विराट कोहली ही नहीं, मेंटल हेल्थ की समस्या से ग़ुजर चुके हैं कई खिलाड़ी
"दस साल में ऐसा पहली बार हुआ जब मैंने अपने बल्ले को एक महीने तक हाथ नहीं लगाया. इससे पहले मैंने ज़िंदगी में ऐसा कभी नहीं किया. मुझे इस बात का एहसास हुआ कि हाल के दिनों में एक फ़र्ज़ी किस्म की इन्टेनसिटी का दिखावा कर रहा था. मैं ख़ुद को ये बताने की कोशिश कर रहा था कि मुझमें वो इन्टेसिटी है. जबकि आपका शरीर आपसे कह रहा है कि रुको. आपका दिमाग़ आपको कह रहा है कि थोड़ा थम जाओ, ब्रेक लो."
"मुझे लोग ऐसे शख़्स के तौर पर देखते रहे हैं जो मानसिक तौर पर बहुत मज़बूत है. मैं हूँ भी. लेकिन हर किसी की एक लिमिट होती है. आपको उस लिमिट को पहचानना आना चाहिए वरना चीज़ें आपके लिए अनहेल्थी हो सकती हैं. मुझे ये मानने में कोई शर्म नहीं है कि मैं उस वक़्त मेंटली डाउन महसूस कर रहा था. मज़बूत होने का दिखावा करना कमज़ोर होने को स्वीकार करने से कहीं ख़राब बात है."
कुछ दिन पहले स्टार स्पोर्ट्स से बातचीत में जब भारत के सबसे सफल खिलाड़ियों में से एक विराट कोहली ने अपनी मेंटल हेल्थ के बारे में ये बात कही थी तो कई लोगों के लिए हैरत की बात थी.
आख़िर मैदान पर कोहली पिछले दस सालों से क्रिकेट के धुरंधर माने जाते रहे हैं, एक के बाद एक रिकॉर्ड उनके नाम रहे हैं, पिच पर उनकी बॉडी लैंग्वेज हमेशा आक्रामक रही है. जैसे को तैसे वाला उनका रवैया और मैदान पर एग्रेशन उनकी पहचान बन चुकी है.
लेकिन पिछले कुछ समय से उनके प्रदर्शन पर सवालिया निशान लग रहे हैं, उनके बल्ले से रन नहीं निकल रहे थे, सोशल मीडिया पर कई आलोचक उन्हें गेम छोड़ने की सलाह दे रहे थे.
ऐसे तो मेरा अंत नहीं हो सकता: साक्षी
कभी प्रदर्शन तो कभी चोट के कारण खिलाड़ी कई बार मानसिक तनाव का शिकार हो जाते हैं लेकिन न तो इस समस्या पर खुलकर बात भारत में बात होती है और न ही प्रोफ़ेश्नल मदद से होने वाले फ़ायदों पर.
पहलवानी में साक्षी मलिक के साथ भी कुछ ऐसा ही हुआ था. 2016 रियो ओलंपिक में साक्षी ने जब कुश्ती में पदक जीता तो रातों रात वो देश की लाडली बन गईं. हर ओर उनकी चर्चा थी. लेकिन धीरे-धीरे उनका प्रदर्शन ख़राब होता गया.
वो 16-17 साल की सोनम मलिक से चार बार हारीं. 2020 ओलंपिक में तो वो क्वालीफ़ाई भी नहीं कर पाईं और न कोई पदक जीत पा रही थीं.
बीबीसी से बातचीत में साक्षी ने बताया, "पिछले दो साल मेरे लिए बहुत चुनौतीपूर्ण रहे. मैं भारत की टीम में भी अब नहीं थी. हालांकि मैं मेहनत पूरी कर रही थी.. बहुत डिप्रेस रहने लगी थी. ऐसे में मुझे साइकोलॉजिस्ट की मदद लेनी पड़ी. मेरे अंदर जो नेगेटिविटी थी और जो काम मैं नहीं कर पा रही थी, उसे दूर करने में उन्होंने मदद की. उन्होंने मुझे कहा कि मैं रोज़ एक डायरी लिखूँ. मुझे क्या दिक्कत हो रही है वो मैं रोज़ाना लिखती. धीरे-धीरे मैंने देखा कि डायरी का रुख़ नेगेटिव से पॉज़िटिव होता गया. फिर मुझमें ये विश्वास आया कि ऐसे तो मेरा अंत नहीं हो सकता. मुझे कुछ करना होगा."
