Karnataka election 2023 result: कर्नाटक में क्यों हारी बीजेपी? 5 प्रमुख कारण जानिए
Karnataka election 2023 result: कर्नाटक चुनाव में भाजपा के हार के कारणों में सबसे बड़ा कारण तो ये है कि कांग्रेस ने लिंगायत वोट बैंक में सेंध लगाई है।

Karnataka chunav major reasons for BJP's defeat: कर्नाटक चुनाव के परिणामों से लगता है कि कांग्रेस की रणनीति पूरी तरह सफल रही है। जबकि, सत्ताधारी भाजपा को एग्जिट पोल के अनुमानों से भी बड़ी हार का सामना करना पड़ा है। आखिर वोटरों ने भाजपा पर इस बार भरोसा क्यों नहीं दिखाया?

पीएम मोदी पर बहुत अधिक निर्भरता
कर्नाटक में एक तो बीजेपी ने कांग्रेस से काफी देर से प्रचार अभियान शुरू किया और ऐसा लगा कि पूरे कैंपेन पर राष्ट्रीय नेतृत्व हावी है। अकेले पीएम मोदी से 42 रैलियां करवाई गईं। उन्होंने दो दिनों तक रोड शो भी किया। हालांकि, बेंगलुरु क्षेत्र में इसका प्रभाव भी दिखा है। लेकिन, पार्टी सिर्फ पीएम मोदी के चेहरे के भरोसे बैठ गई, जिससे उसे स्थानीय मुद्दों पर मतदाताओं को साथ लाने में दिक्कत हुई।
पीएम मोदी ही नहीं, केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह भी राज्य में चुनाव प्रचार के दौरान भाजपा के बड़े चेहरा रहे। उन्होंने भी 30 रैलियां कीं। लेकिन, बीजेपी को इस सबसे बहुत ज्यादा फायदा नहीं मिला।

सिद्दारमैया और डीके के मुकाबले लोकल चेहरा नहीं
कर्नाटक में पूर्व मुख्यमंत्री सिद्दारमैया और प्रदेश अध्यक्ष डीके शिवकुमार कांग्रेस के सबसे प्रभावशाली चेहरा हैं। इन दोनों का अपना-अपना जनाधार है। सिद्दारमैया कुरुबा जाति के सबसे बड़े चेहरे हैं। इसी तरह से डीके शिवकुमार वोक्कलिगा जाति से हैं और इसमें उनकी काफी गहरी पैठ है।
कांग्रेस के इन दोनों जातीय जनाधार वाले नेताओं के मुकाबले बीजेपी कोई प्रभावी चेहरा देने में नाकाम रही। मुख्यमंत्री बसवराज बोम्मई लिंगायत समाज से जरूर आते हैं, लेकिन सीएम होने के बावजूद वह अपना उस तरह से अलग प्रभाव नहीं जमा पाए हैं।

40% कमीशन का आरोप पड़ा भारी
कांग्रेस लंबे समय से राज्य की बीजेपी सरकार पर 40% कमीशन वाली सरकार होने का आरोप लगाती रही। कांग्रेस ने इसे बहुत जोरदार मुहिम बनाया और परिणामों से लगता है कि उसका यह अभियान क्लिक कर गया। बीजेपी कांग्रेस के आरोपों के खिलाफ आक्रमक नहीं हो पाई।
बीजेपी अपने बचाव में सिर्फ यही कहती रह गई कि अगर भ्रष्टाचार के सबूत हैं तो कांग्रेस मुकदमा क्यों नहीं करती। पीएम मोदी ने कांग्रेस के खिलाफ 85% कमीशन वाली बात कहकर पलटवार की कोशिश जरूर की, लेकिन तबतक काफी देर हो चुकी थी और चुनावी नदी में काफी सारा पानी गुजर चुका था।

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एससी-एसटी वोटरों का समर्थन लेने में भी पिछड़ी
कर्नाटक विधानसभा के परिणामों से यही संकेत मिलता है कि बीजेपी अनसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के मतदाताओं पर अपना खास प्रभाव नहीं दिखा सकी। हो सकता है कि कांग्रेस को दलितों में कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे की वजह से फायदा मिला हो, जो कर्नाटक के ही रहने वाले हैं।
बीजेपी केंद्र और राज्य सरकार की कल्याणकारी योजनाओं के भरोसे थी। कई राज्यों में उसे इसका काफी फायदा भी मिला था। इस वर्ग से भी उसे इसको लेकर काफी आस थी। लेकिन, प्रदेश की 51 आरक्षित सीटों में परिणाम भाजपा के पक्ष में नहीं कहे जा सकते। इसकी वजह यह भी मानी जा रही है कि कांग्रेस का AHINDA समीकरण काम कर गया है।
AHINDA फॉर्मूला के तहत कांग्रेस मुस्लिम, अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति और ओबीसी को एक वर्ग के रूप में एकजुट करने की रणनीति के तहत चुनाव लड़ती है। बीजेपी इसबार इसे तोड़ने की कोशिश में थी, लेकिन लगता है कि उसका सिक्का जम नहीं पाया।

लिंगायत बहुल इलाकों में भी खराब प्रदर्शन
भाजपा की हार के सबसे बड़े कारणों में लिंगायत बहुल क्षेत्रों में भी उसके खराब प्रदर्शन को माना जा रहा है। कर्नाटक में लिंगायतों की जनसंख्या 17% बताई जाती है। राज्य में कुल 69 लिंगायत बहुल सीटें मानी जाती हैं। सीएम बोम्मई भी इसी जाति से हैं। येदियुरप्पा भाजपा में इसके सबसे बड़े नेता हैं। लेकिन, परिणामों में लगता है कि कांग्रेस ने भाजपा के इस बड़े वोट बैक में जबर्दस्त सेंध लगाई है।
चुनाव से पहले लिंगायतों के दो बड़े चेहरे पूर्व सीएम जगदीश शेट्टार और लक्ष्मण सावदी भाजपा छोड़कर कांग्रेस में शामिल हो गए थे। शेट्टार तो हुबली-धारवाड़ में बुरी तरह हार गए हैं, लेकिन लक्षण सावदी को अथानी में बड़ी जीत मिली है। लेकिन, लगता है कि इन दोनों नेताओं की वजह से भाजपा का सबसे बड़ा वोट बैंक हिल गया है और उसे सत्ता से बाहर का रास्ता देखना पड़ा है।












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