MCD Chunav results : कूड़े के 3 पहाड़ों के बोझ तले दब गयी भाजपा!
अरविंद केजरीवाल को नगर निगम की सत्ता सौंप कर इस शहर के वोटरों ने एलान कर दिया कि अब वे नर्क से मुक्ति चाहते हैं। जिस शहर में ‘कूड़े का पहाड़’ ऐतिहासिक कुतुबमिनार की ऊंचाई से होड़ करने लगे उसको नर्क नहीं तो और क्या कहेंगे

दिल्ली की स्थानीय राजनीति में भी आखिरकार आम आदमी पार्टी का जादू चल गया। दिल्ली नगर निगम चुनाव में आप ने बहुमत का आंकड़ा (126) पार कर 134 वार्डों में जीत हासिल की। इस जीत से अरविंद केजरीवाल का 'ब्रांड वैल्यू’ और बढ़ गया। भाजपा 104 सीटों के साथ दूसरे स्थान पर रही। उसकी चौथी जीत का मंसूबा पूरा नहीं हुआ। भाजपा की उम्मीदें 'कूड़े के पहाड़’ के नीचे दब गयीं। अरविंद केजरीवाल को नगर निगम की सत्ता सौंप कर इस शहर के वोटरों ने एलान कर दिया कि अब वे नर्क से मुक्ति चाहते हैं। जिस शहर में 'कूड़े का पहाड़’ ऐतिहासिक कुतुबमिनार की ऊंचाई से होड़ करने लगे उसको नर्क नहीं तो और क्या कहेंगे ? कुतुबमीनार की उंचाई 73 मीटर है। जब कि गाजीपुर लैंडफिल साइट पर 2019 में कूड़े के पहाड़ की ऊंचाई 65 मीटर तक पहुंच गयी थी। यानी कुतुबमीनार से केवल 8 मीटर छोटी थी। नगर निगम के इस चुनाव में केजरीवाल ने सफाई और भ्रष्टाचार को सबसे बड़ा मुद्दा बनाया था। उन्होंने पहली बार इस चुनाव में कूड़े के पहाड़ का मुद्दा उछाला जो गेम चेंजर साबित हुआ।

केजरीवाल- बीजेपी के 15 साल में कूड़े के 3 पहाड़
भाजपा ने सात राज्यों के मुख्यमंत्रियों और कई केन्द्रीय मंत्रियों को इस चुनाव के प्रचार में उतारा था। लेकिन ये दिग्गज भी दिल्ली की जनता को अपनी तरफ मोड़ नहीं पाये। इसके उलट उन्होंने केजरीवाल के वायदे पर भरोसा किया। सितम्बर में ही अरविंद केजरीवाल ने कूड़े की समस्या को प्रमुखता से उठाया था। उन्होंने कहा था, हम दिल्ली को झीलों की राजधानी बनाना चाहते हैं जब कि बीजेपी वाले इसे कूड़े की राजधानी बनाना चाहते हैं। भाजपा ने इस समस्या को गंभीरता से नहीं लिया। वे केजरीवाल की नौटंकी कह कर इसका मजाक उड़ाते रहे। जब कि केजरीवाल ने इस मुद्दे को मजबूती से पकड़े रखा। उन्होंने दिल्ली की जनता से कहा, नगर निगम पर 15 साल तक शासन करने वाली बीजेपी ने कचरे के तीन पहाड़ बनाने के सिवा कुछ नहीं किया। अब आप को मौका दीजिए, हम काम कर के दिखाएंगे। इस गंदगी से निजात दिलाएंगे। दिल्ली की जनता ने केजरीवाल पर भरोसा किया और उनकी झोली वोट से भर दी। 2017 में 49 वार्डों में जीत हासिल करने वाली आप इस बार 134 पर पहुंच गयी।

