जानें क्या है कोलार गोल्ड फील्ड्स का इतिहास, जिसपर बनी है फिल्म KGF, 121 सालों तक वहां हुई सोने की खुदाई
जानें क्या है कोलार गोल्ड फील्ड्स का इतिहास, जिसपर बनी है फिल्म KGF,सच में थी सोने की खदान
नई दिल्ली, 07 अप्रैल: साउथ फिल्मों के सुपरस्टार यश मुख की मोस्ट अवेटेड फिल्म केजीएफ-2 इसी महीने 14 अप्रैल को सिनेमाघरोंमें रिलीज होने वाली है। फिल्म के पहले पार्ट ने बॉक्स ऑफिस पर ताबड़तोड़ कमाई की थी और कई रिकॉर्ड को तोड़ दिए थे। केजीएफ-2 में इस बार यश मुख के अलावा संजय दत्त, रवीना टंडन और प्रकाश राज भी अहम किरदार में हैं। फिल्म का दर्शकों को बेसब्री से इतंजार है। केजीएफ का पहला हिस्सा 21 दिसंबर 2018 को रिलीज किया गया था। आपको बता दें कि केजीएफ एक सच्ची घटना से प्रेरित फिल्म है। केजीएफ का अर्थ है- ''कोलार गोल्ड फील्ड्स''। आइए जानें क्या है कोलार गोल्ड फील्ड्स का इतिहास।

कहां स्थित है कोलार गोल्ड फील्ड्स
केजीएफ यानी कोलार गोल्ड फील्ड्स कर्नाटक के दक्षिण पूर्व इलाके में स्थित है। कोलार गोल्ड फील्ड का खदान दक्षिण कोलार जिले के मुख्यालय से 30 किलोमीटर की दूरी पर रोबर्ट्सनपेट एक तहसील के पास है। ये केजीएफ टाउनशिप बेंगलुरू के पूर्व में मौजूद बैंगलोर-चेन्नई एक्सप्रेसवे पर 100 किलोमीटर दूरी पर है। ब्रिटिश दौर में सोने के उत्पादन के लिए ये जगह काफी मशहूर था।

क्या है कोलार गोल्ड फील्ड्स का इतिहास
द क्विंट में छपी रिपोर्ट के मुताबिक 1871 में न्यूजीलैंड से भारत आए ब्रिटिश सैनिक माइकल फिट्जगेराल्ड लेवेली ने बेंगलुरू में अपना घर बना लिया था। इसके पीछे वजह थी, कोलार गोल्ड फील्ड्स, जी हां, 1804 में एशियाटिक जर्नल में छपे एक लेख में माइकल फिट्जगेराल्ड लेवेली ने कोलार में पाए जाने वाले सोने के बारे में पढ़ा था। जिसके बाद कोलार में उनकी रूची बढ़ गई थी।

टीपू सुल्तान की मौत के बाद अंग्रेजों ने कोलार पर किया कब्जा
इस बारे में रिसर्च करने पर माइकल फिट्जगेराल्ड को ब्रिटिश सरकार के लेफ्टिनेंट जॉन वॉरेन का एक लेख मिला। लेफ्टिनेंट जॉन वारेन की एक पुरानी रिपोर्ट ने कोलार में संभावित सोने के भंडार के बारे में बात की थी। लेवेली की जानकारी के मुताबिक, 1799 की श्रीरंगपट्टनम की लड़ाई में तत्कालीन शासक टीपू सुल्तान को अंग्रेजों द्वारा मार दिया गया था और कोलार के खदानों पर कब्जा कर लिया था।
अंग्रेजों ने टीपू के प्रदेशों को मैसूर रियासत को सौंपने का फैसला किया, लेकिन इसके लिए भूमि का सर्वेक्षण करना पड़ा। और सर्वे के बहाने अंग्रेजों ने कोलार की जमीन अपने पास रख ली।

KGF में हाथ डालकर लोग निकालते थे सोना
ब्रिटिश सरकार के लेफ्टिनेंट जॉन वॉरेन ने चोल वंश के समय में खदान (कोलार गोल्ड फील्ड्स) से हाथों से मिट्टी के साथ सोना निकालने की बात सुनी थी। इतिहासकारों के मुताबिक चोल साम्राज्य में लोग जमीन को हाथ से खोदकर ही सोना निकाल लेते थे। इन्ही बातों से प्रेरित होकर जॉन वॉरेन ने घोषणा की, कि जो कोई भी इस खदान से सोना निकाल कर दिखाएगा, उसें इनाम दिया जाएगा।
जॉन वॉरेन के इनाम देने की बात सुन ग्रामीण उसके सामने मिट्टी से भरी एक बैलगाड़ी लेकर आए गए। गांववालों ने वॉरेन के सामने मिट्टी धोकर जह हटाया तो उसमें सोने के अंश दिखाई दिए।

