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मणिपुर में सदमे से कब उबरेंगे 100 से ज्यादा बच्चे? 12,694 विस्थापित बच्चों पर चौंकाने वाली रिपोर्ट

मणिपुर में जातीय संघर्ष की वजह से लगभग 50,000 लोग अपने ही राज्य में विस्थापित हो गए हैं। इन विस्थापितों में 12,694 बच्चे भी हैं, जो प्रदेश के विभिन्न राहत-कैंपों में रह रहे हैं। अब सरकार की ओर से वह आंकड़े जारी किए गए हैं, जिससे यह खुलासा हुआ है कि कितने बच्चे गंभीर सदमे में हैं और उन्हें प्रोफेशनल काउंसिलंग की जरूरत पड़ी है।

मणिपुर समाज कल्याण विभाग की ओर से जारी आंकड़ों के मुताबिक राज्य में 100 से ज्यादा बच्चे हिंसा की वजह से बहुत ही गंभीर सदमे में हैं। विभाग की ओर से जारी प्रेस रिलीज में कहा गया है कि विभाग के योग्य डॉक्टरों और बाल मनोचिकित्सकों की टीम स्वयंसेवकों के तौर पर ऐसे सदमे से गुजर रहे लोगों को परामर्थ दे रहे हैं।

manipur traumatised children

बच्चों के बहुत जल्द सामान्य होने की उम्मीद- डायरेक्टर,समाज कल्याण विभाग
समाज कल्याण विभाग के डायरेक्टर एनजी उत्तम सिंह ने कहा, 'जब भी उन्हें गंभीर सदमे वाले बच्चे मिलते हैं, उनकी पहचान की जाती है और उन्हें प्रोफेशनल काउंसलर के पास ले जाया जाता है। हमने यह 100 से कुछ ज्यादा बच्चों के साथ किया है। हमें उम्मीद है कि यह संख्या नहीं बढ़ेगी और सदमे से पीड़ित ये बच्चे बहुत ही जल्द सामान्य हो जाएंगे।'

'प्रोफेशनल काउंसिलिंग की जरूरत'
उनके मुताबिक, 'हो सकता है कि एक बच्चा तुरंत ही सदमे में न जाए। लेकिन, यह सदमा एक हफ्ते या एक महीने बाद भी आ सकता है।' उन्होंने कहा कि जिला बाल सुरक्षा अधिकारी के माध्यम से सभी जिलों में कांउसलरों को लगाया गया है कि ताकि विस्थापित बच्चों के मानसिक स्वास्थ्य से संबंधित समस्याओं का निदान किया जा से। वह राहत कैंपों में बच्चों के पास जाते हैं और उन बच्चों की पहचान करते हैं, जिन्हें वास्तव में प्रोफेशनल काउंसिलिंग की जरूरत है।

पीड़ित बच्चों की पहचान के लिए खास तकनीक का इस्तेमाल
बाल मनोचिकित्सक डॉ जीना हेइग्रुजम ने पोस्ट-ट्रॉमेटिक स्ट्रेस डिजऑर्डर वाले बच्चों की पहचान के लिए कई राहत कैंपों का दौरान किया है। उन्होंने कहा है कि मानसिक स्वास्थ्य बहुत ही गंभीर समस्या न पैदा कर दे, इसके लिए प्रोफेशनल काउंसलिंग जरूरी है। ऐसे बच्चों की पहचान के लिए ये विशेषज्ञ 'खेल और डांस' जैसे तकनीकों का इस्तेमाल करते हैं, ताकि तनाव से पीड़ित बच्चों की पहचान की जा सके।

इसके बाद ऐसे बच्चों को किसी भी चीज का स्केच बनाने के लिए भी कहा जाता है, जो उन्हें पसंद हो। इसके अलावा यूनिसेफ की सलाह पर राहत कैंपों में इस बात की भी पड़ताल की जा रही है कि वह बच्चों के लिए उपयुक्त हैं या नहीं। क्योंकि, ऐसे राहत कैंप तो योजनाबद्ध तरीके से बनाए नहीं गए हैं और आनन-फानन में इनकी व्यवस्था करनी पड़ी है।

कुपोषित बच्चों का भी चल रहा है इलाज
इसके अलावा कुपोषित बच्चों की भी निगरानी की जा रही है और ऐसे बच्चों को इलाज के लिए इंफाल स्थित सरकारी जेएमआईएमएस में भेजा जा रहा है। रिलीज के मुताबिक अबतक ऐसे 16 बच्चों को इलाज हो चुका है, जो बुरी तरह से कुपोषित थे। बच्चों की स्थिति की पड़ताल के लिए राज्य के मुख्य सचिव डॉक्टर विनीत जोशी खुद भी राहत कैंपों में जा रहे हैं और हालात का जायजा ले रहे हैं।

मणिपुर में 3 मई से जातीय संघर्ष जारी है। इसमें 150 से भी ज्यादा लोगो की जान जा चुकी है और 50,000 से अधिक लोग विस्थापित भी हो चुके हैं। इसको लेकर देश में राजनीति भी खूब हो चुकी है।

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