महाराष्ट्र में 9 सीटों पर क्यों सिमटी बीजेपी? 'शुभचिंतकों' ने दिखाया आईना

यूपी से लेकर महाराष्ट्र तक लोकसभा चुनावों में बीजेपी के खराब प्रदर्शन को लेकर पार्टी के अंदर और बाहर की बहस खत्म नहीं हो रही है। अब आरएसएस से जुड़ी एक मराठी साप्ताहिक ने पार्टी को आईना दिखाने का काम किया है।

मराठी साप्ताहिक 'विवेक' ने महाराष्ट्र में भाजपा के खराब प्रदर्शन के लिए अजित पवार की एनसीपी के साथ गठबंधन को बड़ी वजह बताया है। इसके साथ इसने पार्टी में कार्यकर्ताओं और प्रदेश की महायुति सरकार के साथ संवादहीनता को भी इसका कारण बताया है।

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एनसीपी से गठबंधन को पचा नहीं पाए भाजपा कार्यकर्ता- मराठी साप्ताहिक
'विवेक' ने अपने ताजा अंक में लिखा है, 'प्रत्येक (बीजेपी) कार्यकर्ता लोकसभा चुनाव (महाराष्ट्र) में नाकामी की बेचैनी और कारणों का जिक्र करते समय, एनसीपी के साथ गठबंधन से शुरू करता है। यह साफ है कि भाजपा के कार्यकर्ताओं ने एनसीपी से हाथ मिलाना पसंद नहीं किया। यहां तक कि बीजेपी के नेता भी यह जानते हैं।'

'एनसीपी को साथ लाने में नाराजगी थी'
मराठी पत्रिका के मुताबिक हिंदुत्व की वजह से शिवसेना के साथ गठबंधन 'स्वाभाविक' है। चाहे कुछ दिक्कतें भी हों। लेकिन, 'एनसीपी को साथ लाने में नाराजगी थी। लोकसभा के नतीजों ने सिर्फ नाराजगी ही बढ़ाई है। पार्टियां और नेता अपनी गणना करते हैं, लेकिन अगर वह गलत हो जाए तो? इसका जवाब देने की आवश्यकता है।'

बाहरी लोगों के बढ़ते दबदबे से भी परेशान हो रहे हैं पार्टी कार्यकर्ता- विवेक
इस लेख में यह भी दावा किया गया ह कि भाजपा ही एकमात्र पार्टी है, जिसमें कार्यकर्ताओं में से ही नेता बनने की स्वाभाविक प्रक्रिया बनी हुई है। लेकिन, इसमें लिखा गया है कि अब कार्यकर्ताओं को इसको लेकर भी संदेह होने लगा है।

इस लेख के अनुसार, 'जमीनी स्तर पर पार्टी के पदों का इस्तेमाल पार्टी के विकास के लिए होना चाहिए। यह अहम बात है कि पार्टी इस बात पर आत्ममंथन करे कि वह ये पद किसको दे रही है - पार्टी के मूल कार्यकर्ताओं को या बाहर से आए लोगों को।'

संघ से जुड़ी इस मैगजीन का कहना है कि हिंदुत्व की विचारधारा की वजह से समाज के विभिन्न वर्गों से आने वाले कार्यकर्ता सिर्फ पार्टी का पद ही नहीं चाहते, यह भी चाहते हैं कि उनकी बात सुनी जाए।

'भाजपा का बड़ा समर्थक वर्ग असहज है'
लेकिन, 'हिंदुत्व, शासन, इंडस्ट्री, बिजनेस, इकोनॉमी, शिक्षा और रोजगार पर उन्हें संतोषजनक जवाब नहीं मिला। सभी जातियों का शिक्षित मध्यम वर्ग आज की सच्चाई है और 2014 से 2019 तक बीजेपी को इनका जबर्दस्त समर्थन मिला। यह कड़वा सच है कि यह वर्ग असहज है।'

'कार्यकर्ताओं को अहमियत देनी पड़ेगी'
इस साप्ताहिक में मध्य प्रदेश का उदाहरण देकर भी महाराष्ट्र भाजपा को आईना दिखाने की कोशिश की गई है, जहां पार्टी ने सभी 29 सीटें जीत ली हैं। इसने कहा है कि वहां सरकार, पार्टी कार्यकर्ता और लाभार्थी सबके बीच गजब का तालमेल था।

लेकिन, 'यहां (महाराष्ट्र) सरकार, कार्यकर्ता और समान विचारधारा वाले संगठनों में काम करने वालों और बुद्धिजीवी वर्ग के बीच कोई तालमेल नहीं है। यह भविष्य के लिए भी बहुत ही खतरनाक है। जबतक तस्वीर नहीं बदली जाती और कार्यकर्ताओं को अहमियत नहीं मिलती, प्रदेश में जो बेचैनी है, वह नहीं बदलेगी।'

इस बार बीजेपी महाराष्ट्र की 48 में से 28 सीटों पर लड़कर भी सिर्फ 9 ही सीटें जीती हैं। जबकि, पिछली बार उसने 25 सीटों में से 23 पर सफलता हासिल की थी। वहीं मुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे की शिवसेना को 15 सीटों में से सात और एनसीपी को चार में से एक सीट पर जीत मिली है।

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