Congress Manifesto: किस 'Freedom of Speech' की बात कर रही है कांग्रेस, क्या खुद ही BJP को दे रही है मौका?

Lok Sabha Election 2024 Congress Manifesto: चुनावों में घोषणापत्र जारी करने की परंपरा है और हर राजनीतिक दल का यह अधिकार भी है कि वह अपनी पार्टी की ओर से मतदाताओं के सामने अपने वादों को रखे। लेकिन, कांग्रेस ने कुछ ऐसे वादे किए हैं, जिससे उसकी खुद की ही मुश्किलें बढ़ सकती हैं। जैसे कि 'अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को बहाल करना।'

कांग्रेस पार्टी ने अपने घोषणापत्र में कहा है कि वह लोकतंत्र की 'रक्षा' करेगी और नागरिकों को 'डर से आजादी' दिलाएगी। राजनीतिक माहौल के लिए कांग्रेस और विपक्षी दलों के इंडिया ब्लॉक की ओर से पहले से ही इस तरह की बातें कही जा रही हैं। लिहाजा कांग्रेस का वादा चुनावी माहौल में राजनीतिक तौर पर अपनी जगह हो सकता है।

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किस 'बोलने की आजादी' की बात कर रही है कांग्रेस?
लेकिन, कांग्रेस पार्टी ने मेनिफेस्टो में यह भी कहा है कि 'हम मीडिया को पूरी आजादी देने के साथ बोलने (Freedom of Speech) और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता बहाल करेगें।' हम अपने देश के संविधान को देखें तो इसके लिए आर्टिकल 19(1)(ए) में पहले से पूरा प्रावधान मौजूद है और इसकी रक्षा की जिम्मेदारी खुद देश की सर्वोच्च अदालत को संविधान ने ही दी हुई है।

संविधान ने ही दी है 'बोलने की आजादी'
19(1)(ए) के मुताबिक, देश के सभी नागरिकों को बोलने और अभियक्ति की स्वतंत्रता रहेगी। इसका अर्थ ये है कि सभी नागरिकों को अपने विचार और राय स्वतंत्र रूप से व्यक्त करने का हक है। इसमें न केवल मौखिक शब्द शामिल हैं, बल्कि उनकी लेखनी, चित्र, फिल्में, बैनर आदि के से व्यक्त किए गए विचार और भाषण भी शामिल हैं।

आर्टिकल 32 है मौलिक अधिकारों की रक्षा का हथियार
भारत के संविधान ने देश के नागरिकों को इतना कमजोर नहीं बनाया है। इसी में आर्टिकल 32 का भी इंतजाम है, जिसके तहत लोग अपने मौलिक अधिकारों को सुप्रीम कोर्ट और हाईकोर्ट के माध्यम से लागू भी करवा सकते हैं और यह भी एक मौलिक अधिकार है।

कांग्रेस खुद ही भाजपा को दे रही है मौका
दिलचस्प बात है कि स्वतंत्र भारत के इतिहास में सिर्फ आपातकाल के दौरान ही जनता के मौलिक अधिकारों को निलंबित किया गया था, जिसका फैसला पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की कांग्रेस सरकार ने ही किया था। अब कांग्रेस ने जो वादा घोषणापत्र में किया है, उसकी संवैधानिक स्थिति पहले ही स्पष्ट हो चुकी है और राजनीतिक स्थिति ये है कि इससे तो पार्टी सत्ताधारी भारतीय जनता पार्टी को ही मौका दे रही है।

भारतीय राजनीति का काला दौर है आपातकाल
क्योंकि, आपातकाल भारतीय राजनीति का वह काला दौर है, जिसपर बैकफुट पर होना कांग्रेस की मजबूरी है। यही नहीं, यह ऐसा विषय है जो इंडिया ब्लॉक के तमाम सहयोगियों को भी सियासी उलझन में डाल सकता है, जिनमें से कई आपातकाल की वजह से कांग्रेस के खिलाफ ही पैदा हुई हैं।

आपातकाल लगाने की वजह कांग्रेस के लिए हमेशा कमजोर कड़ी रहेगी
मसलन, आरजेडी, समाजवादी पार्टी और शिवसेना (उद्धव बाल ठाकरे) जैस तमाम ऐसी पार्टियां हैं, जो आपातकाल के मसले पर कांग्रेस के साथ खुलकर खड़ी नहीं हो सकतीं। खासकर कांग्रेस को यह बात और भी परेशान कर सकती है कि आपातकाल का सबसे बड़ा कारण राहुल गांधी की दादा यानी इंदिरा गांधी को चुनावी धांधली के मामले में इलाहाबाद हाई कोर्ट से दोषी ठहराया जाना था।

इसी तरह से कांग्रेस ने प्रत्येक नागरिक और अल्पसंख्यकों को भोजन, पहनावे, भाषा और पर्सनल लॉ की स्वतंत्रता सुनिश्चित करने की बात कही है। ये सारे अधिकार भी किसी न किसी रूप में मौलिक अधिकारों के ही दायरे में आते हैं, जिसकी रक्षा की जिम्मेदारी स्वतंत्र रूप से सुप्रीम कोर्ट और हाई कोर्ट के कंधों पर संविधान ने ही डाली हुई है।

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