लोकसभा चुनाव 2019: भारतीय राजनीति में दो भतीजों का उदय

नई दिल्ली- 2019 का लोकसभा चुनाव भारतीय राजनीति में दो बड़े नेताओं के भतीजों के राजनीतिक उदय के लिए भी जाना जाएगा। ये दोनों भतीजे उन अविवाहित धाकड़ सियासतदानों के हैं, जिन्होंने काफी संघर्ष के दम पर अपनी सियासी जमीन बनाई है। पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री एवं तृणमूल कांग्रेस (TMC) की सुप्रीमो ममता बनर्जी और बहुजन समाज पार्टी (BSP) की सुप्रीमो मायावती दोनों ने ही अपने दम पर अपनी भारी-भरकम राजनीतिक विरासत तैयार की है। अब उनके सामने मौका है, अपनी इस विरासत को संभालने के लिए नई पीढ़ी का कंधा तैयार करना। दीदी ने यह काम काफी पहले से ही शुरू कर दिया था और बहन जी ने पिछले कुछ समय से इसकी झलक सार्वजनिक करनी शुरू की थी। लेकिन, चुनाव आचार संहिता के डंडे ने ऐसी परिस्थितियां पैदा कर दीं कि मायावती को भी अपने राजनीतिक वारिस को आगे करना ही पड़ गया।

भतीजे की 'माया'

भतीजे की 'माया'

लंदन से मैनेजमेंट ग्रैजुएट 24 साल के आकाश आनंद मायावती के भाई आनंद कुमार के बेटे हैं। वे पिछले कुछ वर्षों से अपनी बुआ के साथ सार्वजनिक कार्यक्रमों और पार्टी की बैठकों में नजर आने शुरू हो गए थे। लेकिन, मंगलवार को उनके मायावती के राजनीतिक वारिस होने के कयासों पर पूरी तरह से मुहर लग गई। चुनाव आयोग के बैन के कारण माया आगरा में आयोजित एसपी-बीएसपी-आरएलडी की रैली में शामिल नहीं हो पाईं, लेकिन उनके लिए रिजर्व सीट पर उनकी जगह उनके भतीजे को बैठाया गया। इस साझा रैली में माया के भतीजे के अलावा बीएसपी महासचिव सतीश मिश्रा, समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष अखिलेश यादव और आरएलडी सुप्रीमो अजीत सिंह भी मौजद थे। इकोनॉमिक टाइम्स के मुताबिक इस साल 15 जनवरी को भी अपने जन्मदिन पर जब माया, अखिलेश यादव से मिली थीं, तो आकाश उनके साथ दिखाई पड़े थे। 7 अप्रैल को देवबंद की पहली साझा रैली के जिस विवादित भाषण के कारण मायावती पर 48 घंटे चुनाव प्रचार पर बैन लगा है, उसमें भी उनके भतीजे आकाश उनके साथ मंच पर मौजूद थे। मई 2017 की बात है, वे पहली बार अपनी बुआ के साथ सहारनपुर में दिखाई दिए थे। उस समय बीएसपी के कुछ बड़े नेताओं को छोड़कर उन्हें पार्टी का कोई नेता भी नहीं पहचान पाया था। उस समय मायावती ने कार्यकर्ताओं से उनका परिचय ये कहकर कराया था कि यह नौजवान पार्टी के लिए काम करेगा। धीरे-धीरे आकाश ने पार्टी की बातों में दिलचस्पी लेनी शुरू कर दी। उन्होंने पार्टी के नेताओं से बसपा की रणनीति को समझने की कोशिश की। खुद बुआ भी उनसे कहती थीं कि कार्यकर्ताओं के साथ उनकी बातचीत के दौरान वे जरूर मौजूद रहें। 2017 में माया ने अपने भाई को भी पार्टी का राष्ट्रीय उपाध्यक्ष बनाया था।

इसी साल जनवरी में मायावती ने अपने भतीजे के बसपा मूवमेंट में शामिल होने की घोषणा की थी। जब, इसको लेकर उनपर वंशवाद को बढ़ावा देने के आरोप लगे, तो उन्होंने साफ कहा कि जिसे परेशानी है, वो होती रहे, लेकिन उनकी पार्टी इन बातों की परवाह नहीं करती। जानकारों की राय में आकाश, मायावती को दलित युवाओं को पार्टी के साथ एकजुट रखने में मदद करेंगे। क्योंकि, इस वर्ग पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की भी नजर है और माया को भीम आर्मी के चंद्रशेखर आजाद रावण के बढ़ते प्रभाव की भी चिंता है।

भतीजे पर 'ममता'

भतीजे पर 'ममता'

