क्यों मोदी-शाह की नींद उड़ाएगा सपा-बसपा का ये महागठबंधन?
नई दिल्ली। ऐलान हो गया। एसपी-बीएसपी का गठबंधन लोकसभा चुनाव से पहले भी रहेगा, बाद भी। एक नया, मजबूत और चुनौतीविहीन लग रहे जातीय गठबंधन की राजनीति का आग़ाज हुआ है, जिसे गोरखपुर, फूलपुर और कैराना में आजमाया जा चुका है। अखिलेश-मायावती ने घोषणा की है कि 38-38 सीटों पर एसपी-बीएसपी चुनाव लड़ेगी। 80 में से बच गयी 4 सीटें। ये सीटें अपना दल(एस), राजभर की पार्टी, सोनिया और राहुल के लिए बिना गठबंधन के ही छोड़ी गयी हैं।

कांग्रेस-आरएलडी गठबंधन में नहीं
जो ऐलान नहीं हुआ, उनमें कांग्रेस और राष्ट्रीय लोकदल को गठबंधन में साथ रखने का एलान शामिल है। मगर, इसका मतलब ये नहीं है कि इन दलों के साथ एसपी-बीएसपी गठबंधन कोई शत्रुतापूर्ण व्यवहार करने वाला है। कांग्रेस को गठबंधन में साथ रखने पर मायावती ने अखिलेश के साथ साझा प्रेस कॉन्फ्रेन्स में कहा- "बीएसपी का वोट तो कांग्रेस को मिल जाता है मगर कांग्रेस का वोट हमें ट्रांसफर नहीं मिल पाता।"

आरएलडी के लिए उम्मीद बाकी
आरएलडी के लिहाज से देखें तो एसपी-बीएसपी ने उनके नेता के लिए कोई सीट छोड़ने का एलान भी नहीं किया है। मगर, एक सम्भावना ज़िन्दा है कि अगर आरएलडी से बातचीत जारी रही तो दोनों दल एसपी-बीएसपी अपने-अपने कोटे से उनके लिए सीट छोड़ सकते हैं। मगर, जिस तरह से एकतरफा एलान किया गया है उसे देखकर नहीं लगता कि दो सीट से ज्यादा देने को ये दल तैयार हैं। यह भी हो सकता है कि सीट आरएलडी को और उम्मीदवार एसपी या बीएसपी का। ऐसे फॉर्मूले की उम्मीद ज़िन्दा है।

यूपी में महागठबंधन का नेतृत्व एसपी-बीएसपी करेगी
एसपी-बीएसपी ने यह संकेत देने की कोशिश की है कि यूपी में गठबंधन का नेतृत्व वे दोनों मिलकर करेंगे। बाकी दल अगर सहयोगी हुए भी, तो वे नीति निर्णायक के तौर पर गठबंधन में सम्मान पाने की उम्मीद नहीं कर सकते। जातिगत समीकरण में एसपी-बीएसपी ने सिर्फ और सिर्फ ओबीसी-एससी पर ध्यान दिया है। आरएलडी की इस पर क्या प्रतिक्रिया होगी, यह देखना दिलचस्प रहेगा। आरएलडी का वोट बैंक जाट हैं, मगर अकेले जाट उन्हें सीट नहीं दिला सकते। इसलिए राजनीतिक गठबंधन की आरएलडी को सख्त आवश्यकता है।

गेस्टहाऊस कांड को भूली नहीं मायावती, जनहित पर दी वरीयता
मायावती ने यह भी साफ किया है कि जनता के हित को वह गेस्ट हाऊस कांड पर वरीयता दे रही हैं। इसका मतलब ये हुआ कि वह उस घटना को भूली नहीं हैं या फिर भुलाना नहीं चाहतीं। यह बयान इस परिप्रेक्ष्य में महत्वपूर्ण है कि बीजेपी लगातार इस गठबंधन को उसी घटना के आलोक में ‘अपमान भुलाने वाला' और ‘स्वार्थपूर्ण' गठबंधन बता रही है। मायावती के बयान का ये मतलब भी निकाला जा सकता है कि बीएसपी ने गठबंधन से बाहर होने का रास्ता छोड़ा नहीं है।

