जानिए, भारत के दो सफल सर्जिकल स्ट्राइक में इसरो (ISRO) का क्या है योगदान?
नई दिल्ली- वित्त मंत्री अरुण जेटली ने हाल ही में संकेत दिया है कि भारत भी उस तरह की कार्रवाई करने में सक्षम है, जैसे अमेरिका ने ओसामा बिन लादेन के मामले में किया था। पाकिस्तान में घुसकर दो सफल सर्जिकल स्ट्राइक को अंजाम देने के बाद ये कहने का मतलब है कि आतंक के आकाओं को छिपाए रखने के लिए पाकिस्तान चाहे जितना भी झूठ बोले, उनसे जुड़ी पल-पल की जानकारी भारत के पास मौजूद है। भारतीय सेना को ये ताकत इसरो (ISRO) के कारण मिली है, जिसने हाल के वर्षों में स्पेस टेक्नोलॉजी में दुनिया में भारत का लोहा मनवाया है। आज हमारे सैटेलाइट्स पाकिस्तान की 87% जमीन की चप्पे-चप्पे की जानकारी जुटाने में सक्षम हैं और वो भी हाई डेफिनेशन क्वालिटी वाली तस्वीरों और वीडियो के साथ।

माइक्रोसैट-आर
टाइम्स ऑफ इंडिया की खबर के अनुसार अगर भारतीय वायुसेना पाकिस्तान के बालाकोट जैसे सफल एयर स्ट्राइक (Air Strike) को अंजाम देने में सफल रही, तो उसका कारण ये है कि हमारे पास पाकिस्तान के 87% जमीनी इलाके के बारे में पुख्ता जानकारियां हैं। यानि, भारतीय सैटेलाइट्स पाकिस्तान के 8.8 लाख वर्ग किलोमीटर इलाके में से 7.7 लाख वर्ग किलोमीटर पर नजर रख सकती है। पिछले 17 जनवरी को अंतरिक्ष राज्य मंत्री जितेंद्र सिंह ने भी कहा था कि,"भारत के इंटीग्रेटेड बोर्डर मैनेजमेंट सिस्टम ने भारत को पाकिस्तानी घरों के बरामदों और कमरों तक में देखना संभव बना दिया है।" कुल मिलाकर 10 से ज्यादा सैटेलाइट सेना की मदद में लगे हुए हैं। इसमें इसी साल 24 जनवरी को लॉन्च किए गए माइक्रोसैट-आर में ये भी क्षमता है कि वह रात में भी तस्वीरें ले सकती है, जिससे सेना को प्लानिंग और मॉनिटरिग में बहुत सहायता मिली है।

जीसैट-7 A
भारतीय वायुसेना के लिए पिछले साल 19 दिसंबर को लॉन्च किया गया यह दूसरा संचार सैटेलाइट रडार, एयरबेस और हवाई खतरे को आपस में इटरलिंक करने में सक्षम है। यह एयरक्राफ्ट के सर्विलांस को कंट्रोल करता है और लंबी दूरी से ही दुश्मन के लड़ाकू विमान, जंगी जहाज की सूचना देता है। यह फाइटर पायलटों और एयरबेस के बीच रियल टाइम संचार की सुविधा मुहैया करता है। यह ड्रोन को तस्वीरें एवं वीडियो लेने और उसे जमीन तक भेजने में भी सहायक है और दुश्मन के ठिकानों पर लंबी दूरी से ही निशाना साधने में मदद पहुंचाता है।

जीसैट-7
30 अगस्त, 2013 को लॉन्च किया गया यह संचार सैटेलाइट भारतीय नौसेना की मदद करता है। इसकी पहुंच लंबी समुद्री क्षेत्रों तक है। जिन सैटेलाइट्स ने मुख्य तौर पर भारतीय सुरक्षा बलों की मदद की है, उनमें कार्टोसैट सैटेलाइट्स (Cartosat satellites) की पूरी सीरीज शामिल है। यानि जीसैट-7 (GSAT-7) और जी-सैट-7ए (GSAT-7A), इंडियन रीजनल नैविगेशन सैटेलाइट सिस्टम (IRNSS),माइक्रोसैट रिसैट (Microsat Risat) और सबसे नया हिसिस (HysIS)।

हिसिस (HysIS)
हाइपर-स्पेक्ट्रल इमेजिंग सैटेलाइट या हिसिस को पिछले साल 28 नवंबर को लॉन्च किया गया था। इसकी सबसे बड़ी खासियत ये है कि यह मिट्टी के कुछ सेंटीमीटर अंदर तक की पड़ताल कर सकता है। इसका इस्तेमाल लैंडमाइंस और आईडी का पता लगाने के लिए होता है।

कार्टोसैट सैटेलाइट्स
यह सेना को उसी खास जगह की तस्वीरें भेजता है, जो उनका टारगेट है। इस सीरीज के पांच सैटेलाइट सिर्फ सेना की मदद में लगे हुए हैं। पहली बार इसे 2005 में लॉन्च किया गया था और अंतिम बार जून 2017 में लॉन्च किया गया। गौरतलब है कि भारतीय सेना ने पहलीबार कार्टोसैट सैटेलाइट्स का इस्तेमाल एलओसी (LoC) के पार सितंबर,2016 के सर्जिकल स्ट्राइक्स के लिए किया था। यह एरिया ऑफ इंटरेस्ट (AOI) के मुताबिक ऑन डिमांड जानकारियां देता है। इसकी जानकारियां इतनी सटीक होती हैं कि सेना को अचूक ऑपरेशन को अंजाम देना आसान हो जाता है।

इंडियन रीजनल नैविगेशन सैटेलाइट सिस्टम
इस समय 7 इंडियन रीजनल नैविगेशन सैटेलाइट सिस्टम (IRNSS) ऑर्बिट में मौजूद हैं। 12 अप्रैल, 2018 को इस सीरीज का अंतिम सैटेलाइट लॉन्च किया गया था। यह अंतरराष्ट्रीय सीमा से 1600 किलोमीटर तक निगरानी रख सकता है। यह सेना को बहुत ही गोपनीय डाटा मुहैया कराने में सक्षम है, जिसका इस्तेमाल मिसाइल दागने तक के लिए किया जा सकता है।












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