जानें क्या खास है सरकार के नए लेबर कोड में, श्रम बिल की अहम बातें और चिंताएं
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नई दिल्ली। संसद के मानसून सत्र के दौरान विपक्ष के हंगामे के बीच शनिवार को केंद्र सरकार ने श्रम सुधारों से जुड़े तीन विधेयक लोकसभा में पेश किए। इनमें ऑक्यूपेशनल सेफ्टी, हेल्थ एंड वर्किंग कंडीशन कोड 2020, इंडस्ट्रीयल रिलेशंस कोड 2020 और सोशल सिक्योरिटी कोड 2020 शामिल हैं। इनमें किसी कंपनी में काम की सुरक्षा, स्वास्थ्य व काम के महौल को विनियमित करने, इंडस्ट्रीयल डिस्प्यूट्स की जांच व निर्धारण और कर्मचारियों के सामाजिक सुरक्षा से जुड़े प्रावधान हैं। ये बिल नियोक्ताओं को सरकारी अनुमति के बिना श्रमिकों को काम पर रखने और काम हटाने की आजादी प्रदान करेगा।
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क्य़ा है इस नए बिल में खास-
इंडियन एक्सप्रेस में छपी खबर के मुताबिक, औद्योगिक संबंध संहिता विधेयक, 2020 - पूर्व में 100 या उससे अधिक की तुलना में अब 300 कर्मचारियों वाले औद्योगिक संस्थान कर्मचारियों को आसानी से निकाल सकेंगे। साथ-साथ श्रमिकों के अधिकारों को सीमित करने के लिए और अधिक शर्तों को पेश करने का प्रस्ताव दिया है। इसका अर्थ यह है कि 300 कर्मचारियों तक वाले औद्योगिक प्रतिष्ठानों को एक स्थायी आदेश बनाने की आवश्यकता नहीं होगी। एक विशेषज्ञ का कहना है कि कंपनियों को श्रमिकों के लिए मनमाने ढंग से सेवा शर्तों को पेश करने में सक्षम बनाएगा। सरकार ने जो मसौदा पेश किया है उसके तहत कर्मचारियों के हड़ताल करने के अधिकारों पर अधिक शर्तें लगाई जाएंगी। अप्रैल में पेश की गई अपनी रिपोर्ट में श्रम पर स्थायी समिति ने भी इस सीमा को 300 श्रमिकों तक करने का सुझाव दिया था। उनका कहना था कि राजस्थान जैसी कुछ राज्य सरकारों ने पहले ही सीमा में वृद्धि की थी और श्रम मंत्रालय के अनुसार, इसके परिणामस्वरूप रोजगार में वृद्धि हुई थी और छंटनी में कमी आई थी।

नए श्रम कोड को लेकर क्या चिंताएं हैं?
विश्लेषकों का कहना है कि स्थायी आदेशों की सीमा में वृद्धि छोटे प्रतिष्ठानों में श्रमिकों के लिए श्रम अधिकारों को कम कर देगी। मौजूदा 100 से 300 श्रमिकों के लिए स्थायी आदेशों की सीमा में वृद्धि दिखाती है कि सरकार नियोक्ताओं को काम पर रखने और निकालने के मामले में बहुत अधिक मात्रा में लचीलापन देने के लिए उत्सुक है। सरकार का यह फैसला पूरी तरह से रोजगार सुरक्षा को ध्वस्त कर रहा है। औद्योगिक संबंध संहिता भी कानूनी हड़ताल करने के लिए नई शर्तों को जोड़ दिया गया है।

कानूनी हड़ताल करने के लिए नई शर्तों को जोड़ दिया
फिलहाल एक सार्वजनिक उपयोगिता सेवा में कार्यरत व्यक्ति तब तक हड़ताल पर नहीं जा सकता जब तक कि वह हड़ताल पर जाने से छह सप्ताह से पहले नोटिस नहीं देता है या इस तरह का नोटिस देने के चौदह दिनों के भीतर हड़ताल पर नहीं जा सकता है। अब इसे सभी औद्योगिक प्रतिष्ठानों में लागू करने का प्रस्ताव है। औद्योगिक संबंध संहिता यह भी प्रस्तावित करता है कि एक औद्योगिक प्रतिष्ठान में कार्यरत कोई भी व्यक्ति 60 दिन के नोटिस के बिना और अधिकरण या राष्ट्रीय औद्योगिक न्यायाधिकरण के समक्ष कार्यवाही की अवधि के दौरान और ऐसी कार्यवाही के समापन के साठ दिनों के बाद हड़ताल पर नहीं जाएगा। इस प्रकार, कानूनी रूप से स्वीकार्य समय सीमा से पहले श्रमिकों को कानूनी हड़ताल पर जाना, कानूनी हड़ताल को असंभव बना सकता है।

अन्य बिलों में क्या हैं अहम बातें
अन्य दो संहिता ने सामाजिक सुरक्षा के विस्तार और अंतर-राज्य प्रवासी श्रमिकों को शामिल करने की परिभाषा में भी बदलाव का प्रस्ताव किया है। सामाजिक सुरक्षा संहिता एक राष्ट्रीय सामाजिक सुरक्षा बोर्ड का प्रस्ताव करती है जो असंगठित, अस्थायी और प्लेटफॉर्म श्रमिकों के विभिन्न वर्गों के लिए उपयुक्त योजना तैयार करने के लिए केंद्र सरकार को सुझाव देगा। साथ ही वे लोग जो अस्थायी श्रमिकों के साथ काम करेंगे उन्हें अपने वार्षिक टर्नओवर का 1-2 प्रतिशत योगदान सामाजिक सुरक्षा के लिए देना होगा, जो उनके द्वारा अस्थायी और प्लेटफॉर्म श्रमिकों को दी जाने वाली राशि के 5 प्रतिशत से अधिक नहीं होगा। व्यावसायिक सुरक्षा, स्वास्थ्य और कार्य शर्त संहिता ने अंतर-राज्य प्रवासी श्रमिकों को ऐसे श्रमिकों के तौर पर परिभाषित किया है, जो अपने बलबूते पर अपना राज्य छोड़कर किसी अन्य राज्य में आए, रोजगार ढूंढा और अब 18,000 रुपये प्रति माह तक कमा रहे हैं।
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