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जानिए किसकी वजह से राजनीति में आए ज्योतिरादित्‍य सिंधिया और कैसा रहा कांग्रेस में सफर

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बेंगलुरु। मध्‍यप्रदेश के कद्ददार नेता ज्‍योतिरादित्‍य सिंधिया ने बगावत करके कांग्रेस से इस्‍तीफा दे दिया हैं और अबभाजपा में शामिल होने वाले हैं। उन्‍होंने मंगलवार को दो दिन के अंदर लगातार दूसरी बार प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ मुलाकात की । मंगलवार को ज्‍योतिरादित्‍य गृहमंत्री अमित शाह के साथ पीएम मोदी से मिलने पहुंचे। जिसके बाद उन्‍होंने कांग्रेंस सुप्रीमों सोनिया गांधी को इस्‍तीफा सौंप दिया। पिता माधवराज सिंधिया की अचानक मौत के बाद राजनीति में आए ज्‍योतिरादित्‍य सिंधिया का कैसा रहा अब तक का सियासी सफर आइए जानते हैं....

भाजपा ज्‍वाइन करके ज्‍योतिरादित्‍य ने पूरा करेंगे दादी का अधूरा सपना

भाजपा ज्‍वाइन करके ज्‍योतिरादित्‍य ने पूरा करेंगे दादी का अधूरा सपना

बता दें ग्वालियर के सिंधिया परिवार की सियासत कांग्रेस से शुरू होकर जनसंघ पहुंची थी। वर्तमान ने ज्योतिरादित्य सिंधिया को छोड़कर बाकी सब बीजेपी में हैं। राजमाता विजयाराजे सिंधिया चाहती थीं कि उनका पूरा परिवार बीजेपी में ही रहे। ज्योतिरादित्य सिंधिया ने भी कांग्रेस से इस्तीफा देकर भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) में लौट कर अपनी दादी का सपना पूरा किया हैं। ज्योतिरादित्य सिंधिया कांग्रेस से चार बार सांसद और केंद्रीय मंत्री भी रहे हैं।

31 वर्ष की उम्र में राजनीति में किया था प्रवेश

31 वर्ष की उम्र में राजनीति में किया था प्रवेश

सिंधिया राजघराने से आने वाले 46 वर्षीय ज्योतिरादित्य सिंधिया मध्य प्रदेश के गुना संसदीय सीट से पूर्व लोकसभा सांसद थे। कांग्रेस के युवा नेताओं में से एक सिंधिया सियासी माहौल में पले बढ़े हैं। उनके पिता और कांग्रेस के दिग्गज नेता माधवराव सिंधिया के आकस्मिक निधन के बाद ज्योतिरादित्य सिर्फ 31 साल की उम्र राजनीति में उतरे। 2002 में गुना संसदीय उप चुनाव में वह भारी अंतर से जीतकर संसद पहुंचे। गुना संसदीय से सीट से वह लगातार चौथी बार सांसद बने थे।

उनके जन्‍म पर ग्वालियर में महीनों जश्‍न मनाया गया था

उनके जन्‍म पर ग्वालियर में महीनों जश्‍न मनाया गया था

सिंधिया का नाम आज देश के महत्वपूर्ण लोगों में लिया जाता हैं। सिंधिया का जन्‍म 1 जनवरी1971 को मुम्बई के समुद्र महल में हुआ था। उनकी मां नाम माधवी राजे ज्योतिरादित्‍य की एक बहन चित्रांगदा है जो उनसे तीन साल बड़ी हैं। उनका नाम देवता ज्‍योतिबा के नाम पर रखा गया हैं। ज्योतिरादित्य के जन्‍म के बाद ग्वालियर में महीनों जश्‍न मनाया गया था क्योंकि उनके जन्‍म के बाद ही ग्वालियर राजघराने को उनका वारिस मिला था।

