को लेकर भारत के दावों पर शंका ज़ाहिर की.

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संकट से घिरा भारत

समुद्र जल स्तर और क्रायोस्पीयर पर आईपीसीसी की ताज़ा विशेष रिपोर्ट आगाह करती है कि अगर धरती के तापमान में वृद्धि 2 डिग्री से पर्याप्त नीचे नहीं रोकी गई तो इस सदी के अंत तक समुद्र जल स्तर में 1.1 मीटर तक की बढ़ोतरी हो जाएगी.

भारत की विशाल समुद्र तट रेखा और उस पर निर्भर क़रीब 30 करोड़ से ज़्यादा लोगों को भविष्य को देखते हुए यह काफ़ी विनाशकारी हो सकता है. ऐसे में सरकार से घरेलू और अंतरराष्ट्रीय मंच पर एक स्पष्ट नीति की उम्मीद की जाती है.

इसलिए आख़िर में एक सलाह जो ख़ुद ग्रेटा थनबर्ग ने प्रधानमंत्री मोदी को इस साल की शुरुआत में दी. ग्रेटा ने पीएम मोदी से कहा था कि जलवायु परिवर्तन के संकट को देखते हुए सिर्फ़ बयानबाज़ी का नहीं बल्कि कड़े क़दम उठाने का वक़्त है.

ग्रेटा ने प्रधानमंत्री को चेताया था, "अगर आप असफल होते हैं तो आप इतिहास के सबसे बड़े खलनायकों के रूप में याद किए जायेंगे और आप ऐसा नहीं चाहेंगे."

(हृदयेश जोशी स्वतंत्र पत्रकार हैं. वह पर्यावरण, जलवायु परिवर्तन और ऊर्जा क्षेत्र से जुड़े विषयों पर लिखते हैं.)

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