'खिलाड़ियों को कमज़ोर समझा जाता है'
20 साल की युवा पैरा-बैटमिंडन खिलाड़ी पलक कोहली ने टोक्यो पैरालंपिक में तीन वर्ग में भारत के लिए खेला था. लेकिन 2019 में 17 साल की पलक को बोनमैरो एडिमा हो गया था और वो खेल से बाहर हो गईं.
तब मानसिक तनाव से गुज़र रहीं पलक को उनके कोच से प्रोत्साहन मिला. पलक बताती हैं, "प्रैक्टिस के बाद कोच गौरव खन्ना कॉपी में रोज़ अपनी ज़िंदगी की पॉज़िटिव चीज़ें लिखने को बोलते और एक तरफ़ नेगेटिव चीज़ें लिखने को बोलते. जब मैं कॉपी देखती तो मैंने पाया कि ज़िंदगी में पॉज़िटिव चीज़ों की लिस्ट बहुत लंबी है और नेटेगिव चीज़ों की लिस्ट बहुत छोटी. और वो ऐसी चीज़ें हैं जो समय के साथ ठीक हो सकती हैं. इस वजह से मैं उस नेगेटिव मानसिकता से बाहर आ पाई."
लेकिन इस तरह की मदद हमेशा से खिलाड़ियों के लिए उपलब्ध नहीं रही हैं. वरिष्ठ खेल पत्रकार विजय लोकपल्ली कई दशकों से खेल पत्रकारिता कर रहे हैं और खिलाड़ियों और उनसे जुड़े मानसिक दबाव को करीबी से देखा-समझा है.
खिलाड़ियों के नाम सार्वजनिक न करते हुए विजय लोकपल्ली कहते हैं, "मैंने कई खिलाड़ियों को चुपचाप इस दबाव को झेलते और परेशान होते हुए देखा है. ये देखना तकलीफ़देह होता है क्योंकि कई बार किसी मैच में हार के लिए वो ख़ुद को ज़िम्मेदार मानते हैं और डिप्रेशन में चले जाते हैं. पहले के दिनों में तो टीम के अधिकारियों को भी नहीं बता सकते थे क्योंकि उस खिलाड़ी को कमज़ोर समझकर चिन्हित कर दिया जाता था कि वो दबाव नहीं झेल सकता. कई बार वो खिलाड़ी बिल्कुल ख़ुद में गुम हो जाता था जो उनके प्रदर्शन को और भी प्रभावित करता था. खुल कर भले वो सामने न आएं हो लेकिन मैं कई खिलाड़ियों को टूटते हुए देख चुका हूँ."
परफ़ॉर्मेंस के अलावा भी कई तरह के दबाव
मेंटल हेल्थ को लेकर विरोट कोहली के बयान ने भारत में खिलाड़ियों की मानसिक सेहत को लेकर बहस छेड़ दी है और इस बहस का दायरा खिलाड़ी के तात्कालिक परफ़ॉर्मेंस से कहीं बड़ा है और ये समस्या कोई नई नहीं है. भारत और भारत से बाहर ऐसे किस्से भरे पड़े हैं. हालांकि ज़रूरी नहीं कि ये सारे दबाव खेल से ही जुड़े हुए हों. हो सकता है कि इसका नाता उनकी निजी ज़िंदगी या पर्सनेलिटी से हो.
सार्वजनिक हस्ती होने के नाते पब्लिक और मीडिया की नज़र हमेशा खिलाड़ियों पर बनी रहती है लेकिन ऐसा ज़रूरी नहीं कि हर खिलाड़ी इस मीडिया प्रेशर को लेकर सहज हो जो मानसिक दबाव का कारण बन सकता है.
जैसे 2021 फ्रेंच ओपन में मैच जीतने के बाद टेनिस खिलाड़ी नाओमी ओसाका ने प्रेस कॉन्फ़्रेस में आने से मना कर दिया था जिसके बाद आयोजकों ने उन्हें बाहर करने की चेतावनी दी थी. उसके बाद वर्ल्ड नंबर 2 रही नाओमी ओसाका ने अचानक अपना नाम फ्रेंच ओपन से ही वापस ले लिया था.
