बीजेपी का डर नहीं, मामला कुछ और है! केरल में कांग्रेस-लेफ्ट में क्यों बढ़ गई है इतनी कड़वाहट?
Kerala Lok Sabha Chunav 2024: केरल में कांग्रेस और वामपंथियों की लड़ाई इस बार कड़वाहट की हद से गुजर रही है। सत्ताधारी एलडीएफ और विपक्षी यूडीएफ दोनों ही गठबंधन केरल से बाहर इंडिया ब्लॉक का हिस्सा हैं और बीजेपी और पीएम मोदी को सत्ता से उखाड़ फेंकने के दावे करते हैं। लेकिन, केरल में एक-दूसरे को फूटी आंखों क्यों नहीं सुहा रहे?
केरल में लोकसभा की 20 सीटें हैं। कांग्रेस 2019 में 15 जीती थी और 4 सीटों पर उसके सहयोगियों की जीत को मिलाकर यूडीएफ को 19 सीटें मिल गई थीं। मतलब कांग्रेस ने देशभर में जो 52 सीटें जीती थीं, उसमें सबसे बड़ा योगदान केरल का ही था। इसलिए, कांग्रेस इस बार भी कांग्रेस कोई कसर नहीं छोड़ना चाहती।

केरल में कांग्रेस-लेफ्ट में क्यों बढ़ गई है इतनी कड़वाहट?
केरल में बीजेपी और एनडीए को अभी भी इतना बड़ा फैक्टर नहीं माना जा रहा, जो पहले या दूसरे स्थान पर आ सके। इसके बावजूद कांग्रेस नेता राहुल गांधी और राज्य के मुख्यमंत्री पिनराई विजयन एक-दूसरे पर निजी हमले कर रहे हैं। दिल्ली में बैठे इनके सेक्युलर विचारों के पैरोकारों को भी यह बात खटक रही होगी कि जब भाजपा वहां उतनी ताकतर नहीं है तो आपस में ही कीचड़ उछालने का क्या मतलब?
कांग्रेस और लेफ्ट दोनों के लिए केरल महत्वपूर्ण
असल बात ये है कि अगर कांग्रेस के लिए केरल की एक-एक सीट कुल सीटों के आंकड़े को सम्मानजनक नंबर तक पहुंचाने के लिए जरूरी है तो सीपीएम या लेफ्ट के लिए भी अब यह राज्य उसका आखिरी पड़ाव बच गया है।
विधानसभा चुनावों में कांग्रेस और यूडीएफ को हुआ बड़ा नुकसान
कांग्रेस की चिंता ये है कि केरल की वजह से उसने पिछली बार 2014 वाले जिस आंकड़े को जो दुरुस्त किया था, वह जनाधार 2021 के विधानसभा चुनावों में पूरी तरह से बिखर गया। 2019 के लोकसभा चुनाव में इसकी अगुवाई वाले यूडीएफ को 47.48% वोट मिले थे, लेकिन, 2021 में वह घटकर सिर्फ 39.47% रह गया।
कांग्रेस को यूडीएफ सांसदों के एंटी-इंकंबेंसी की भी चिंता
ऊपर से यूडीएफ ने अबकी बार अपने 19 में से 18 मौजूदा सांसदों को ही टिकट दिया है, जिनके खिलाफ अपने-अपने क्षेत्रों में एंटी-इंकंबेंसी फैक्टर भी काम कर रहा है। कांग्रेस सिर्फ इस दम पर पिछली बार जैसा प्रदर्शन दोहराने की उम्मीद लगाए बैठी है कि केंद्र में नरेंद्र मोदी की अगुवाई वाली बीजेपी या एनडीए के खिलाफ चल रही लड़ाई की अगुवा वही है।
45% अल्पसंख्यक वोट बैंक भी कड़वाहट की वजह
केरल में कांग्रेस-लेफ्ट गठबंधन की यह कड़वाहट वाली लड़ाई के पीछे मुसलमान और ईसाई वाला करीब 45% अल्पसंख्यक वोट बैंक भी है। इसके लिए दोनों ही गठबंधन यह साबित करने की होड़ में लगे हैं कि दिल्ली में बीजेपी का नंबर-वन विरोधी कौन है।
जहां कांग्रेस अल्पसंख्यक वोट बैंक को प्रभावित करने के लिए कहती है कि राष्ट्रीय स्तर पर वही बीजेपी और मोदी को रोक सकती है। वहीं सीपीएम और एलडीएफ की ओर से उन कांग्रेस नेताओं के नाम गिनाए जाते हैं, जो भाजपा में शामिल हो चुके हैं।
वोटों के लिए पैदा हुई इसी कड़वाहट का अंजाम है कि राहुल ईडी पर पिनराई विजयन पर नरम होने का दावा करते हैं तो मुख्यमंत्री कहते हैं कि वह उत्तर में भाजपा से लड़ने की जगह वायनाड में रिफ्यूजी बनकर आ गए हैं।
इसी तरह से मुस्लिम वोटरों को प्रभावित करने के लिए एलडीएफ और यूडीएफ दोनों की ओर से सबसे बड़े सीएए-विरोधी दिखने के लिए तरह-तरह की काल्पनिक बातें कही जा रही हैं।
लेफ्ट के लिए केरल अंतिम पड़ाव!
अगर लेफ्ट के नजरिए से देखें तो सिर्फ केरल ही उसकी उम्मीद का आखिरी किरण बच गया है। त्रिपुरा और पश्चिम बंगाल वाली स्थिति बनी तो देश से मार्क्सवाद का बोरिया-बिस्तर उठ सकता है।
2019 लोकसभा चुनाव में लेफ्ट को सबरीमाला में युवा महिला के घुसने के विवाद और दिल्ली में कांग्रेस की वापसी की अटकलों का खामियाजा भुगतना पड़ा था। उसका वोट शेयर गिरकर 36.29% तक पहुंच चुका था।
लेकिन, 2021 के विधानसभा में सत्ता में बरकरार रहने से लेफ्ट को एक जीवन दान मिल चुका है और अब वह किसी भी स्थिति में लोकसभा में अपनी आवाज फिर से स्थापित करना चाहता है। वह केरल से सांसदों की एक सम्मानजनक संख्या दिल्ली भेजना चाहता है।
लेकिन, केरल की खराब वित्तीय स्थिति, राज्य सरकार के खिलाफ एंटी-इंकंबेंसी और पिनराई सरकार और उनके परिवार पर गंभीर आरोप से एलडीएफ की चुनौती बढ़ चुकी है।
केरल में राजनीतिक भविष्य बचाने का संघर्ष
इस तरह से कांग्रेस की अगुवाई वाले यूडीएफ और सीपीएम की अगुवाई वाला एलडीएफ एक तरह से राज्य में अपने राजनीतिक भविष्य की लड़ाई लड़ रहे हैं। क्योंकि, सामने बीजेपी है, जो भले ही अभी खास सीटें जीतने लायक सक्षम नहीं दिख रही है, लेकिन उसका जनाधार बढ़ने की संभावना पैदा हुई है।
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