हार्वर्ड विश्वविद्यालय में सिंधिया ने की है पढ़ाई

हार्वर्ड विश्वविद्यालय में सिंधिया ने की है पढ़ाई

उन्होंने हार्वर्ड विश्वविद्यालय में अर्थशास्त्र का अध्ययन किया और 1993 में स्नातक किया। 2001 में, उन्होंने स्टैनफोर्ड ग्रेजुएट स्कूल ऑफ बिजनेस से एमबीए की डिग्री प्राप्त की। उन्होंने अमेरिका में ही साढ़े चार साल लिंच, संयुक्त राष्ट्र, न्यूयॉर्क और मार्गेन स्टेनले में काम का अनुभव लिया। सिंधिया मध्य प्रदेश क्रिकेट एसोसिएशन के अध्यक्ष भी हैं।यूपीए एक में मनमोहन सिंह कैबिनेट में सिंधिया को पहली बार 2008 में सूचना एवं प्रसारण राज्यमंत्री बनाया गया। जब मनमोहन सिंह दूसरी बार देश के प्रधानमंत्री बने तो उन्हें राज्यमंत्री (स्वतंत्र प्रभार) का दर्जा दिया गया।

पत्‍नी प्रियदर्शनी विश्‍व की टॉप 50 ब्‍यूटीफुल वीमंस में हैं एक

पत्‍नी प्रियदर्शनी विश्‍व की टॉप 50 ब्‍यूटीफुल वीमंस में हैं एक

सिंधिया की शादी बडौदा के गायकवाड़ घराने की राजकुमारी प्रियदर्शनी राजे से 12 दिसंबर 1994 को हुई थी। प्रियदर्शनी राजे के पिता कुंवर संग्राम सिंह के तीसरे बेटे थे और उनकी मां नेपाल राजघराने से ताल्लु क रखती हैं। उनकी पत्‍नी प्रियदर्शनी राजे श्राी बहुत खास है और उन्‍हें विश्‍व की टॉप 50 ब्‍यूटीफुल वीमंस में शामिल किया गया है। सिंधिया के दो बच्‍चे हैं जिनमे एक बेटा महा आर्यमण और बेटी अनन्याराजे है।

2019 में पहली बार चुनाव में मिली थी हार

2019 में पहली बार चुनाव में मिली थी हार

बता दें 2001 में एक हादसे में माधवराव सिंधिया की मौत हो गई तो ज्योतिरादित्य सिंधिया अपने पिता की विरासत संभालते रहे और कांग्रेस के मजबूत नेता बने रहे। ज्योतिरादित्य माधवराव सिंधिया भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के राजनीतिक दल के 18 वर्षों तक सदस्य रहें और 2014 तक प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह प्रशासन के कैबिनेट में 'स्वतंत्र प्रभार वाले राज्य मंत्री' रहे। वे मध्य प्रदेश में गुना निर्वाचन क्षेत्र के मौजूदा सांसद रहे। वे लगातार तीन कार्यकालों तक इस सीट पर बने रहे। 2002 में पहली जीत के बाद ज्योतिरादित्य सिंधिया कभी चुनाव नहीं हारे थे लेकिन 2019 के लोकसभा चुनाव में उन्हें करारा झटका लगा। कभी उनके ही सहयोगी रहे कृष्ण पाल सिंह यादव ने ही सिंधिया को हरा दिया।