बाद मे नाओमी ने बताया, "2018 में यूएस ओपन के बाद से ही मैं डिप्रेशन का शिकार हूँ. और जो भी मुझे जानता है उसे पता है कि मैं इंट्रोवर्ट हूँ. अपनी सोशल एंग्ज़ाइटी से ध्यान हटाने के लिए मैं अकसर हैडफोन लगाकर बैठी रहती हूँ. मीडिया वाले अच्छे से पेश आते हैं लेकिन मैं सार्वजनिक मंच पर स्वाभाविक स्पीकर नहीं हूँ. मीडिया के सामने बोलते वक़्त मुझे बहुत एंग्ज़ाइटी और घबराहट होती है."
'ब्रेक लेने की वजह से नज़रिया बदल गया'
मेंटल हेल्थ को लेकर और भी कई खिलाड़ी हैं जो खेल से ब्रेक ले चुके हैं.
मसलन क्रिकेटर बेन स्टोक्स को लीजिए. पिछले साल जुलाई में इंग्लैंड और भारत के बीच टेस्ट सिरीज़ शुरू होने वाली थी- दो बड़े क्रिकेट सुपरपावर के बीच मुकाबला. और अचनाक बेन स्टोक्स का बयान आया कि वो तात्कालिक प्रभाव से क्रिकेट से अनिश्चितकाल के लिए ब्रेक ले रहे हैं. उन्होंने भारत के खिलाफ़ सिरीज़ से भी ख़ुद को अलग कर लिया ताकि अपनी मानसिक सेहत पर ध्यान दे सकें.
जब बेन स्टोक्स ने दोबारा खेलना शुरू किया तो बीबीसी को दिए इंटरव्यू में उन्होंने खुल कर अपनी बात रखी. उन्होंने कहा था कि कई सालों तक अपने जज़्बातों को अंदर बंद करके रखने की वजह से उन्हें पैनिक अटैक होने लगे थे और एक दिन मानो विस्फोट हो गया.
दरअसल बेन स्टोक्स की ज़िंदगी में एक के बाद एक कुछ न कुछ घट रहा था. 2020 में बेन ने अपने पिता के साथ रहने के लिए ब्रेक लिया जिन्हें ब्रेन कैंसर था. उसी साल उनके पिता की मौत हो गई. अपने पिता के बेहद करीब रहे बेन पर इसका गहरा असर पड़ा.
टीम में वापस आते ही उनकी उंगली टूट गई लेकिन 2021 में उन्हें जल्दबाज़ी में वापस आकर टीम की कप्तानी संभालने पड़ी. कोविड के बाद अचानक हालात बदल गए और खिलाड़ियों को लंबे समय तक क्वारनटाइन में रहना पड़ा.
इससे पहले 2017 में उन पर एक नाइटक्लब में सार्वजनिक तौर पर झगड़ा करने का आरोप लगा. घटना के कई महीनों बाद तक उन्हें टीम में नहीं लिया गया. लेकिन 2018 में उन्हें निर्दोष घोषित किया गया.
इस सबके बारे में बेन ने बताया, "जब मैंने ब्रेक लिया तो इसे बहुत नकारात्मक तरीके से लिया गया, ख़ासकर जब मुझे कप्तान बनाया गया. ऐसा लगा जैसे लोग कह रहे हों कि मैं अपना काम ठीक से नहीं कर सकता क्योंकि मैंने ब्रेक लिया है. नाइटक्लब वाली घटना का असर मेरे परिवार पर ज़िंदगी भर रहेगा. मुझे कभी न कभी अपने बच्चों को बताना पड़ेगा कि आख़िर क्या हुआ था. मानसिक सेहत को बरकरार रखने के लिए मैंने जब ब्रेक लिया तब मुझे लगा था कि मैं कभी वापसी कर ही नहीं पाऊँगा."
सफलता बनी डिप्रेशन की वजह- बिंद्रा
क्रिकेट से लेकर टेनिस और जिमनास्टिक्स जैसे तमाम खेलों से जुड़े खिलाड़ी इस दबाव से गुज़र चुके हैं. और ये दबाव सिर्फ़ ख़राब प्रदर्शन का ही नहीं, कई बार सफलता भी बोझ बनकर सामने आती है.
ओलंपिक में भारत को पहला गोल्ड दिलाने वाली अभिनव बिंद्रा इस पर खुल कर बात करते रहे हैं.
