पुण्यतिथि विशेष: महात्मा गांधी थे बैरिस्टर, कितना पढ़ा-लिखा था नाथूराम गोडसे
Mahatma Gandhi Death Anniversary Date: कोंकणी ब्राह्मण परिवार में जन्मे नाथूराम गोडसे की मां का नाम लक्ष्मी और पिता का नाम विनायक राव था। वह इनका चौथा बेटा था। उसका परिवार पुणे के बारामती का रहने वाला था।
नाथूराम का पूरा नाम रामचंद्र विनायक गोडसे था। लेकिन, एक घटना की वजह से वह नाथूराम गोडसे के नाम से लोकप्रिय हो गया। दरअसल, उसके माता-पिता ने उसे नाक में नथ पहना दिया था, जिसकी वजह से वह नाथूराम के नाम से चर्चित हो गया।

नाक में नथ की वजह से बन गया नाथूराम
गोडसे के माता-पिता को आशंका थी कि उनका परिवार किसी शाप से पीड़ित है, जिसकी वजह से उनके बेटों की बचपन में ही मौत हो जाती है।
गोडसे के तीन भाई और एक बहन थे, जिनमें से तीनों भाइयों की मृत्यु बहुत छोटी सी उम्र में हो गई थी। इसी शाप उबरने के लिए उसके नाक में नथ डाली गई थी।
हाई स्कूल की शिक्षा पूरी नहीं कर पाया था गोडसे
बारामती के स्थानीय स्कूल से प्राथमिक शिक्षा (5वीं) पूरी करने के बाद उसके पिता ने अंग्रेजी माध्मय की शिक्षा के लिए उसे मौसी के घर पढ़ने के लिए पुणे भेज दिया।
लेकिन, गोडसे का पढ़ाई में मन नहीं लगता था। हाई स्कूल की परीक्षा में वह अंग्रेजी के पेपर में फेल कर गया, जिसके चलते वह ड्रिग्री प्राप्त नहीं कर सका।
गोडसे को स्कूलों से घृणा हो गई थी
बाद में गोडसे को स्कूलों से एक तरह से घृणा हो गई थी। उसने अपने कई बयानों में इसके बारे में चर्चा की है। लिहाजा वह पढ़ाई छोड़कर अपने घर वापस आ गया और ऐक्टिविस्ट बन गया। वह हिंदू महासभा से जुड़ गया।
शुरू में महात्मा गांधी का बहुत बड़ा भक्त था गोडसे!
कहा जाता है कि स्कूली शिक्षा के दौरान वह महात्मा गांधी का कट्टर अनुयायी था और 1930 में सविनय अवज्ञा आंदोलन में भी हिस्सा लिया था।
खुद अपना अखबार निकालता था गोडसे
पढ़ाई-लिखाई छोड़ने के कुछ समय बाद नाथूराम गोडसे ने 'अग्रणी' नाम से अपना खुद का अखबार निकालने लगा। वह इसका संपादक था। उसके विचारों और लेखों को कई अखबारों में भी जगह मिलती थी।
महात्मा गांधी को गोली मारने के बाद भी भागा नहीं गोडसे
30 जनवरी, 1948 को दिल्ली के बिड़ला हाउस में महात्मा गांधी की हत्या के बाद भी उसने भागने की कोशिश नहीं की थी। हालांकि, उसे गिरफ्तार किया गया और शिमला के पीटरहॉफ स्थित पंजाब हाई कोर्ट में मुकदमा चलाया गया।
महात्मा गांधी के बेटों को गोडसे से मिलने की इजाजत नहीं मिली
1949 में उसे मृत्यु दंड की सजा मुकर्रर की गई। इस दौरान महात्मा गंधी के दो पुत्रों मणिलाल और रामदास गांधी ने उससे संपर्क करने का अनुरोध किया, लेकिन भारत सरकार की ओर से इस गुजारिश को ठुकरा दिया गया।
उसी साल 15 नवंबर, 1949 को अंबाला जेल में उसे फांसी दे दी गई।
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