अखिलेश ने भी माया के प्रति दिखलायी ‘प्रतिबद्धता’
साझा प्रेस कॉन्फ्रेन्स में अखिलेश यादव की अपने कार्यकर्ताओं से यह अपील भी मायने रखती है कि वे न सिर्फ बहन मायावती का सम्मान करें, बल्कि जो अपमान करते हैं उनका भी विरोध करें। यह अपील भी गेस्ट हाऊस कांड को भुलाने के लिए या यों कहें कि बहन मायावती का साथ लम्बे समय तक बनाए रखने के लिए समाजवादी पार्टी की ओर से ‘प्रतिबद्धता का प्रदर्शन' है।
एसपी-बीएसपी का जातिगत राजनीति पर जोर
प्रेस कॉन्फ्रेन्स में केंद्र और प्रदेश की बीजेपी सरकारों पर हमला बोलते हुए खास तौर पर उत्तर प्रदेश में जाति पूछ कर थाने में काम करने जैसे माहौल का ज़िक्र किया गया है। इससे यह साफ है कि आने वाले समय में जाति केन्द्रित राजनीति पर एसपी-बीएसपी का जोर रहेगा। इसके कारण भी हैं।

ओबीसी-एससी के साथ मुसलमानों को भी जोड़ने की रणनीति
अखिलेश यादव ओबीसी वर्ग से आते हैं। प्रदेश में इस वर्ग से जुड़ी जातियों का प्रतिशत 34.7 है। इसमें भी यादव जाति की हिस्सेदारी को अगर देखा जाए तो वह 9.6 फीसदी है। जाहिर है वह ओबीसी का नेतृत्व करने के प्रति आशान्वित हैं। इसी तरह मायावती जिस अनुसूचित जाति की राजनीति का प्रतिनिधित्व करती हैं उसकी हिस्सेदारी 20.5 प्रतिशत है। इसमें जाटवों का हिस्सा 11.3 फीसदी है। अखिलेश-माया एक नया समीकरण गढ़ने की ओर बढ़ रहे हैं जिसके पास जातिगत वोट बैंक का मजबूत आधार 55.2 फीसदी वोट बैंक के रूप में होगा। इतना ही नहीं वे स्वाभाविक रूप से मुसलमानों को भी अपने साथ पा रहे हैं जिनकी आबादी यूपी में 19 फीसदी है। यह समीकरण 74.2 प्रतिशत होकर चुनौतीविहीन हो जाती है। जाहिर है जातिगत राजनीति ही एसपी-बीएसपी के लिए उपयुक्त है और वह इसी लिहाज से माहौल बनाने में जुटी हैं।
कांग्रेस को होगा सर्वाधिक नुकसान
यह कहने की जरूरत नहीं है कि एसपी-बीएसपी के एकजुट होने से सबसे ज्यादा नुकसान अगर किसी को होगा, तो वह कांग्रेस होगी। कांग्रेस के पास जातिगत वोट बैंक नहीं रह गया है। मोदी विरोधी वोट बैंक पर उसका दावा है। यही वजह है कि एसपी-बीएसपी को कांग्रेस अपने फायदे की नहीं लगी। मगर, राष्ट्रीय लोकदल के साथ ऐसी बात नहीं है। जाटों पर इस पार्टी का प्रभाव है।

'बीजेपी का अहंकार' तोड़ने की घोषणा
माया-अखिलेश ने औपचारिक रूप से बीजेपी का अहंकार तोड़ने के लिए इस गठबंधन को जरूरी बताया है मगर वास्तव में यह यूपी की सियासत में उनके अस्तित्व को बचाने के लिए बहुत जरूरी हो गया था। जिस तरीके से विगत लोकसभा चुनाव में बीएसपी का सफाया हो गया था और विधानसभा चुनाव में भी पार्टी महज 19 सीटों पर सिमट गयी थी, उसे देखते हुए बीएसपी को नये समीकरण की तलाश थी। इसी तरह लोकसभा चुनाव में पिटने के बाद समाजवादी पार्टी का कांग्रेस के साथ गठबंधन का फैसला विधानसभा चुनाव में गलत साबित हुआ था। ऐसे में अखिलेश को भी मायावती जैसे मजबूत जनाधार वाले सहयोगी दल की दरकार थी। इसमें संदेह नहीं कि एसपी-बीएसपी मिलकर बीजेपी को मिले वोट प्रतिशत के बराबर आ जाते हैं। मगर, गठबंधन के बाद जातीय ध्रुवीकरण के मजबूत होने और मुसलमानों के एकजुट समर्थन की उम्मीद को देखते हुए सफलता की सम्भावनाएं भी असीमित हो जीत हैं। यही इस गठबंधन की मजबूती का आधार है और यही बीजेपी के लिए चिन्ता का सबब भी।












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