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जानिए एटॉर्नी जनरल और सॉलिसिटर जनरल में क्या अंतर है

नई दिल्ली, 06 मई। अक्सर आप खबरों में पढ़ते होंगे एटॉर्नी जनरल ने कोर्ट में ये दलील दी, सॉलिसिटर जनरल ने ये बयान दिया। लेकिन लोग दोनों पदों को लेकर अक्सर भ्रमित होते हैं, लिहाजा आज हम अपने पाठकों को दोनों ही पदों के बीच के अंतर को साफ करेंगे, जिससे आगे से आप जब भी इन दोनों का जिक्र किसी न्यूज में देखें तो इसका अंतर समझ सके। दोनों ही संवैधानिक पद हैं और दोनों ही एक दूसरे से बिल्कुल अलग हैं, लिहाजा इनकी जिम्मेदारियां भी अलग होती हैं।

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    अटॉर्नी जनरल की बात करें तो यह भारत सरकार के मुख्य कानूनी सलाहकार होते हैं, इनकी प्राथमिक जिम्मेदारी सुप्रीम कोर्ट में भारत सरकार का पक्ष रखना होता है। अटॉर्नी जनरल के पद की जिम्मेदारी सामान्य रूप से किसी वरिष्ठ वकील को दी जाती है, इन्हें मौजूदा सत्तारूढ़ सरकार नियुक्त करती है। अटॉर्नी जनरल के पद को संविधान में जगह दी गई है, अटॉर्नी जनरल के पास इस बात का अधिकार होता है कि वह संसद की कार्रवाई में हिस्सा ले सके, हालांकि वह संसद में वोटिंग नहीं कर सकते हैं।

    अमेरिका में भी भारत की तरह अटॉर्नी जनरल होते हैं। अटॉर्नी जनरल के पास किसी भी तरह की विधायिका शक्ति नहीं होती है और ना ही वह सरकार में मंत्री होते हैं। इन तमाम जिम्मेदारियों के लिए केंद्र सरकार में कानून मंत्री होते हैं। वहीं सॉलिसिटर जनरल की बात करें तो सॉलिसिटर जनरल ऑफ इंडिया और अन्य सॉलिसिटर मुख्य रूप से अटॉर्नी जनरल के सहायक होते हैं। अटॉर्नी जनरल के बाद देश में दूसरे सबसे बड़े कानूनी अधिकारी के तौर पर सॉलिसिटर जनरल को माना जाता है।

    बता दें कि वर्तमान में केके वेणुगोपाल भारत के अटॉर्नी जनरल हैं। देश के अटॉर्नी जनरल की नियुक्ति भारत के राष्ट्रपति करते हैं। अटॉर्नी जनरल देश की सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश बनने की योग्यता रखके हैं। इनका कार्यकाल राष्ट्रपति की मर्जी पर आधारित होता है। इन्हें किसी भी समय हटाया जा सकता है। इसके लिए कोई विशेष वजह नहीं हो सकती है और ना ही संविधान में इसका कोई उल्लेख है। वहीं तुषार मेहता देश के वर्तमान सॉलिसिटर जनरल हैं। सॉलिसिटर जनरल भी देश की सुप्रीम कोर्ट के जज बनने की योग्यता रखते हैं और इनकी नियुक्ति राष्ट्रपति करते हैं और इनका कार्यकाल भी निर्धारित नहीं होता है। दोनों ही केंद्र सरकार के अलावा किसी और को कानूनी सलाह नहीं दे सकते हैं।

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