भाजपा के गढ़ विदिशा में वापसी के लिए कांग्रेस का संघर्ष

नई दिल्ली। भोपाल से सटी विदिशा लोकसभा सीट भारत की हाई प्रोफाइल सीट हैं, जो हमेशा से भाजपा का सुरक्षित गढ़ मानी जाती रही है। 30 साल से इस सीट पर भाजपा का एकतरफा कब्जा है। शिवराज सिंह चौहान इस सीट का प्रतिनिधित्व कर चुके हैं। सुरक्षित सीट मानी जाने के कारण ही भाजपा ने यहां से अटल बिहारी वाजपेयी को चुनाव लड़वाया। दो बार सुषमा स्वराज ने यहां से लोकसभा सीट जीतीं। भारतीय जनसंघ के जमाने में 1967 में यह सीट जनसंघ के ही पास थी। 1972 के चुनाव में भी जनसंघ यहां से जीती थी। उसके बाद इंडियन एक्सप्रेस ग्रुप के रामनाथ गोयनका को जनसंघ के समर्थन से यह सीट मिली थी।

कांग्रेस को सिर्फ दो बार मिली यहां से जीत

कांग्रेस को सिर्फ दो बार मिली यहां से जीत

इतिहास में इस सीट पर केवल दो बार ही कांग्रेस जीत पाई है। शिवराज सिंह चौहान यहां से दो बार 1998 और 2004 में जीते और 2006 में मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री बनने तक यहां के सांसद रहे। जब सुषमा स्वराज ने इस चुनाव में घोषणा की थी कि वे इस बार लोकसभा का चुनाव नहीं लड़ेंगी, तब भाजपा के अनेक नेताओं के मन में यहां से चुनाव लड़ने का ख्याल आया। पूर्व मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान की पत्नी साधना सिंह यहां से चुनाव लड़ने की बहुत इच्छुक रही हैं और उन्होंने पूरी खेमेबाजी भी की थी, लेकिन उन्हें टिकट नहीं मिला। पूर्व मंत्री गौरीशंकर शेजवार भी यहां से टिकट चाहते थे, लेकिन वे भी कामयाब नहीं हुए। भाजपा ने टिकट दे दिया रमाकांत भार्गव को।

जानिए विदिशा लोकसभा सीट के बारे में, अटल बिहारी भी रहे यहां से सांसद

2014 में बड़े अंतर से जीती थीं सुषमा स्वराज

2014 में बड़े अंतर से जीती थीं सुषमा स्वराज

2014 में सुषमा स्वराज विदिशा से 4 लाख से भी ज्यादा वोटों से जीती थीं। इस चुनाव में जीत की आश्वस्ति पाकर ही भाजपा ने एकदम नए चेहरे को टिकट दे दिया। साधना सिंह को मना लिया गया और गौरीशंकर शेजवार को विधानसभा चुनाव के नतीजों का हवाला देकर रोक दिया गया। कांग्रेस ने दिसंबर में हुए विधानसभा चुनाव में पराजित होने वाले शैलेन्द्र पटेल को ही टिकट दिया है। कांग्रेस को आशा है कि भाजपा का नया चेहरा उसके लिए चुनौती नहीं बनेगा। मुख्यमंत्री कमलनाथ और मंत्री जीतू पटवारी ने यहां दौरे किए और कांग्रेस के पक्ष में माहौल बनाने की कोशिश की।

कमलनाथ लगातार इस तरह के इशारे देते रहे है कि अगर यहां से कांग्रेस जीती, तो राज्य सरकार इस संसदीय क्षेत्र का विकास करने में कोई कसर नहीं छोड़ेगी। नए प्रत्याशी को देखते हुए भाजपा ने भी अपने वरिष्ठ नेताओं की फौज यहां तैनात कर दी है। पूर्व मुख्यमंत्री शिवराज सिंह का पूर्व क्षेत्र होने के नाते उन्हें खास जिम्मेदारी दी गई है। शिवराज सिंह पूरे संसदीय क्षेत्र की हर विधानसभा क्षेत्र में दो-दो बार दौरा कर चुके हैं। कई पूर्व मंत्री गांव-गांव में पैदल घूम रहे है और भाजपा के पक्ष में माहौल बनाने की कोशिश कर रहे है। गौरीशंकर शेजवार, सुरेन्द्र पटवा, करणसिंह वर्मा और रामपाल सिंह ग्रामीण इलाकों में ताकत झोंके हुए हैं।

भाजपा के लिए इस बार बहुत आसान नहीं राह

भाजपा के लिए इस बार बहुत आसान नहीं राह

भाजपा जानती है कि मध्यप्रदेश में अब कांग्रेस की सरकार है। इसलिए उसे यहां ज्यादा ध्यान देने की जरूरत है। भाजपा की चिंता का दूसरा कारण यह है कि विधानसभा चुनाव में विदिशा शहर की विधानसभा सीट भाजपा हार गई थी। विदिशा संसदीय क्षेत्र में विदिशा, सीहोर, देवास और रायसेन जिले की 8 विधानसभाएं है। इनमें रायसेन की भोजपुर और सिलवानी सीट भाजपा के कब्जे में है, जबकि सांची में कांग्रेस जीती थी। विदिशा शहर की विधानसभा सीट तो कांग्रेस के कब्जे में है ही। इसके अलावा खातेगांव, बुधनी, इच्छावर, भोजपुर और सिलवानी में विधानसभा सीटों पर भाजपा का कब्जा है। विदिशा में स्थानीय प्रत्याशी है और चुनाव के मुद्दे भी स्थानीय ही है। भाजपा को लगता है कि विदिशा उनकी घरेलू सीट है और उसे यहां कोई हरा नहीं सकता।

कांग्रेस को विदिशा सीट बागियों के कारण खट्टे अंगूर की तरह लग रही है। कांग्रेस के कई पुराने दिग्गज लोकसभा चुनाव में टिकट चाहते थे, लेकिन उन्हें न तो विदिशा से टिकट मिला, न ही आसपास की किसी सीट से। भोपाल की मेयर रह चुकी विभा पटेल के देवर और बुथनी के पूर्व विधायक तथा मंत्री राजकुमार पटेल का नाम असंतुष्टों में लिया जा रहा है। पटेल दिग्विजय सिंह खेमे के ही माने जाते है और टिकट न मिलने से व्यथित है।

विदिशा में 12 मई को मतदान होना है। इसके साथ ही भोपाल, राजगढ़ और सागर सीटों पर भी मतदान है, जो इस संसदीय क्षेत्र से जुड़े हुए है। विदिशा सीट को लेकर दोनों ही पार्टियां अपने-अपने जाति समीकरण भिड़ाने में लगी है। विभिन्न समाज के नेताओं को लक्ष्य बनाकर जनसंपर्क किया जा रहा है। कांग्रेस जहां एक तरफ अपनी जीत के दावे कर रही है, वहीं भाजपा के नेता यह बात स्वीकारने लगे है कि नतीजा तो 23 मई को ही पता चलेगा, लेकिन भाजपा की जीत का अंतर कम होगा।

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