Karnataka Elections Yediyurappa के लिए लिटमस टेस्ट, बीजेपी की किस्मत की चाबी 80 साल के पूर्व CM के हाथ !
कर्नाटक विधानसभा चुनाव 2023 में येदियुरप्पा के साथ-साथ कई भाजपा और कांग्रेस नेताओं की अग्निपरीक्षा होगी। पूर्व मुख्यमंत्री रहे येदियुरप्पा 80 साल के हो चुके हैं, लेकिन भाजपा के पास कर्नाटक में उनसे बड़ा चेहरा नहीं है।
सूत्रों की मानें तो कर्नाटक में आगामी विधानसभा चुनाव जीतने की रणनीति बना रही भाजपा के पास येदियुरप्पा के कद का दूसरा नेता नहीं है। सूत्रों का कहना है कि भारतीय जनता पार्टी का केंद्रीय नेतृत्व पूर्व मुख्यमंत्री बीएस येदियुरप्पा के अनुभव और लोकप्रियता पर भरोसा कर रहा है। प्रदेश की सियासत में मठों की भी अहम भूमिका है ऐसे में बीजेपी के सबसे बड़े लिंगायत नेता येदियुरप्पा ही हैं। गौरतलब है कि लिंगायत कर्नाटक में सबसे बड़ा समुदाय है। राज्य की कुल जनसंख्या का लगभग 17 प्रतिशत हिस्सा लिंगायत है, ज्यादातर उत्तर कर्नाटक क्षेत्र में हैं। ये भी रोचक है कि इस समुदाय के लोग पारंपरिक रूप से भाजपा को वोट देते आ रहे हैं।
वर्तमान मुख्यमंत्री बसवराज बोम्मई भी लिंगायत नेता हैं, लेकिन आने वाले चुनाव में पार्टी का चेहरा कौन होगा ? इस सवाल पर सस्पेंस बना हुआ है। बीजेपी के एक शीर्ष नेता ने समाचार एजेंसी एएनआई को बताया, "लिंगायत वोट हमारी पार्टी के लिए महत्वपूर्ण हैं और बिना किसी संदेह के, बीएस येदियुरप्पा हमारे सबसे लोकप्रिय लिंगायत चेहरों में से एक हैं। भाजपा को आगे ले जाने के लिए पार्टी उन पर भरोसा कर रही है।"
बता दें कि पिछले साल भाजपा ने संगठनात्मक बदलाव किए थे। इसमें अगस्त 2022 में ही कर्नाटक के पूर्व सीएम येदियुरप्पा को संसदीय बोर्ड में शामिल किया गया। बीजेपी की नीति और पार्टी के नेताओं से जुड़े तमाम फैसले संसदीय बोर्ड में ही होते हैं। राजनीतिक विश्लेषक संसदीय बोर्ड में येदियुरप्पा के शामिल होने को कर्नाटक विधानसभा चुनाव जीतने के लिए येदियुरप्पा पर भरोसा जतान के तरीके के रूप में देखते हैं। एएनआई की रिपोर्ट में एक अन्य बीजेपी नेता ने कहा, "जब पार्टी ने पिछले साल बीएस येदियुरप्पा को पद छोड़ने के लिए कहने का फैसला किया, तो उन्होंने बिना किसी हंगामे के ऐसा किया। संगठन ने उन्हें जो भी जिम्मेदारी सौंपी, उसे स्वीकार कर लिया। यही अनुभवी राजनेता की निशानी है।"
विधानसभा चुनाव में बीजेपी के केंद्रीय नेतृत्व की रणनीति के संबंध में यह भी ध्यान दिया जा सकता है कि गुजरात में मिली जीत के बाद केंद्रीय पर्यवेक्षक के रूप में बीएस येदियुरप्पा को गुजरात भेजा गया। गुजरात में विधायक दल के नेता को चुनने में येदियुरप्पा की मौजूदगी को बीजेपी का रणनीतिक निर्णय बताया गया। बता दें कि गुजरात में मुख्यमंत्री को चुनने के लिए नए विधायकों की बैठक में बी एस येदियुरप्पा के अलावा वरिष्ठ भाजपा नेता राजनाथ सिंह और अर्जुन मुंडा भी केंद्रीय पर्यवेक्षक की भूमिका में मौजूद थे।
कर्नाटक के एक बीजेपी सांसद ने येदियुरप्पा की भूमिका पर कहा, "उनकी उपयोगिता और तेज राजनीतिक कौशल पूरे दक्षिण भारत में पार्टी के काम आ सकते हैं। इसलिए बीजेपी संसदीय बोर्ड में उनका प्रवेश समझ में आता है।"

