Maharashtra: बीजेपी को राज ठाकरे पर क्यों बढ़ गया भरोसा, क्या उद्धव की काट खोज रहे हैं अमित शाह?
Maharashtra Lok Sabha Election 2024: महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना (एनएनएस) के चीफ राज ठाकरे को अपने चाचा बाल ठाकरे की सियासी छत्रछाया से निकले करीब दो दशक बीत चुके हैं, लेकिन वह एक बार को छोड़कर कभी भी अपनी खास सियासी ताकत नहीं दिखा पाए हैं।
फिर भी जिस तरह से उन्होंने बेटे के साथ दिल्ली आकर केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह से मुलाकात की है और उनकी पार्टी के एनडीए या महायुति में शामिल होने की अटकलें लग रही हैं, उससे सवाल उठता है कि महाराष्ट्र में बीजेपी को 2.25% वोट शेयर वाली मनसे क्यों चाहिए?

सियासी हाशिए पर पहुंच चुके हैं राज ठाकरे
राज ठाकरे की पार्टी 2019 के महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव में 101 सीटों पर लड़ी थी और 86 पर उसकी जमानतें जब्त हो गई थी। पार्टी सिर्फ 1 ही सीट जीत पाई और उसे 2.25% वोट मिले थे।
महायुति में सीटों के बंटवारे में फंसे पेच के बीच बातचीत का 'राज'
महाराष्ट्र में बीजेपी, शिवसेना (मुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे) और एनसीपी (उपमुख्यमंत्री अजित पवार) का महायुति गठबंधन है। इन दलों के बीच राज्य की 48 लोकसभा के लिए अभी तक सीटों का बंटवारा नहीं हो पाया है। उसके बावजूद अगर भाजपा राज ठाकरे से बात कर रही है तो इसके राजनीतिक 'राज' को समझना होगा।
बीजेपी के लिए बिहार से अलग है महाराष्ट्र की परिस्थिति
बिहार में भी बीजेपी के सामने खासकर एलजेपी की वजह से सीटें फाइनल करने में दिक्कत हो रही थी। लेकिन, पार्टी ने एक सांसद वाले चिराग पासवान की एलजेपी (रामविलास) पर यकीन किया और 5 सांसदों वाले केंद्र में सहयोगी उनके चाचा पशुपति पारस की राष्ट्रीय लोक जनशक्ति पार्टी को एक भी सीट नहीं दी।
इसकी वजह ये रही कि भले ही पारस के पास सांसद थे, लेकिन पासवान वोट बैंक चिराग के साथ ही माना जा रहा है। महाराष्ट्र में भारतीय जनता पार्टी के सामने इसके ठीक उलट परिस्थिति नजर आ रही है।
उद्धव ठाकरे के प्रति 'सहानुभूति' कुंद करने के काम आ सकते हैं राज
मुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे की पार्टी को शिवसेना नाम और चुनाव निशान तो मिल चुका है। अधिकांश सांसद और विधायक भी उनके साथ जुटे हुए हैं। लेकिन, दावे के साथ कोई नहीं कह सकता कि ठाकरे के नाम पर मिलने वाले वोट भी उनके साथ आ चुके हैं।
महाराष्ट्र की राजनीति पर पकड़ रखने वाले कई जानकारों को लगता है कि शिवसैनिकों का बड़ा तबका अभी भी उद्धव ठाकरे को सहानुभूति के नजरिए से देखता है। भाजपा के लिए राज ठाकरे उसी सहानुभूति को कुंद करने के काम आ सकते हैं।
हिंदुत्व के मुद्दे पर उद्धव को घेरने के काम आ सकते हैं राज
बीजेपी और एमएनए के बीच क्या डील चल रही है, इसका खुलासा नहीं हुआ है। लेकिन, राज ठाकरे की पार्टी के नेता संदीप देश पांडे की बात पर गौर करें तो इससे निकलने वाले संकेत को परखा जा सकता है।
उन्होंने कहा है, 'चाहे जो भी निर्णय होगा, वो मराठी, हिंदुत्व और पार्टी के हित वाला होगा; व्यापक भलाई के देखकर लिया जाएगा।' मतलब, भाजपा बाल ठाकरे के हिंदुत्व के सच्चे उत्तराधिकारी के तौर पर राज ठाकरे को पेश कर सकती है, जिससे नजर फेर लेने की वह उद्धव पर आरोप लगाती है।
मराठी मानुष की छवि में भी फिट बैठ सकते हैं राज
एक प्रश्न और पूछा जा रहा है कि राज ठाकरे की छवि उत्तर भारतीयों के आक्रामक विरोध वाली रही है, भाजपा इससे कैसे छुटकारा पाएगी।
दरअसल, पार्टी को लगता है कि समय के साथ राज ठाकरे उस छवि को काफी पीछे छोड़ चुके हैं और अब उनका चेहरा हिंदुत्व और मराठी मानुष के लिए आवाज उठाने वाले नेता का बन चुका है।
महाराष्ट्र के उपमुख्यमंत्री और प्रदेश में बीजेपी के दिग्गज नेता देवेंद्र फडणवीस ने एक टीवी चैनल से कहा भी था कि 'पहले भारतीय जनता पार्टी को उनके (राज ठाकरे) साथ तालमेल करने में दिक्कत थी, लेकिन अब मुझे लगता है कि कोई परेशानी नहीं होनी चाहिए।'
सियासी हाशिए से मुख्यधारा में आ सकते हैं राज ठाकरे
यह बात नहीं है कि बीजेपी को ही राज ठाकरे की जरूरत है। सच्चाई ये है कि भाजपा के साथ जुड़कर प्रदेश की राजनीति में वे खुद प्रासंगिक बन सकते हैं।
क्योंकि, 18 वर्षों के संघर्ष में उनकी पार्टी सिर्फ 2009 के विधानसभा चुनाव में ही 13 सीटें जीत पाई थी। उसके अलावा कभी भी उनका सितारा बुलंद नहीं रहा।
बीजेपी के लिए उन्हें गठबंधन में लेने में इसलिए कोई दिक्कत भी नहीं है, क्योंकि शिंदे की ताजपोशी के साथ ही इनके बीच गर्मजोशी नजर आने लगी थी।
दूसरी तरफ शिवसेना (उद्धव बाल ठाकरे) है, जो उन्हें विपक्षी महा विकास अघाड़ी में शामिल होने का निमंत्रण देने पर अपनी ही सहयोगी एनसीपी शरदचंद्र पवार को भी आंखें दिखाने से परहेज नहीं कर रही।












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