'मौन' मोहन से 'मौन' मोदी तक, क्यों भारतीय राजनीति में बढ़ रही है चुप्पी!
देश के सर्वोच्च स्तर पर एकदम सन्नाटा है। हम हिमालय पर्वत की बात नहीं कर रहे हैं। (अगर आपने कभी चढ़ाई की हो और एकांत का अनुभव हो किया हो तो आप इसे समझ सकते हैं।) लेकिन हम उन दो 'ऊंचे' नेताओं की बात जरूर कर रहे हैं, जो भारत के सर्वोच्च पद पर रहे लेकिन कई महत्वपूर्ण मुद्दों पर चुप रहे। आप साल 2012 का वो समय याद करिए जब गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी, जो तत्कालीन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह पर भ्रष्टाचार के कई मुद्दों को लेकर हमला करते थे। मोदी, उन्हें 'मौन' मोहन सिंह कहते थे। हालांकि बीते 6 सालों में कुछ खास नहीं बदला है। खासतौर से चुप्पी की राजनीति अभी भी भारत में है। यह बात अलग है कि 'मौन'मोदी ने 'मौन' मोहन सिंह की जगह बतौर देश के 'प्रधान सेवक' आ गए हैं।

अपने पूर्ववर्ती की तरह पर पीएम मोदी भी पूरी तरह से साइलेंट मोड में चले गए हैं, खासतौर उस वक्त जब राष्ट्र किसी संकट में होता है। अन्यथा वो बहुत बोलते हैं, अमूमन चुनावी रैलियों में। पंजाब नेशनल बैंक (पीएनबी) में घोटाले के बाद, पीएम मोदी ने इस पूरे मामले पर एक शब्द नहीं बोला है।
समस्याओं से भागने में प्रधानमंत्री का कोई जवाब नहीं है। हर बार जब देश संकट में होता है तब कहीं दूर तक नहीं दिखते। चाहे अल्पसंख्यकों पर गौ रक्षकों के हमला रने का मामला हो, विवादित राफल डील हो या फिर हालिया पीएनबी-नीरव मोदी घोटाला, मोदी जी अपने पूर्ववर्ती की तरह 'मौन' हैं। पीएनबी-नीरव मोदी घोटाले में भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) और राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) की सरकार की भूमिका पर सवाल उठाते हुए विपक्षी दल कांग्रेस ने सोमवार को प्रधानमंत्री को 'मौन मोदी' कहा। कांग्रेस ने ट्वीट किया था कि भारत की सबसे बड़ी बैंक लूट के बाद से 5 दिन और प्रधानमंत्री मोदी चुप है राष्ट्र को उत्तर की जरूरत है।












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