कर्नाटक में कांग्रेस के AHINDA के आगे कितना टिकाऊ है, बीजेपी का नया आरक्षण कोटा समीकरण?
Karnataka assembly election 2023: कर्नाटक विधानसभा चुनाव के नजदीक आते-आते विकास और भ्रष्टाचार जैसे मुद्दों पर जातीय फॉर्मूले ज्यादा भारी पड़ सकते हैं। बीजेपी-कांग्रेस दोनों का समीकरण सेट है।

कर्नाटक विधानसभा चुनावों की तारीख के ऐलान से ठीक पहले भारतीय जनता पार्टी की सरकार ने जिस तरह से आरक्षण कोटे में नया गुणा गणित किया है, उसे कांग्रेस के पुराने AHINDA फॉर्मूले की काट की तरह देखा जा रहा है। कुल मिलाकर कर्नाटक चुनाव में विकास और भ्रष्टाचार के मुद्दे तो छाए रहेंगे ही, लेकिन जमीनी लड़ाई जातीय समीकरणों और धार्मिक लामबंदी के तहत ही होने जा रही है, इसकी बिसात बिछायी जा चुकी है। पहले यह जान लेते हैं कि कांग्रेस का AHINDA फॉर्मूला क्या है, जिसको लेकर माना जा रहा है कि आरक्षण कोटे में राज्य सरकार ने जो बदलाव किया है, वह इसी को देखते हुए हुआ है।

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AHINDA क्या है ?
दरअसल, AHINDA कन्नड़ के तीन शब्दों को जोड़कर बना एक संक्षिप्त शब्द है। यहां A कन्नड़ शब्द अल्पसंख्यातरु (अल्पसंख्यक-मुख्य रूप से मुस्लिम), HIN कन्नड़ शब्द हिंदुलिदावारु (पिछड़ा वर्ग) और DA कन्नड़ शब्द दलितारु (दलित) के लिए इस्तेमाल किया गया है। कर्नाटक की राजनीति में यह AHINDA शब्द राज्य के पहले पिछड़ा नेता देवराज उर्स ने दिया था। पूर्व मुख्यमंत्री और कांग्रेस नेता सिद्दारमैया ने उसे नए सिरे से इस्तेमाल किया। कांग्रेस के लिए यह इतना सफल फॉर्मूला साबित हुआ कि इसकी बदौलत 2013 में राज्य में उसकी सरकार बन गई।

बीजेपी सरकार का नया आरक्षण कोटा समीकरण
राज्य में बीजेपी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का चेहरा आगे रखकर और बुजुर्ग बीएस येदियुरप्पा के दम पर चुनाव मैदान में है। सूत्रों के मुताबिक राज्य में पार्टी किसी को मुख्यमंत्री का चेहरा के तौर पर पेश नहीं करेगी। लेकिन, कांग्रेस के जिताऊ फॉर्मूले की काट के तौर पर आरक्षण का नया गणित तैयार किया है। भाजपा सरकार पहला व्यापक संदेश तो ओबीसी आरक्षण से मुसलमानों का 4% कोटा खत्म करके दे चुकी है। दूसरा, मुख्यमंत्री बसवराज बोम्मई सरकार ने अनुसूचित जनजाति (आदिवासी) के आरक्षण का कोटा 3% से बढ़ाकर 7% कर दिया है। तीसरा, अनुसूचित जाति (दलित) का आरक्षण कोटा भी 15% से बढाकर 17% कर दिया है। चौथा और सबसे बड़ा सांकेतिक कदम ये है कि मुसलमानों का जो कोटा खत्म किया गया है, वह कर्नाटक के सबसे प्रभावी लिंगायत और वोक्कालिका समाज में बराबर-बराबर बांट दिया गया है।

बहुत बड़े वर्ग को प्रभावित करना चाहती है बीजेपी
बीजेपी नेताओं को लगता है कि उसकी इस सोशल इंजीनियरिंग से कांग्रेस के AHINDA वोट बैंक में सेंध लगाई जा सकती है। यही नहीं, बीजेपी सरकार ने दलितों के आरक्षण में से भी आंतरिक कोटा की घोषणा की है। 6% अनुसूचित जाति (लेफ्ट), 5.5% अनुसूचित जाति (राइट) और 4.5%, बंजारा, भोवी, कोरचा, कुरुमा आदि दलित जातियों को दिया गया है। इनमें से अनुसूचित जाति (लेफ्ट) दलितों का वह वर्ग है, जिसे भाजपा समर्थक माना जाता है। केंद्रीय मंत्री भगवंत खुबा ने ईटी से कहा है कि ' सभी जातियों को उनकी संख्या के आधार पर आरक्षण का लाभ मिले, इसीलिए हमने आरक्षण के ढांचे में संशोधन करके सामाजिक न्याय किया है।' ये खुद लिंगायत हैं और बीदर से दूसरी बार सांसद चुने गए हैं।

हिंदू वोट बैंक मजबूत करने की भी कोशिश
कर्नाटक के लिंगायत समाज में बीजेपी की पहले से अच्छी पकड़ रही है। नए आरक्षण फॉर्मूले से वह खासकर दलितों और वोक्कालिगा समाज में भी अपनी पकड़ और मजबूत करना चाह रही है और मुस्लिमों का कोटा खत्म करके वह अपना हिंदुत्व वोट भी सहेजने के प्रयास में है। भाजपा का साफ तर्क है कि धार्मिक आधार पर आरक्षण दिया ही नहीं जा सकता और कांग्रेस सरकार ने यह सब तुष्टिकरण की नीति के तहत किया था। बीजेपी की इस सोशल इंजीनियरिंग के गणित को समझने के लिए यह बात ध्यान में रखना होगा कि राज्य में आदिवासियों की आबादी करीब 7 फीसदी, दलितों की 17 फीसदी, लिंगायतों की 14 फीसदी और वोक्कालिगा की 11 फीसदी है। लिंगायत और वोक्कालिगा कर्नाटक में राजनीतिक रूप से बहुत ही प्रभावी जातियां हैं और दोनों ही ओबीसी श्रेणी में आती हैं।

AHINDA के आगे कितना टिकाऊ है यह फॉर्मूला?
भाजपा में कोई ऐसा नेता नहीं है, जिसका प्रभाव पूरे कर्नाटक में और समाज की सभी जातियों में हो। इसलिए पार्टी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के ही चेहरे पर ही चुनाव लड़ने की तैयारी में है। जबकि, येदियुरप्पा खुद मुख्यमंत्री के दावेदारी से तो हट चुके हैं, लेकिन पार्टी उनके कद को जिस तरह से पेश कर रही है, उससे लिंगायतों में वह अपनी पकड़ को हर स्थिति में मजबूत बनाए रखना चाहती है। इसके अलावा पार्टी दलितों में गोविंद कारजोल, वोक्कालिग में पार्टी महासचिव सीटी रवि और आदिवासियों में बी श्रीरामुलु जैसे नेताओं के चेहरे को प्रमुखता देने की तैयारी में है। बीजेपी ने तो चुनावी बिसात बिछाई है, वह देखने में तो काफी मजबूत है, लेकिन इससे AHINDA फॉर्मूले को किस हद तक रोक सकेगी, यह कहना अभी जल्दबाजी होगी।













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