बदबू से निजात के लिए बदलाव
दिल्ली तीन तरफ से कूड़े के पहाड़ से घिरा है। गाजीपुर, ओखला और भलस्वा मे कूड़े का इतना बड़ा अंबार लग गया है कि वे पहाड़ सरीखा दिखता है। कुछ महीने पहले तक गाजीपुर में कूड़े की पहाड़ की ऊंचाई 53 मीटर थी। 2019 में इसकी ऊंचाई 65 मीटर तक पहुंच गयी थी। गाजीपुर में कचरा डंप यार्ड को समतल करने की प्रकिया चल रही है। 2024 तक इसे समतल कर देना है। भलस्वा में कचरे के ढेर की ऊंचाई 54 मीटर और ओखला में 50 मीटर है। कूड़े के इन पहाड़ों के आसपास रहनेवाले लोगों की जिंदगी बदबू से बेहाल है। दिल्ली की आबादी दिनोंदिन बढ़ रही है। एक अनुमान के मुताबिक दिल्ली शहर से रोज करीब 11 हजार टन कचरा निकलता है। करीब पांच हजार टन कचरे को रिसाइकल कर बिजली बनायी जाती है। बाकी करीब छह हजार टन कचरा इन तीन जगहों पर डंप किया जाता है। जाहिर है इतना कचरा जमा होगा तो पहाड़ बनेगा ही। शहर की सफाई, नगर निगम का सबसे प्रमुख कार्य है। लेकिन भाजपा शासित निगम ने इस समस्या के समाधान पर ध्यान नहीं दिया।

आरोप प्रत्यारोप नहीं, नतीजा चाहिए
भाजपा ने समस्या के समाधान की बजाय आरोप-प्रत्यारोप की राजनीति की। उसने अरविंद केजरीवाल के आरोप को खारिज करने के लिए पंजाब का मुद्दा उठाया था। भाजपा ने आरोप लगाया था कि लुधियाना के ताजपुर में और जालंधर के वरियाना में कूड़े का पहाड़ लग गया है। पहले आप इसे साफ करे फिर दिल्ली की बात करे। लेकिन दिल्ली के वोटर इस राजनीतिक तू-तू, मैं-मैं से उब चुके थे। उनका साफ कहना था कि दिल्ली के लोग तो दिल्ली की गंदगी से परेशान हैं उनका पंजाब से क्या लेना देना। गली-मुहल्ले की समस्या का समाधान तो दिल्ली नगर निगम को करना था। भाजपा को काम करने का मौका मिला था। लेकिन उसने नहीं किया तो जनता ने नया विकल्प चुन लिया।

अब आप की डबल इंजन सरकार
राजनीति दल चाहे अरविंद केजरावील के बारे में जो सोचे, लेकिन दिल्ली की जवता उन्हें काम करने वाला आदमी मानती है। तभी तो वे दिल्ली का विधानसभा चुनाव लगातार जीत रहे हैं। चूंकि दिल्ली के मुहल्लों का जनजीवन नगर निगम के कामकाज पर निर्भर था इसलिए उन्होंने स्थानीय सरकार की सत्ता आप को सौंप दी। केजरीवाल ने भाजपा के राजनीतिक नारे का अपने हक में इस्तेमाल किया। राज्यों के चुनाव में भाजपा अक्सर ये बात कहती है- डबल इंजन की सरकार, तो प्रगति लगातार। यानी केन्द्र और राज्य में भाजपा की सरकार होने से संबंधित राज्य का अधिक विकास होगा। केजरीवाल ने इसी तर्क को अपने राजनीतिक मकसद के लिए इस्तेमाल किया। उनका कहना था, दिल्ली सरकार की कई योजनाएं इसलिए ठीक से लागू नहीं पो पायीं क्यों कि नगर निगम का शासन भाजपा के पास था। राजनीतिक पूर्वाग्रह के कारण भाजपा के वार्ड पार्षद दिल्ली सरकार के जनहित योजनाओं में अड़ंगा डालते थे। इसलिए उन्होंने वोटरों से अपील की थी, नगर निगम में भी हमें मौका दीजिए फिर देखिए हम आपके लिए क्या करते हैं। आखिरकार केजरीवाल ने जनता का भरोसा जीत लिया। इस नतीजे से साबित होता है कि अरविंद केजरीवाल की स्वीकार्यता अब और तेजी से बढ़ रही है।
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