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Lok Sabha Election: 1989 के बाद पहली बार छूटा साथ, मेनका, वरुण का पीलीभीत के साथ क्या है इतिहास?

Pilibhit Lok Sabha Seat: उत्तर प्रदेश की पीलीभीत लोकसभा सीट पर 1989 के बाद पहली बार ऐसी स्थिति बनी है कि मेनका गांधी या उनके बेटे वरुण गांधी कोई चुनाव नहीं लड़ रहे हैं। मौजूदा समय में भारतीय जनता पार्टी से जुड़े इन मां-बेटों का इस लोकसभा सीट से 35 साल पुराना नाता है और पिछले 28 वर्षों से ये सीट इन्हीं के पास रही है।

बीजेपी ने इस बार पीलीभीत लोकसभा सीट से मौजूदा सांसद वरुण गांधी की जगह यूपी में योगी आदित्यनाथ सरकार में कैबिनेट मंत्री जितिन प्रसाद को टिकट दिया है। वरुण गांधी यहां से दो-दो बार सांसद रह चुके हैं और 8 बार की लोकसभा सांसद उनकी मां मेनका 6 बार लोकसभा में पीलीभीत सीट का प्रतिनिधित्व कर चुकी हैं।

pilibhit varun gandhi maneka gandhi

मेनका, वरुण गांधी की पहचान बन चुकी है पीलीभीत सीट
कुल मिलाकर अमेठी और रायबरेली सीट जिस तरह से पिछले करीब ढाई दशकों से कांग्रेस की सोनिया गांधी और राहुल गांधी के नाम से जुड़ी रही है, उसी तरह से वरुण और मेनका पीलीभीत की पहचान बन चुके हैं। अलबत्ता राहुल पिछली बार अमेठी सीट हार गए तो इस बार भाजपा ने पीलीभीत से नए प्रत्याशी को मौका दे दिया है।

वरुण इस बार सुल्तानपुर में मेनका के लिए करेंगे प्रचार
जब वरुण का टिकट इस बार कटा तो अटकलें थीं कि वे या तो निर्दलीय या फिर इंडिया ब्लॉक का प्रत्याशी बनकर पीलीभीत से इस बार भी चुनाव लड़ सकते हैं। लेकिन, अब यह साफ हो गया है कि वह इस बार चुनाव नहीं लड़ेंगे और सुल्तानपुर में अपनी मां मेनका गांधी के चुनाव प्रचार में हिस्सा लेंगे।

पीलीभीत में 1989 में पहली बार जीतीं मेनका गांधी
मेनका गांधी पहली बार 1989 में पीलीभीत सीट से ही जनता दल की उम्मीदवार के तौर पर चुनाव जीती थीं। लेकिन, 1991 में बीजेपी के परशुराम गंगवार के हाथों उन्हें निराशा झेलनी पड़ी थी। लेकिन, 1996 में उनकी फिर इसी सीट से जनता दल के टिकट पर ही लोकसभा में वापसी हुई।

2009 में पीलीभीत से ही पहली बार सांसद चुने गए वरुण
1998 और 1999 में वो पीलीभीत से ही निर्दलीय जीतीं। लेकिन, 2004 में वह बीजेपी के टिकट पर यहां से सांसद बनीं और 2009 में उन्होंने यह सीट वरुण गांधी के लिए छोड़ दी जो पहली बार भारतीय जनता पार्टी के टिकट पर सांसद बने। 2014 में वापस मेनका यहां लौटीं और चुनाव जीतीं। लेकिन, 2019 में भाजपा ने वापस यहां से वरुण को टिकट दिया और वे फिर से जीत गए।

टिकट कटने की उम्मीद नहीं थी-वरुण
टीओआई ने एक स्थानीय राजनीतिक विश्लेषक के हवाले से बताया है,'पीलीभीत के लोग तीन दशकों से ज्यादा समय से चुनावों में गांधी परिवार की उपस्थिति के अभ्यस्त हो चुके थे। इस चुनाव में एक बड़ा बदलाव हुआ है।' उधर वरुण ने भी पीलीभीत से चुनाव नहीं लड़ पाने पर निराशा जाहिर की है।

उनका कहना है, 'बिना किसी भेदभाव के अपने चुनाव क्षेत्र और यहां के लोगों की भलाई और कल्याण के लिए मेरे सभी ईमानदार योगदानों के बावजूद भी मेरे साथ जो हुआ, मुझे उसकी उम्मीद नहीं थी।'

पिछले 20 वर्षों से पीलीभीत सीट भाजपा के कब्जे में है। लेकिन, उसने अबकी बार यहां प्रत्याशी बदलकर नया प्रयोग किया है। जितिन प्रसाद भी इलाके के बड़े सियासी चेहरे हैं। अब देखने वाली बात है कि भाजपा ने उनपर जो दांव लगाया है, वह उसपर किस तरह से खरे उतर पाते हैं।

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