ममता बनर्जी के भतीजे अभिषेक बनर्जी काफी पहले से राजनीति में सक्रिय हैं और वो मौजूदा लोकसभा के सांसद भी हैं। वे अभी डायमंड हार्बर चुनाव क्षेत्र के प्रतिनिधि हैं और टीएमसी के यूथ विंग के राष्ट्रीय अध्यक्ष भी। 31 साल के अभिषेक अभी हाल ही में तब सुर्खियों में आए थे, जब उनकी पत्नी ने कोलकाता एयरपोर्ट पर अपना बैगेज चेक कराने से कस्टम अधिकारियों को साफ इनकार कर दिया था। यह विवाद इतना बढ़ा था कि केंद्रीय और राज्य की एजेंसियों में टकराव की स्थिति पैदा हो गई थी। फिलहाल ये मामला सुप्रीम कोर्ट तक पहुंच चुका है। मौजूदा चुनाव में राज्य की ज्यादा से ज्यादा सीटें जीतकर दीदी प्रधानमंत्री पद की दावेदार बनना चाहती हैं। ऐसी स्थिति में उन्होंने बंगाल में अपना विकल्प तैयार कर रखा है। पिछले कुछ समय में पार्टी में अभिषेक का कद बहुत ज्यादा बढ़ा है। ममता उन्हें बहुत ज्यादा पसंद करती हैं। जानकारी के मुताबिक जब अभिषेक की बेटी ने जन्म लिया था, तो उनकी बुआ (ममता) ने खुशी से कहा था की उनकी मां (ममता की मां जो अब दुनिया में नहीं हैं) वापस आ गई है।

दीदी अपने भतीजे को अपने वारिस के तौर पर विकसित करने के लिए इतनी संजीदा रही हैं कि 2011 में उन्होंने उनके लिए तृणमूल युवा नाम का एक संगठन बना दिया था। बाद में जब 2015 में अभिषेक को उनकी बुआ ने तृणमूल यूथ कांग्रेस का अध्यक्ष बना दिया, तो 'तृणमूल युवा' को खत्म ही कर दिया गया। राजनीति में आने से पहले अभिषेक एमबीए मार्केटिंग और इवेंट मैनेजमेंट से जुड़े रहे हैं। अभिषेक को आगे बढ़ाने को लेकर वंशवाद के सवालों पर ममता अपनी तरह से जवाब देती हैं। उनका कहना है कि उन्होंने अभिषेक को उनके पद के लिए तैयार किया है, वैसे ही नहीं सौंपा है। वह कहती हैं कि अगर वे चाहतीं तो उन्हें राज्यसभा के जरिए संसद भेज सकती थीं,लेकिन उन्होंने लोकसभा का माध्यम चुनना बेहतर समझा। जानकारी के मुताबिक पार्टी का डिजिटल विंग दीदी के भतीजे ने ही खड़ा किया है। 2019 लोकसभा चुनाव से पहले पार्टी ने 40,000 सदस्यों वाला एक बड़ा आईटी सेल (IT cell) बनाया है, जिसका नेटवर्क राज्य की सभी 42 लोकसभा क्षेत्रों के हर जिले, ब्लॉक और बूथ लेबल के कार्यकर्ताओं से जुड़ा हुआ है।

कोई विकल्प भी नहीं!

कोई विकल्प भी नहीं!

टीएमसी (TMC) या बीएसपी (BSP) मौजूदा समय में दोनों की ही पहचान व्यक्ति केंद्रित पार्टी की है। हालांकि, बसपा एक समय बड़ा अभियान बनकर शुरू हुआ था, लेकिन धीरे-धीरे माया ने इसे अपनी मुट्ठी में कर लिया है। वे खुद कांशीराम की विरासत संभाल रही हैं, जिनकी वह कोई रिश्तेदार नहीं हैं। लेकिन कांशीराम के साथ ही बसपा की वह परंपरा भी चली गई। अब माया पार्टी की सर्वेसर्वा हैं। शायद उन्होंने इतने दिनों की राजनीति में पार्टी में कोई ऐसा विश्वासपात्र नहीं बनाया है, जिसपर वह दलित मूवमेंट को आगे बढ़ाने की जिम्मेदारी सौंप सकें। इसलिए उनके सामने अपने सगे भाई के बेटे को आगे बढ़ाने का अलावा कोई विकल्प भी नहीं है। जबकि, ममता बनर्जी कांग्रेस के बैकग्राउंड से आई हुई हैं। कांग्रेस से निकलकर वे आज जहां तक पहुंची हैं, उसका पूरा श्रेय उन्हें जाता है। लेकिन, बुआ की तरह दीदी भी पार्टी के अंदर (अपने परिवार से अलग) अपना कोई ऐसा विश्वासपात्र नहीं तलाश पाई हैं, जिसपर वह पार्टी को आगे बढ़ाने की जिम्मेदारी सौंप सकें। लिहाजा, दोनों ने अपने सबसे नजदीकी रिश्तेदारों पर ही भरोसा करने का विकल्प चुना है।

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