कोलार की मिट्टी से निकलता था सोना
जॉन वॉरेन को फिर भी विश्वास नहीं हुआ तो उन्होंने अपने स्तर पर इस पूरे मामले की जांच करवाई। जिसके बाद वॉरेन ने निकाला कि 120 पाउंड या 56 किलोग्राम मिट्टी में गुंजभर सोना निकाला जा सकता था। जॉन वॉरेन ने कहा था कि गांव वालों के खास कौशल से इस मिट्टी से और भी सोना निकाला जा सकता था।
वॉरेन की इस रिपोर्ट के बाद 1804 से 1860 के बीच कोलार के इलाके में कई शोध हुए, जिसमें कुछ खासा फायदा नहीं हुआ। जिसके बाद वहां खुदाई पर प्रतिबंध लगा दिया गया। वॉरेन की इस रिपोर्ट को पढ़कर न्यूजीलैंड से भारत आए ब्रिटिश सैनिक माइकल फिट्जगेराल्ड लेवेली उत्साहित हुए थे और बेंगलुरु में रहने का फैसला किया था।

फिर से शुरू हुई कोलार में खुदाई
न्यूजीलैंड से भारत आए ब्रिटिश सैनिक माइकल फिट्जगेराल्ड लेवेली ने 1871 में कोलार के लिए 60 मील की बैलगाड़ी की यात्रा की थी। अपनी जांच के दौरान, उन्होंने खनन के लिए कई संभावित स्थानों की पहचान की और सोने के भंडार के निशान खोजने में भी सफल रहें। दो साल से अधिक के शोध के बाद 1873 में लेवेली ने मैसूर के महाराज की सरकार को पत्र लिखकर कोलार में खुदाई का लाइसेंस मांगा। 2 फरवरी 1875 को कोलार में 20 सालों तक खुदाई करने के लिए लेवेली को लाइसेंस मिला और इसकी के साथ भारत में आधुनिक खनन के युग की शुरुआत हुई।

KGF बिजली पाने वाला भारत का पहला शहर बन गया
लेवेली ने जब वहां कोलार में काम शुरू किया तो उसने महसूस किया कि, वहां बिजली की बहुत जरूरत है। कोलार गोल्ड फील्ड की जरूरत पूरा करने के लिए वहां से 130 किलोमीटर दूर कावेरी बिजली केंद्र बनाया गया। जिसके बाद केजीएफ बिजली पाने वाला भारत का पहला शहर बन गया। इतना ही नहीं जापान के बाद यह एशिया का दूसरा सबसे बड़ा प्लांट कावेरी बिजली केंद्र है। सोन के खदान की वजह से बेंगलुरू और मैसूर के बजाय केजीएफ को अधिक प्राथमिकता मिलने लगी थी।
बिजली के बाद वहां काम दोगुना होने लगा। नतीजन साल 1902 में केजीएफ भारत का 95 प्रतिशत सोना निकालता था। वहीं 1905 तक भारत सोने की खुदाई में विश्व में छठे स्थान पर पहुंच गया।

देखते ही देखते केजीएफ बन गया मिनी इंग्लैंड
केजीएफ में सोना मिलने के बाद वह इलाका अंग्रेजों को काफी भा गया था। डेक्कन हेराल्ड ने केजीएफ को मिनी इंग्लैंड भी कहा है। केजीएफ में पानी की जरूरत को पूरा करने के लिए वहां अंग्रेजों ने एक तालाब भी बनवाया था। साल 1930 में इस केजीएफ में 30 हजार मजदूर काम करते थे।

121 सालों तक हुई केजीएफ में खुदाई, 900 टन निकना सोना
भारत के आजाद होने के बाद सरकार ने इसे अपने अधिकार क्षेत्र में ले लिया और 1956 में इस खान का राष्ट्रीयकरण किया गया। 1970 में भारत सरकार की भारत गोल्ड माइन्स लिमिटेड कंपनी ने वहां अपना काम शुरू किया था। लेकिन 1979 के बाद उनको घाटा होने लगा था, स्थिति इतनी खराब हो गई थी कि वो अपने मजदूरों की सैलरी भी नहीं दे पा रहे थे। जिसके बाद साल 2001 में भारत गोल्ड माइन्स लिमिटेड कंपनी ने वहां सोने की खुदाई बंद कर दी। जिसके बाद वह जगह ऐसे ही पड़ी है।
केजीएफ में 121 सालों से भी अधिक समय तक खुदाई हुई है। मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक 121 सालों में वहां से 900 टन से भी अधिक सोना निकाला गया है।
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