Kerala Politics: रंजीत श्रीनिवासन के 15 हत्यारों को मृत्यु दंड, बीजेपी के लिए 'वरदान' क्यों है?
BJP Leader Ranjith Sreenivasan case verdict: केरल में बीजेपी को लोकसभा चुनावों से पहले एक बहुत बड़ा मुद्दा मिल गया है। अलाप्पुझा जिले की मावेलिक्कारा स्थित अतिरिक्त जिला सत्र न्यायालय ने पार्टी नेता रंजीत श्रीनिवासन की जघन्य हत्या के 15 दोषियों को फांसी की सजा सुना दी है।
रंजीत श्रीनिवासन केरल में बीजेपी के ओबीसी मोर्चा के प्रदेश सचिव थे। 40 वर्षीय नेता की 19 दिसंबर, 2021 को अलाप्पुझा के वेल्लाकिनार में उनके परिवार वालों (मां,पत्नी, बच्चे) के सामने ही बेहद दर्दनाक मौत दी गई थी। कातिलों ने रंजीत की मां और बहन के साथ भी मारपीट की थी।

बहुत ही जघन्य तरीके से हुई थी भाजपा नेता की हत्या
अभियोजन पक्ष के मुताबिक श्रीनिवासन के शरीर पर जख्म के 56 गहरे निशान थे। उनके हत्यारों ने उनके साथ बर्बरता की सारी हदें पार कर दी थीं।
सहानूभूति लहर का फायदा उठा सकती है बीजेपी
इस फैसले से लोकसभा चुनाव से पहले बीजेपी को जनता में सहानूभूति लहर पैदा करने का एक बहुत बड़ा मौका मिल गया है। यह पार्टी कैडर को भी संगठित करने और मनोबल बढ़ाने का एक अच्छा अवसर साबित हो सकता है।
एलडीएफ सरकार पर तुष्टिकरण का आरोप लगाती रही है बीजेपी
तथ्य ये है कि श्रीनिवासन के सारे हत्यारे प्रतिबंधित पॉपुलर फ्रंट ऑफ इंडिया (PFI) और इसके पॉलिटिकल विंग सोशल डेमोक्रेटिक पार्टी ऑफ इंडिया (SDPI) से जुड़े हैं।
अभियुक्तों का नाम नाइसाम, अजमल, अनूप, मोहम्मद असलम, अब्दुल कलाम उर्फ सलाम, अब्दुल कलाम, सफरुद्दीन, मनशाद, जसीब राजा, नवास, समीर, नजीर, जाकिर हुसैन, शाजी और शेरनस अशरफ के रूप में हुई है। सभी हत्यारों का मुस्लिम होना भी केरल की राजनीति में भाजपा की सियासत के लिए सटीक हो सकता है।
क्योंकि, पार्टी सत्ताधारी एलडीएफ और विपक्षी यूडीएफ दोनों पर ही तुष्टिकरण की राजनीति करने का आरोप लगाती रही है। गाजा की घटनाओं के खिलाफ यहां जिस तरह से सीपीएम के नेता सड़कों पर उतरे उससे बीजेपी को अपने दावे का समर्थन का भी मौका मिला।
ईसाइयों को जोड़ने के अभियान पर जुटी हुई है बीजेपी
एक तथ्य यह भी है कि पिछले कुछ महीनों से बीजेपी वहां हिंदुओं के साथ कैथोलिक वोटरों को जोड़ने के मिशन में जुटी हुई है। इस बार क्रिसमस पार्टी ने पूरे प्रदेश में ईसाइयों के लिए विशेष संपर्क अभियान चलाया है। पार्टी के शीर्ष नेतृत्व का संदेश चर्च के नेताओं तक पहुंचाया गया।
पीसी जॉर्ज की पार्टी के बीजेपी में विलय की चर्चा
केरल में कुछ प्रमुख चर्चों के लीडरों ने भी अबकी बार केरल में एक-दो कमल (बीजेपी का चुनाव निशान) खिलाने की बात कह रखी है। जिस दिन अदालत से यह फैसला आया है, संयोग से उसी दिन पीसी जॉर्ज की अगुवाई वाली केरल जनपक्षम (सेक्युलर) पार्टी के बीजेपी में विलय की चर्चा भी तेज हुई है।
बैठक से पहले पीसी जॉर्ज ने मीडिया से कहा है, 'हमारे पार्टी के लोगों की विलय की इच्छा है। भारत का सौभाग्य है कि देश को इतिहास का एक बेहतरीन प्रधानमंत्री मिला है। पार्टी के लोगों की राय है कि हमें उनका समर्थन करना चाहिए। यहां सीट प्राथमिकता नहीं है। अगर बीजेपी मुझसे लड़ने को कहेगी तो मैं लड़ूंगा। अगर नहीं तो भी ठीक है।'
मुस्लिम-विरोधी बयान की वजह से गिरफ्तार भी हो चुके हैं जॉर्ज
संभव है कि वे पठानमथिट्टा लोकसभा सीट से एनडीए के उम्मीदवार हो सकते हैं। पीसी जॉर्ज की बात हम इसलिए कह रहे हैं कि उनकी छवि ऐसे नेता की है, जो मुस्लिम-ईसाई के बीच खाई को चौड़ी करके अपनी राजनीति चमकाने के लिए जाने जाते हैं।
मुस्लिम-विरोधी बयान की वजह से 2022 में वे गिरफ्तार भी हो चुके हैं। उन्होंने तब मुसमानों के आर्थिक बायकॉट का आह्वान किया था।
हिंदू-ईसाई वोटरों की जुगलबंदी पर नजर
राजनीतिक विश्लेषकों का कहना रहा है कि उनकी रणनीति उस इलाके में जनाधार बढ़ाने की है, जहां मुसलमानों की तुलना में हिंदू-ईसाई वोटर ज्यादा संख्या में हैं।
2011 की जनगणना के मुताबिक केरल में हिंदुओं की आबादी सबसे ज्यादा यानी 54.73% है। वहीं राज्य में 26.56% मुसलमान और 18.38% ईसाई हैं। राज्य की राजनीति अभी मोटे तौर पर सत्ताधारी सीपीएम की अगुवाई वाले एलडीएफ और कांग्रेस की अगुवाई वाले विपक्षी यूडीएफ गठबंधन के बीच सिमटी हुई है।
2019-2021 के चुनाव का गणित
बीजेपी की नजर हिंदू वोटरों के साथ-साथ ईसाई वोट बैंक पर है। भाजपा को 2019 के लोकसभा चुनावों में अकेले 13% वोट मिले थे। 26% सीपीएम को और कांग्रेस को 37% वोट मिले थे।
जबकि, 2021 के विधानसभा चुनावों में बीजेपी का वोट शेयर 11% रहा था, तो सीपीएम और कांग्रेस दोनों अपने दम पर करीब 25% वोट ही जुटा सकी थीं।
बीजेपी हिंदू और ईसाई वोटरों की जुगलबंदी से इसी खाई को पाटने की कोशिश कर रही है, ताकि केरल में पहला कमल खिलाने का सपना पूरा हो सके।
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