ये भी रोचक है कि शिकारीपुरा से आठ बार विधायक निर्वाचित हो चुके बीएस येदयुरप्पा अपने छोटे बेटे बीवाई विजयेंद्र को आगामी चुनाव लड़वाना चाहते हैं। हालाँकि, अंतिम निर्णय शीर्ष भाजपा अधिकारी करेंगे। पार्टी के एक वरिष्ठ पदाधिकारी एएनआई को बताया वर्तमान में चल रही भाजपा जन संपर्क यात्रा में पूर्व सीएम करीब 25 विधानसभा क्षेत्रों को कवर कर चुके हैं। बीजेपी पदाधिकारी के अनुसार, "उनकी गतिशीलता एक राज्य के लिए एक और महत्वपूर्ण कारक है जिसे वह बहुत अच्छी तरह से जानते हैं। उनके कान जमीन पर हैं और लगातार राज्य का दौरा कर रहे हैं। उनकी प्रतिक्रिया को आलाकमान ने काफी गंभीरता से लिया है।
कर्नाटक की सियासत में वोक्कालिगा समुदाय भी अहम रहा है। पूरे राज्य में करीब 14 प्रतिशत मतदाता वोक्कालिगा हैं। पूर्व प्रधानमंत्री एचडी देवेगौड़ा के कारण जनता दल-सेक्युलर पार्टी (जेडी (एस)) को वोक्कालिगा भरपूर वोट करते हैं। पारंपरिक वोट बैंक के कारण दक्षिण कर्नाटक बीजेपी के लिए कमजोर क्षेत्र माना जाता है। एक भाजपा नेता ने कहा, "हमने पार्टी से आर अशोक अश्वथनारायण और सीटी रवि जैसे कई नेताओं को उभरते हुए देखा है। लेकिन हमें अभी भी वोक्कालिगा समुदाय के येदियुरप्पा को ढूंढना बाकी है।" उन्होंने कहा कि भाजपा केवल लिंगायतों तक ही सीमित नहीं, पार्टी सर्व-समावेशी है।
बता दें कि बीजेपी 2019 में ही जेडीएस के गढ़ में सेंध लगाने में सफल रही थी। हॉर्स ट्रेडिंग के आरोपों के बीच कांग्रेस और जेडीएस के विधायकों ने बीजेपी में जाने का फैसला लिया। इसके बाद एचडी कुमारस्वामी के नेतृत्व वाली सरकार गिर गई। बीएस येदियुरप्पा का राजनीतिक जीवन उल्लेखनीय रहा है। इस महीने 80 वर्ष के होने वाले येदियुरप्पा का राजनीतिक जीवन उतार-चढ़ाव और विवादों से भरा रहा है।
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2008 में पहली बार कर्नाटक में भाजपा को सत्ता में लाने में सफल रहे येदियुरप्पा । भ्रष्टाचार के एक मामले में फंसे। 2011 में मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा देना पड़ा। 2016 में येदियुरप्पा बरी हो गए। अपना राजनीतिक संगठन बनाने के बाद, उन्होंने कुछ समय के बाद उसका भाजपा में विलय कर लिया। 2014 के लोकसभा चुनावों में शिमोगा से चुनाव लड़ने के बाद येदियुरप्पा को जीत मिली। उन्होंने 2018 में भी कर्नाटक विधानसभा चुनाव में जीत हासिल की, लेकिन 2 दिनों के लिए मुख्यमंत्री के बने येदियुरप्पा को इसलिए इस्तीफा देना पड़ा, क्योंकि बीजेपी बहुमत साबित करने में असमर्थ रही।
लगभग एक साल बाद बीएस बीएस येदियुरप्पा तख्तापलट कराने में कामयाब रहे। 18 विधायक कांग्रेस और जेडीएस से अलग होने के बाद बीजेपी में शामिल हो गए। इसी के साथ येदियुरप्पा अपने करियर में चौथी बार सीएम बने। जुलाई 2021 में नाटकीय मोड़ आया। बसवराज बोम्मई को मुख्यमंत्री बनाने के लिए येदियुरप्पा ने इस्तीफा संगठन में आ गए। वे भाजपा कर्नाटक अध्यक्ष के रूप में भी काम कर चुके हैं।












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