Lok Sabha Elections 2019: पहले चरण में अधिक मतदान से किसे होगा लाभ?
नई दिल्ली। 18 राज्यों और दो केंद्र शासित प्रदेशों को मिलाकर 91 सीटों पर लोकसभा चुनाव 2019 के पहले चरण का मतदान गुरुवार को हो गया। यदि शुरुआती रुझानों पर ध्यान दिया जाए, तो ये सीटें 2014 के मुकाबले अधिक मतदान दर्ज कर सकती हैं। इन लोकसभा निर्वाचन क्षेत्रों में 2014 के आम चुनावों में 72 प्रतिशत मतदान हुआ था। तो इस बार अगर अधिक मतदान हुआ है तो इसके क्या मायने हो सकते हैं? बेशक उच्च मतदान सत्तारूढ़ पार्टी के लिए बुरी खबर हो सकती है। हालांकि राजनीतिक विशेषज्ञों का इससे अलग मानना है।

डीआईयू ने 2009 और 2014 में इन्हीं 91 सीटों पर हुए चुनावों में मतदान और चुनावी नतीजों की जांच कर बीच की कड़ी निकाली। डाटा के मुताबिक एनडीए की सफलता दर और इन सीटों में मतदाता मतदान में वृद्धि के बीच एक कड़ी निकाली। डीआईयू ने मतदान में प्रतिशत वृद्धि की तुलना की और पाया कि विपक्ष के पास जीतने का अधिक मौका है जहां मतदान अधिक था। 2014 में, एनडीए ने इन 91 में से 51 सीटें जीतीं, जहां 2009 के चुनावों की तुलना में कम से कम 7 प्रतिशत मतदान हुआ। इनमें से पांच सीटें ऐसी थीं, जहां 15 फीसदी वोट वृद्धि हुई थी।
सीटों में, जहां 2009 की तुलना में मतदान प्रतिशत गिरा, भाजपा और उसके सहयोगियों ने 14 में से 8 सीटें जीतीं, 57% की स्ट्राइक रेट। इन पोल आंकड़ों से पता चलता है कि अधिक मतदान ने भाजपा की बड़ी जीत में भूमिका निभाई। इंदिरा गांधी की हत्या के बाद साल 1984 के चुनाव में दर्ज 64 फीसदी मतदान का रिकॉर्ड 2014 में टूट गया। 2014 में 66 फीसदी मतदान हुआ। सुरजीत भल्ला जैसे अर्थशास्त्री ने 2014 में कथित तौर पर कहा था कि बढ़ती मतदान, मौजूदा सरकार के लिए परेशानी का एक प्रारंभिक संकेत है। उन्होंने कहा, "इस तरह की घटना हमेशा असत्य के खिलाफ जाती है।" लेकिन कुछ चुनाव विश्लेषकों का नज़रिया इसके विपरीत है। सेंटर फॉर स्टडी ऑफ डेवलपिंग सोसाइटीज (CSDS) के निदेशक संजय कुमार ने एंटी-इंकंबेंसी और वोटिंग मतदान के बीच इस तरह के एक कथित संबंध को खारिज कर दिया है।












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