कर्नाटक चुनाव में ध्रुवीकरण के मुद्दे ठंडे क्यों पड़े हैं?
कर्नाटक विधानसभा चुनाव में इस बार ध्रुवीकरण वाले विवादास्पद मसले नहीं सुनाई पड़ रहे हैं। न हिजाब का जिक्र हो रहा है, न किसी को हलाल की चिंता है। इसके पीछे सबकी अपनी रणनीति है।

कुछ समय पहले तक हम देख चुके हैं कि कर्नाटक में हिजाब और टीपू सुल्तान जैसे मुद्दों पर कितना हंगामा मचा था। अजान और हलाल के मसले भी सुर्खियां बनने लगी थीं। लेकिन, चुनाव के दौरान ये सारे मसले चर्चा से भी गायब हो चुके हैं। इसके पीछे विभिन्न दलों की अपनी-अपनी रणातियां हैं।

ध्रुवीकरण के मुद्दे क्यों पड़े ठंडे?
कर्नाटक चुनाव में प्रचार का काम अभी चरम पर है। सभी प्रमुख दल इसके लिए पूरा जोर लगा रहे हैं। विकास, भ्रष्टाचार के अलावा जातिगत समीकरणों पर तीनों प्रमुख दलों-बीजेपी, कांग्रेस और जेडीएस का काफी फोकस है। लेकिन, ध्रुवीकरण वाले अधिकतर मसले संदेहास्पद रूप से गायब हैं।

आरक्षण के बहाने सिर्फ तुष्टिकरण को जिंदा करने की कोशिश
बीजेपी नेता और केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह ने मुस्लिम आरक्षण के बहाने तुष्टिकरण का मुद्दा जरूर छेड़ा है, लेकिन जैसे कि चुनावों से पहले ध्रुवीकरण वाले मुद्दों पर भाजपा के फोकस करने की संभावना थी, वह स्थिति नहीं है। हिजाब, हलाल, अजान और यहां तक कि टीपू सुल्तान का मामला भी ठंडा पड़ा हुआ है।

हिजाब-हलाल पर भाजपा के बदल गए सुर?
बीजेपी के प्रदेश महासचिव एन रविकुमार का कहना है, 'इसे सामाजिक प्रक्रिया के तहत जागरूकता फैलाकर हल किया जाना चाहिए। विधानसभा चुनाव पूरी तरह से भिन्न मसलों पर लड़ा जाता है।' पिछले साल बेलगावी सत्र के दौरान हलाल खाने पर पाबंदी के लिए इन्होंने विधान परिषद में निजी विधेयक पेश करने का प्रस्ताव दिया था।

कांग्रेस के रवैए के चलते भाजपा ने बदली रणनीति?
ऐसा लगता है कि ऐसे मुद्दों पर भाजपा से लोहा नहीं लेने के कांग्रेस के फैसले की वजह से बीजेपी को अपनी चुनावी ताल बदलने की रणनीति अपनानी पड़ी है। वैसे तुष्टिकरण को मुद्दा बनाने में वह अभी भी लगी हुई है और 4% मुस्लिम आरक्षण का कोटा बहाल करने का वादा करके कांग्रेस ने उसे खुद ही हथियार भी थमा दिया है।

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विकास के मुद्दों पर ही फोकस करेगी बीजेपी
कुमार कल्याण कर्नाटक क्षेत्र में भाजपा के चुनाव अभियान के प्रभारी भी हैं, जिनका कहना है कि पार्टी ने बहुत सोच-समझकर यह रणनीति अपनाई है कि डबल-इंजन सरकार के फायदे और उनकी सरकार में विकास के जो काम हुए हैं, उसपर ही फोकस करेगी। इसके अलावा बोम्मई सरकार का आरक्षण फॉर्मूला भी बीजेपी के चुनावी एजेंडे में शामिल है।

ध्रुवीकरण वाले विषयों पर कांग्रेस ने डाले हथियार?
भाजपा को भरोसा है कि नए आरक्षण ढांचे से उसे लिंगायत, वोक्कालिगा और दलितों का समर्थन हासिल करने में मदद मिलेगी। दूसरी तरफ कांग्रेस को लगता है कि उसे एंटी-इंकंबेंसी का फायदा मिलेगा। इसलिए, उसने ऐसे मुद्दे से दूर रहने में ही भलाई समझी है, जिसमें भाजपा का मुकाबला कोई नहीं कर सकता।
हम इस जाल में नहीं फंसने वाले- कांग्रेस
कर्नाटक में कांग्रेस के कार्यकारी प्रदेश अध्यक्ष सलीम अहमद के मुताबिक, 'बीजेपी ने सांप्रदायिक मुद्दों पर हमें भड़काने की कोशिश की थी, लेकिन हम इस जाल में नहीं फंसने वाले।' उनका कहना है कि 'उन्हें पता चल गया है कि विभाजन की राजनीति कर्नाटक में कभी काम नहीं कर सकती।'

'भावनात्मक मुद्दों को सामने लाने का कोई मतलब नहीं'
जेडीएस ने भी सांप्रदायिक मसलों से दूरी बनाए रखने में ही भलाई समझी है। पार्टी के चुनाव अभियान के संयोजक केए तिप्पेस्वामी ने कहा, 'भावनात्मक मुद्दों को सामने लाने का कोई मतलब नहीं है, जब भ्रष्टाचार और कीमतों में बढ़ोतरी जैसे असली ज्वलंत मुद्दे सामने हैं।'












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