जानिए शिवसेना के संजय राउत को जो हैं शिवसेना के मारक हथियार
बेंगलुरु। महाराष्ट्र में शिवसेना और भापजा में सरकार बनाने को लेकर पिछले कई दिनों से जो ड्रामा चल रहा है उसमें सबसे हमलावर अंदाज शिवसेना के प्रवक्ता संजय नजर आ रहे हैं। वह भाजपा और शिवसेना के बीच गठबंधन की सरकार बनने में मुख्यमंत्री पद को लेकर पेंच फंसने के बाद से लगातार शिवसेना की ओर से पक्ष रख रहे हैं। वर्तमान समय में वह शिवसेना के मारक हथियार है जो कभी अपनी कलम से तो कभी अपने वक्तव्य से वार कर रहे हैं। असल में संजय राउत बाल ठाकरे के समय से ही ठाकरे परिवार के बहुत विश्वासपात्र व्यक्ति रहे हैं। बाल ठाकरे ने ही उन्हें शिवसेना के मुख पत्र सामना का संपादक बनाया था।
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बता दें शिवसेना और भाजपा के बीच महाराष्ट्र में सरकार बनाने को लेकर मतभेद होने के बाद शिवसेना प्रमुख उद्धव ठाकरे समेत अन्य शिवसेना बयानबाजी करने से बच रहे है। शिवसेना का पक्ष शिवसेना के मुख समाचार पत्र के संपादक संजय राउत ही रख रहे हैं। चुनाव परिणाम आने के बाद से ही संजय राउत सामना मुखपत्र में बीजेपी की खिलाफत कर रहे है। वह सोशल मीडिया पर भी बीजेपी पर लगातार तंज कस रहे हैं। इतना ही नही शिवसेना के मुख्यपत्र सामना के जरिए भाजपा पर आधी आधी सीटों के बंटवारे की बात से मुकरने की आलोचना की और एनसीपी कांग्रेस की मदद से शिवसेना की अगुवाई में गठबंधन की सरकार बनाने में एड़ी चोटी का दम लगा रहे हैं।

राउत का बीजेपी ने तीखा हमला बोलते हुए यहां तक कह दिया था कि अगर 'हम साथ न होते तो 75 सीटें भी नहीं जीत पाते'। कुछ दिनों से सामना के संपादकीय में शरद पवार की तारीफ के पुल बांध रहे थे और उसमें ईडी और सीबीआई और आयकर विभाग का भी जिक्र किया गया। शिवसेना ये मामले उठाकर बीजेपी को कठघरे में खड़ा किया। वहीं मंगलवार को एक बार फिर शिवसेना सांसद संजय राउत ने कहा कि राज्य का अगला मुख्यमंत्री सिर्फ शिवसेना का होगा। बीते 5 दिनों में राउत ने दूसरी बार शिवसेना का ही मुख्यमंत्री होने की बात दोहराई है। उन्होने यह दावा किया कि उनके पास 171 विधायकों का समर्थन है और यह संख्या 175 हो सकती है।

गौरतलब है कि 57 वर्षीय संजय राउत शिवसेना पार्टी के एक राजनेता हैं, जो भारतीय संसद के ऊपरी सदन राज्यसभा में महाराष्ट्र का प्रतिनिधित्व करने वाली भारत की संसद के सदस्य हैं । वह सोमवंशी क्षत्रिय पथारे समुदाय से हैं। वह मराठी अखबार सामाना के कार्यकारी संपादक भी हैं, जो शिवसेना पार्टी के नेता उद्धव ठाकरे द्वारा प्रकाशित किया जाता है। इस साल जनवरी में उन्होंने बाल ठाकरे के जीवन पर एक बॉयोपिक बनाई जिसमें नवाजुद्दीन सिद्दिकी ने बाल ठाकरे की भूमिका निभाई थी। साल 2015 में उन्होंने एक और फिल्म 'बालकाडू' बनाई थी जिसमें दिखाया गया था कि आम शिवसेना कार्यकर्ता किस तरह बाल ठाकरे के जीवन और विचारों से प्रभावित होता है।

