Maharashtra Shiv Sena Verdict: स्पीकर का फैसला 'परिवारवादी' पार्टियों के लिए क्यों है खतरे की घंटी?
महाराष्ट्र विधानसभा के स्पीकर राहुल नार्वेकर ने जिस तरह से शिवसेना विधायकों की अयोग्यता के मामले में मुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे की शिवसेना के दावों को सही ठहराया है, उसे कानून के जानकार 'परिवारवादी' पार्टियों के लिए खतरे की घंटी होने की ओर इशारा कर रहे हैं।
स्पीकर के फैसले में 'परिवारवादी' पार्टियों के नजरिए से दो बातें बहुत ही महत्वपूर्ण हैं। एक कि उद्धव ठाकरे को शिवसेना में बगावत के बाद एकनाथ शिंदे को पार्टी में उनके पद से हटाने का कोई अधिकार नहीं था। दूसरा ये कि पार्टी का नेता 'पार्टी' नहीं होता।

वंशवादी राजनीति की समाप्ति का संकेत- एकनाथ शिंदे
यही वजह है कि मुख्यमंत्री शिंदे ने फैसला आने के बाद तुरंद दी गई प्रतिक्रिया में कहा, 'ये फैसला वंशवादी राजनीति (dynastic politics) की समाप्ति का संकेत है। एक राजनीतिक दल किसी की निजी संपत्ति नहीं होती। मैं शुरू से ही कह रहा हूं कि हमारे पास बहुमत है और लोकतंत्र में ही मायने रखता है।'
इसी तरह का फैसला अन्य मामलों में भी संभावित- शरद पवार
अगर इस फैसले पर एनसीपी संस्थापक शरद पवार की तत्कालिक प्रतिक्रिया को देखें तो यह और भी स्पष्ट हो जाता है कि महाराष्ट्र विधानसभा के अध्यक्ष ने कैसे कुछ नेताओं की दुखती रग पर हाथ रख दी है।
उन्होंने कहा है, 'फैसला संवैधानिक प्रावधानों और सुप्रीम के फैसलों पर आधारित नहीं है। इसलिए इसी तरह का फैसला अन्य मामलों में भी संभावित है...... ' दरअसल, शिवसेना की तरह ही एनसीपी के विवाद का मामला भी स्पीकर के पास लंबित है।
अजित पवार के पास शरद गुट से ज्यादा विधायक
एनसीपी के संस्थापक शरद पवार और उनके भतीजे अजित पवार गुट की ओर से एक-दूसरे खेमे के विधायकों की अयोग्यता के मामले पर भी राहुल नार्वेकर को इसी महीने फैसला सुनाना है।
सुप्रीम कोर्ट ने इसके लिए 31 जनवरी तक की तारीख तय की हुई है। तथ्य यह है कि अजित गुट के साथ भी विधायकों की संख्या शिंदे की तरह ही ज्यादा है।
'पार्टी के आंतरिक-लोकतंत्र पर ज्यादा विश्वसनीयता दिखाई गई'
कानून के जानकारों का कहना है कि शिवसेना विधायकों के मामले में स्पीकर राहुल नार्वेकर के फैसले की सबसे महत्वपूर्ण बात यही है कि इसमें पार्टी के आंतरिक-लोकतंत्र पर ज्यादा विश्वसनीयता दिखाई गई है।
इनका कहना है कि एक नेता के राजनीतिक वर्चस्व को स्थापित करने को लेकर किसी सदस्य को अयोग्य ठहराने के लिए दलबदल-विरोधी कानून का इस्तेमाल नहीं किया जा सकता।
पार्टी का नेता अकेले पूरी पार्टी की आवाज नहीं- महाराष्ट्र के पूर्व महाधिवक्ता
टीओआई की एक रिपोर्ट के मुताबिक महाराष्ट्र के पूर्व महाधिवक्ता एसजी अनेय ने कहा है, 'शिवसेना समेत कोई भी राजनीतिक दल यह दावा नहीं कर सकता कि अकेले पार्टी के नेता की आवाज ही पूरी पार्टी की आवाज है।'
परिवार नियंत्रित पार्टियों के लिए फैसला महत्वपूर्ण- वरिष्ठ वकील
वहीं, वरिष्ठ वकील अरविंद दतार का कहना है, 'इस तरह का विवाद पार्टी के भीतर लोकतांत्रिक प्रक्रिया के आधार पर अपना नेता चुनने के लिए उचित चुनाव की जरूरत की ओर इशारा करता है। यह खास तौर पर तब और प्रासंगिक है, जब पार्टियों को एक परिवार नियंत्रित कर सकता है..'
नेता नहीं, पार्टी का संविधान महत्वपूर्ण- एक्सपर्ट
एक बात और गौर करने वाली है कि स्पीकर ने शिवसेना के 1999 वाले संविधान को मान्यता दी है जो कि चुनाव आयोग में जमा है। कानून के जानकारों का कहना है कि स्पीकर का यह नजरिया उचित है, क्योंकि पार्टी ने 2018 वाला संविधान चुनाव आयोग में जमा ही नहीं किया।
एसजी अनेय के मुताबिक,'फैसले के अनुसार राजनीतिक दलों को अपना बर्ताव किसी एक नेता के आधार पर नहीं, बल्कि अपनी पार्टी के संविधान के आधार पर बनाना चाहिए।'
लोकतांत्रिक ढांचे में असहमति की आवाज उठाने वालों के लिए फैसला अहम-वकील
वरिष्ठ वकील महेश जेठमलानी की अगुवाई वाली एकनाथ शिंदे की लीगल टीम के एक सदस्य उत्सव त्रिवेदी का कहना है,'यह स्वीकार करने के साथ ही कि हमारे लोकतांत्रिक ढांचे में एक व्यक्ति का अकेला कोई स्थान नहीं है, ये न केवल हमारे क्लाइंट की जीत है, बल्कि उन सभी की जीत है, जो हमारे लोकतांत्रिक ढांचे के अंदर असहमति की आवाज उठाते हैं।'












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