मुख्यमंत्री के मुआवाज की मांग पर भड़के कर्नाटक के किसान, कैसे सिद्दारमैया ने अपनी ही सरकार को बुरा फंसाया?
Karnataka News: कर्नाटक में मुख्यमंत्री सिद्दारमैया की पत्नी पार्वती को जमीन के बदले मुआवजे का मुद्दा अब धीरे-धीरे उनके हाथों से निकलता जा रहा है और इसकी वजह से उनकी अपनी ही सरकार बुरी तरह फंसती जा रही है।
इसके पीछे खुद मुख्यमंत्री का एक बयान है, जिसमें उन्होंने अपने परिवार की तीन एकड़ जमीन के बदले मैसूर अर्बन डेवलपमेंट अथॉरिटी से 62 करोड़ रुपए का मुआवजा मांग लिया है।

क्या है सिद्दारमैया की ओर से 62 करोड़ रुपए के मुआवजे की मांग का मुद्दा?
बात यहां से शुरू होती है कि मुख्यमंत्री सिद्दारमैया की पत्नी की जिस 3.2 एकड़ जमीन के बदले मैसूर अर्बन डेवलपमेंट अथॉरिटी (MUDA) की ओर से प्राइम लोकेशन में 50:50 के अनुपात में जमीन आवंटित की गई है, उसमें घोटाले का आरोप लग रहे हैं।
इन आरोपों से पीछा छुड़ाने के लिए सीएम ने अथॉरिटी से जमीन के बदले 62 करोड़ रुपए के मुआवजे की मांग कर दी है, जो कि उनके मुताबिक कथित तौर पर 'अतिक्रमण' करके ली गई है।
सीएम की मांग ने किसानों को भी उसी अनुपात में मुआवजे के लिए भड़काया
ऐसा करके सीएम ने जाने-अनजाने में बेंगलुरु रूरल, चिकबल्लापुर और कोलार जिले के उन किसानों को भड़का दिया है, जिनकी जमीनें विभिन्न विकास परियोजनाओं के लिए अधिग्रहण की प्रक्रिया में लगी हैं।
किसानों के तेवर देखकर अधिकारियों की भी बढ़ रही है चिंता
इन किसानों का कहना है कि अगर खुद मुख्यमंत्री मैसूर की तीन एकड़ जमीन के लिए खुलेआम 62 करोड़ रुपए की मांग कर सकते हैं, तो उन्हें बेंगलुरु के आसपास की जमीन के बदले तो कम से कम 25 करोड़ रुपए प्रति एकड़ के हिसाब मिलनी चाहिए। अब राज्य सरकार के विभिन्न विभागों के अधिकारियों को भी लग रहा है कि मुख्यमंत्री के मुआवजे के दावे ने परिस्थितियां मुश्किल बना दी हैं।
मुख्यमंत्री और किसानों के लिए अलग नियम नहीं हो सकते- किसान
कोलार जिले के एक किसान नेता ने कहा, 'बेंगलुरु के आसपास जमीन की कीमतें मैसूर से ज्यादा हैं। अगर मुख्यमंत्री एक आवासीय परियोजना के लिए इतना बड़ा मुआवजा मांग रहे हैं, जहां वैकल्पिक स्थानों के आवंटन का प्रावधान है, तो बेंगलुरु और उसके आसपास के किसान जो सड़कों, उद्योगों और अन्य परियोजनाओं के लिए अपनी जमीनें खो रहे हैं, उन्हें किसी और की ओर से नहीं, बल्कि खुद मुख्यमंत्री की ओर से तय किए गए फार्मूले के मुताबिक मुआवजा दिया जाना चाहिए। मुख्यमंत्री के लिए अलग और किसानों के लिए अलग नियम नहीं हो सकते हैं।'
सीएम को ज्यादा मुआवजा मांगने का नैतिक अधिकार नहीं- किसान
इसी तरह की मांग चिकबल्लापुर के एक किसान अजन्या रेड्डी की भी है। उनके मुताबिक, सीएम ने जितने मुआवजे की मांग की है, वह मैसूर में जमीन की मौजूदा निर्धारित कीमतों से दो या तीन गुना ज्यादा है। बेंगलुरु रूरल और चिकबल्लापुर में खेती वाली जमीन एसईजेड, एयरोस्पेस पार्क, रिंग रोड और हाउसिंग प्रोजेक्ट के लिए ली जा रही हैं, उन्हें भी वही सुविधा मिलनी चाहिए। अगर सरकार उसी आधार पर किसानों को मुआवजा देने से मना करती है तो मुखयमंत्री को किसानों को नजरअंदाज करके इतना ज्यादा मुआवजा मांगने का कोई नैतिक अधिकार नहीं है।
25 करोड़ रुपए प्रति एकड़ मिलना चाहिए मुआवजा- किसान
बेंगलुरु में पेरिफेरल रिंग रोड में जिनकी जमीनें जा रही हैं, उन परेशान किसानों में शामिल ईश्वर रेड्डी का कहना है, 'हम नहीं जानते कि सीएम ने इतनी बड़ी रकम की मांग कैसे कर ली। यह देखते हुए कि वे सीएम हैं, उन्हें इसे नियमों के हिसाब से ही मांगना चाहिए था। इस हिसाब से तो बेंगलुरु के आसपास के किसानों को कर्नाटक इंडस्ट्रियल एरियाज डेवलपमेंट बोर्ड (KIADB) या बेंगलुरु डेवलपमेंट अथॉरिटी (BDA) की तरफ से 25 करोड़ रुपए प्रति एकड़ मिलना चाहिए। सभी अधिग्रहणों के लिए मुआवजे का यही आधार हो।'
किसानों की हमदर्द होने का दावा करती है कांग्रेस
कर्नाटक में कांग्रेस की सरकार है, जो पिछले एक दशक से विभिन्न किसान आंदोलनों का समर्थन करती रही है और उसे सक्रिय तौर पर सहयोग भी देती आ रही है। चाहे दिल्ली के पास यूपी का भट्टा पारसौल का विवाद हो या फिर तीन कृषि कानूनों के खिलाफ दिल्ली की सीमाओं और देश के अन्य हिस्सों में चला लंबा किसान आंदोलन।
कांग्रेस सरकार के दावों का क्या हुआ?
ऐसे में कर्नाटक के किसान सवाल उठा रहे हैं कि अब कांग्रेस सरकार के दावों का क्या हुआ। जैसे रेड्डी का कहना है कि 'जब भी राज्य में सरकार विकास योजनाओं के लिए जमीन लेती है तो वह 60:40 के अनुपात में उसे विकसित करके देती है। 60% विकसित भूमि, जिसमें कॉर्नर प्लॉट से लेकर, कॉमर्शियल स्पेस और अन्य महत्वपूर्ण जगह सरकार अपने पास ही रखती है और किसानों को 40% ही मिलता है।'
उनका कहना है कि 'लेकिन इस मामले में (सिद्दारमैया के मामले में) शहरी विकास विभाग कैसे 50:50 के अनुपात में मुआवजे के लिए तैयार हो गया? क्या सरकार, जो किसानों की हितैषी होने का दावा करती है, उन्हें विकसित जमीन का 60% देने तैयार होगी?'












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