दादी राजे सिंधिया की बदौलत ग्वालियर क्षेत्र में जनसंघ मजबूत हुआ था

दादी राजे सिंधिया की बदौलत ग्वालियर क्षेत्र में जनसंघ मजबूत हुआ था

सिंधिया की दादी राजमाता विजयाराजे सिंधिया ने ग्वालियर पर राज करते हुए 1957 में कांग्रेस से अपनी राजनीति की शुरुआत की। वह गुना लोकसभा सीट से सांसद चुनी गईं। सिर्फ 10 साल में ही उनका मोहभंग हो गया और 1967 में वह जनसंघ में चली गईं। राजे सिंधिया की बदौलत ग्वालियर क्षेत्र में जनसंघ मजबूत हुआ और 1971 में इंदिरा गांधी की लहर के बावजूद जनसंघ यहां की तीन सीटें जीतने में कामयाब रहा। खुद विजयाराजे सिंधिया भिंड से, अटल बिहारी वाजपेयी ग्वालियर से और विजय राजे सिंधिया के बेटे और ज्योतिरादित्य सिंधिया के पिता माधवराव सिंधिया गुना से सांसद बने।

पिता माधवराव सिंधिया ने मां से बगावत कर कांग्रेस किया था ज्वाइन

पिता माधवराव सिंधिया ने मां से बगावत कर कांग्रेस किया था ज्वाइन

ज्योतिरादित्‍य के पिता माधवराव सिंधिया महज 26 साल की उम्र में सांसद चुने गए थे लेकिन वह बहुत दिन तक जनसंघ में नहीं रुके। माधव राव सिंधिया अपने मां-पिता के इकलौते बेटे थे। वह चार बहनों के बीच अपने माता-पिता की तीसरी संतान थे। माधवराव सिंधिया सिर्फ 26 साल की उम्र में सांसद चुने गए थे, लेकिन वह बहुत दिन तक जनसंघ में नहीं रुके। 1977 में आपातकाल के बाद उनके रास्ते जनसंघ और अपनी मां विजयराजे सिंधिया से अलग हो गए। 1980 में माधवराव सिंधिया ने कांग्रेस के टिकट पर चुनाव लड़ा और जीतकर केंद्रीय मंत्री भी बने। उनका विमान हादसे में 2001 में निधन हो गया था

राहुल और प्रियंका के काफी करीबी हैं ज्योतिरादित्य सिंधिया

राहुल और प्रियंका के काफी करीबी हैं ज्योतिरादित्य सिंधिया

ज्योतिरादित्य सिंधिया मध्यप्रदेश के नेता हैं। ग्वालियर चंबल संभाग में मजबूत पकड़ रखते हैं। ज्योतिरादित्य पूर्व कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी के करीबी रहे हैं इतना ही नहीं कांग्रेस महासचिव प्रियंका गांधी वाड्रा के विश्वस्त सहयोगी ज्योतिरादित्य सिंधिया माने जाते हैं।

ज्योतिरादित्य सिंधिया ने भाजपा में शामिल होकर निकाली है ये खुन्‍नस

ज्योतिरादित्य सिंधिया ने भाजपा में शामिल होकर निकाली है ये खुन्‍नस

मध्य प्रदेश के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस ने सरकार तो बनाई लेकिन बहुत कोशिशों के बावजूद ज्योतिरादित्य सिंधिया सीएम नहीं बन सके। इसके छह महीने बाद ही लोकसभा चुनाव में हार सिंधिया के लिए दूसरा बड़ा झटका साबित हुई। सीएम ना बन पाने के बावजूद लगभग 23 विधायक ऐसे हैं, जिन्हें सिधिया के खेमे का माना जाता है। इसमें से छह को मंत्री भी बनाया गया। इन्हीं में से कुछ विधायकों ने कमलनाथ की सरकार को मुश्किल में डाल दिया। लोकसभा चुनाव में हार के बाद से ही ज्योतिरादित्य सिंधिया खुद को अकेला महसूस कर रहे थे। बार-बार मांग करने के बावजूद उन्हें मध्य प्रदेश कांग्रेस के अध्यक्ष का पद भी नहीं मिला, जिसने आग में घी काम का काम किया है।

माधवराव सिंधिया जयंतीः क्या पिता की राह पर चल पड़े ज्योतिरादित्य सिंधिया

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English summary
Know Jyotiraditya Scindia, who came in politics after father's death, know the journey so far
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