सामना जॉइन करने से पहले राउत मराठी साप्ताहिक लोक प्रभा के लिए काम करते थे। उन्होंने अपने करियर की शुरुआत क्राइम रिपोर्टर के रूप में की थी। 1980 के दशक में गैंगस्टर रामा नाइक पर छपी उनकी कवर स्टोरी से वह चर्चा में आए। संजय राउत की आक्रामक लेखन शैली से प्रभावित होकर शिवसेना के संस्थापक बाल ठाकरे ने अशोक पादबीदरी की मृत्यु के बाद उन्हें सामना का कार्यकारी संपादक नियुक्त किया था। ठाकरे राउत से इतने प्रभावित हुए थे कि संजय को उन्होंने महज 29 साल की उम्र में संपादक बना दिया था। तब से वह इसी पद पर शिवसेना के वफादार बनकर कार्य कर रहे हैं। पिछले 13 दिनों में मीडिया में छाये रहने वाले संजय सामना में काम करने के दौरान उनकी लेखन शैली में बाल ठाकरे के विचार और बयान इस तरह होते थे कि बहुतों को लगता था कि ठाकरे खुद संपादकीय लिखते हैं। लेकिन वह लेख संजय राउत लिखते थे।

लेकिन कई बार राउत पार्टी लाइन से हटकर ऐसी बातें कह जाते हैं जिनकी वजह से शिवसेना को शर्मिंदा होना पड़ा। साल 2014 में सामना के एक संपादकीय में गुजराती समुदाय पर आरोप लगाया गया था कि शहर और महाराष्ट्र से कोई जुड़ाव बनाए बिना वह कमाई करने के लिए मुंबई का शोषण कर रहा है। साल 2014 के बाद से जब शिवसेना ने बीजेपी से गठबंधन तोड़ा, बाद में बीजेपी की अगुआई वाली सरकार में शामिल हुई, तब से अब तक संजय राउत सरकार और पार्टी की नीतियों के मुखर आलोचक रहे हैं। इसी वर्ष मई माह में संजय राउत के बुर्का बैन करने की मांग की थी। इस बयान से शिवसेना प्रमुख उद्धव ठाकरे और युवा सेना प्रमुख आदित्य ठाकरे इतने नाराज हो गए थे कि भविष्य में ऐसा दोबारा होने पर अनुशासनात्मक कार्रवाई तक की बात कह डाली थी।

इसके अलावा अन्य कई बार वह अपने बयानों के कारण कटघरे में खड़े होते रहे हैं। फेसबुक पर एक टिप्पणी पोस्ट करने और पसंद करने वाली दो लड़कियों की गिरफ्तारी के बाद, उन्होंने कहा कि "हम पुलिस की कार्रवाई का समर्थन करते हैं, फेसबुक टिप्पणियों से कानून और व्यवस्था की स्थिति पैदा हो सकती है।"अप्रैल 2015 में, उन्होंने यह कहकर विवाद खड़ा कर दिया कि वोट बैंक की राजनीति के लिए समुदाय का उपयोग नहीं करने के लिए मुसलमानों के वोटिंग अधिकारों को कुछ वर्षों के लिए रद्द कर दिया जाना चाहिए। वहीं शिवसेना के मुखपत्र सामना में उन्होंने एक कॉलम में लिखा, "जब तक मुसलमानों को वोट-बैंक के रूप में इस्तेमाल किया जाता है, तब तक उनका कोई भविष्य नहीं है। यही कारण है कि बाल ठाकरे ने मुसलमानों के मतदान के अधिकार को छीनने की मांग की थी।

रोचक बात ये हैं कि पिछले सप्ताह से मीडिया में छाये हुए संजय राउत की तुलना मराठी के एक दैनिक समाचार पत्र ने अपनी पहेलियों से राजा विक्रमादित्य को चुनौती देने वाले पौराणिक पिशाच 'बेताल से की और उन्हें विदूषक बताया। राउत पर निशाना साधते हुए नागपुर के अखबार 'तरुण भारत ने कहा कि वह महाराष्ट्र में भाजपा-शिवसेना गठबंधन को सत्ता में आने के मौके को नुकसान पहुंचा रहे हैं। माना जाता है इस समाचार पत्र का झुकाव आरएसएस की ओर है। अखबार ने कहा, ''दिवंगत बालासाहेब ठाकरे ने अपना पूरा जीवन कांग्रेस तथा राकांपा को सत्ता से बेदखल करने में बिताया लेकिन यह बेताल उनके सपनों को तोड़ने की कड़ी मशक्कत कर रहा है।












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