2021 में उन्होंने कहा था, "ये विरोधाभासी है कि मेरी ज़िंदगी का सबसे बड़ा मेंटल क्राइसिस तब आया जब मैं सफल हो गया. बीजिंग ओलंपिक से पहले 16 साल तक मैं सिर्फ़ एक लक्ष्य को लेकर मेहनत कर रहा था. एक दिन वो लक्ष्य पूरा हो गया और मेरे जीवन में एक खालीपन आ गया. मुझे समझ नहीं आ रहा था कि मुझे अपनी ज़िंदगी के साथ अब क्या करना है. मेरी पूरी ऊर्जा ख़त्म हो गई. जीवन में लक्ष्य नहीं होता तो ज़िंदगी बेमतलब लगने लगती है. तब मैंने प्रोफ़ेश्नल मदद ली थी."
ज़ाहिर है खिलाड़ियों पर दबाव कई तरह के हो सकते हैं- प्रदर्शन से जुड़े, स्वभाव से जुड़े या निजी ज़िंदगी से जुड़े. दुनिया की बेहतरीन खिलाड़ी सिमोइन बाइल्स ने भी मेंटल हेल्थ की वजह से ओलंपिक के दौरान नाम वापस ले लिया था और मेडल जीतने का अपना चांस छोड़ा था.
क्या कहते हैं खेल मनोवैज्ञानिक
विशेषज्ञ मानते हैं कि खिलाड़ियों की फ़िनटेस को लेकर ही नहीं मनोवैज्ञानिक स्तर पर भी उनके साथ काम करना बहुत ज़रूरी है.
बीबीसी मराठी की संवाददाता जान्हवी मूले से बातचीत में खेल मनोवैज्ञानिक मुगधा धमनकर ने बताया, "अब सिमोन और नाओमी जैसे बड़े खिलाड़ी बोलने लगे हैं. एक खेल मनोवैज्ञानिक के तौर पर मैं ख़ुश हूँ. लेकिन ये सिर्फ़ बड़े या सफल खिलाड़ियों की ही बात नहीं है. जो खिलाड़ी बिल्कुल नए हैं या शुरुआत कर रहे हैं उन्हें भी मेंटल हेल्थ पर ध्यान देने की ज़रूरत है. अगर छोटी उम्र में ही मेंटल ट्रेनिंग खिलाड़ियों को मिलेगी तो ये बहुत फ़ायदेमंद होगा. जैसे-जैसे शरीर का विकास होता है, अलग-अलग तजुर्बों के साथ दिमाग़ का भी विस्तार होता है. युवा खिलाड़ियों को बहुत सारी नेगेटिविटी, दबाव झेलना पड़ता है, उम्मीदों का भी बोझ होता है जो अप्रत्यक्ष और एक अंजान से तरीके से उन पर असर डालता है."
मुगधा बताती हैं कि कई बार तो खिलाड़ी इस वजह से खेल को ही अलविदा कह देते हैं जबकि कई खिलाड़ी साल दर साल इस मानसिक तनाव के साथ ही खेलते रहते हैं.
बचपन से मिले मेंटल ट्रेनिंग
ओलंपिक चैंपियन और हालिया कॉमनवेल्थ गेम्स में गोल्ड मेडल जीतने वालीं मीराबाई चानू भी डिप्रेशन का शिकार रही हैं.
बीबीसी से बातचीत में उन्होंने बताया था कि 2016 ओलंपिक में बेहद ख़राब प्रदर्शन के बाद वो हमेशा के लिए खेल छोड़ देना चाहती थीं लेकिन उनके कोच और माँ ने लगातार उनकी काउंसलिंग की और उन्हें ऐसा करने से रोका.
खेल मनोवैज्ञानिक मुगधा के मुताबिक ज़रूरी है कि कम उम्र से ही मेंटल हेल्थ के बारे में खिलाड़ियों को सिखाया जाए ताकि वो खिलाड़ी मैदान पर जाकर सिर्फ़ अपने प्रदर्शन पर ध्यान दे सकें, और अगर उन्हें दिक्कत हो भी तो खिलाड़ी से जुड़ा पूरा सामाजिक, पारिवारिक और स्पोर्ट्स सिस्टम उसकी ढाल बनकर खड़ा रहे.
साक्षी और पलक जैसे खिलाड़ी उस ढाल की मिसाल हैं.
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