मध्य प्रदेश चुनाव 2018: अपने ही मंत्रियों की बगावत से मुश्किल में भाजपा
भोपाल। शिवराज सिंह चौहान के लिए चौथी बार सत्ता में वापसी कड़ी चुनौती बनती जा रही है। राज्य में लगातार तीन बार विजय पताका फहराने वाली बीजेपी को इस बार अपने ही मंत्रियों की बगावत का सामना करना पड़ रहा है। पार्टी अभी सीएम शिवराज के जिले विदिशा में पूर्व मंत्री राघवजी की की बगावत से उबर भी नहीं पाई थी कि पूर्व मंत्री रामकृष्ण कुसमारिया मौजूदा वित्त मंत्री जयंत मलैया के खिलाफ दमोह से मैदान में उतर गए हैं। मंत्रियों की बगावत की सूची यहीं खत्म नहीं होती है। पूर्व मंत्री केएल अग्रवाल भी बमौरी से मैदान में कूद गए हैं। राघवजी, कुसमारिया, केएल अग्रवाल से दो कदम आगे निकले पूर्व मंत्री सरताज सिंह, जिन्होंने भाजपा का दामन छोड़कर पहले ही कांग्रेस का हाथ थाम लिया है।

सपॉक्स से चुनाव लड़ने की जिद पर अड़े राघवजी
विदिशा, दमोह और बमौरी में अपने ही मंत्रियों के बागी होने के बाद बीजेपी के रणनीतिकार बेहद परेशान हैं। पार्टी के पास विकल्प भी सीमित हैं। अब पूर्व मंत्री सरताज सिंह को कांग्रेस से वापस तो नहीं लाया जा सकता है। राघवजी विवादित नेता हैं, जिन्हें पार्टी ने साइड लाइन कर रखा है। ऐसे में पार्टी का प्रयास है कि कुसमारिया और राघवजी को कैसे भी करके मनाया जाए। राघवजी सपॉक्स के टिकट पर चुनाव लड़ने की जिद पर अड़े हैं, वह अपनी बेटी को भी लड़ाना चाहते हैं। दोनों को पार्टी ने टिकट नहीं दिया है। राघवजी विदिशा पर अच्छी पकड़ रखते हैं। अगर वह बीजेपी के खिलाफ चुनाव मैदान में उतरे तो काफी वोट काट ले जाएंगे।

कुसमारिया का टिकट ऐन वक्त पर कटा तो दमोह से भर दिया पर्चा
पूर्व मंत्री रामकृष्ण कुसमारिया को पूरी उम्मीद थी कि पार्टी उन्हें टिकट जरूर देगी, लेकिन ऐन वक्त पर उनका नाम कट गया। कुसमारिया ने दमोह के अलावा पथरिया से भी पर्चा भरा है। समस्या यह है कि अगर कुसमारिया दमोह सीट पर डटे रहे तो बीजेपी के मौजूदा वित्त मंत्री जयंत मलैया की मुश्किल बढ़ जाएगी। 2013 लोकसभा चुनाव में इस सीट पर बीजेपी को ज्यादा अंतर से जीत नहीं मिली थी। ऐसे में कुसमारिया की बगावत बीजेपी को भारी पड़ सकती है।

पूर्व सीएम बाबूलाल गौर सबसे पहले बजाया बगावत का बिगुल
राघवजी, कुसमारिया और केएल अग्रवाल जैसे पूर्व मंत्रियों को बगावत का रास्ता दिखाने वाले कोई और नहीं बल्कि बीजेपी के पूर्व सीएम बाबूलाल गौर हैं। सबसे पहले उन्होंने ही पार्टी को तेवर दिखाने शुरू किए थे। वह अपना टिकट काटे जाने पर पुत्रवधु कृष्णा गौर को लड़ाना चाहते थे। पार्टी ने पहले तो उनकी बात नहीं मानी, लेकिन दबाव बढ़ता देख बीजेपी ने कृष्णा गौर को टिकट दे दिया।
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