OI Exclusive: तोलोलिंग की पहाड़ी पर इस फौजी को लगी थी पहली गोली, कारगिल विजय दिवस पर बयां की पूरी कहानी
Kargil War Hero Prahlad Singh: ''8 मई 1999 की सुबह सूरज उगा ही था। घातक प्लाटून के हम 20 जवान तोलोलिंग की पहाड़ी पर घुसपैठियों की टोह लेने गए थे। LOC पर बकरवालों के हट तक जा पहुंचे थे। वहां घुसपैठियों ने हमारी जमीन पर कब्जा कर रखा था। जैसे ही घुसपैठियों को देखा, मैंने लाइट मशीन गन (LMG) से फायरिंग शुरू कर दी। इसी कारण उन्होंने मुझे सबसे पहले निशाना बनाया और मुझ पर स्नाइपर से गोलियां दागीं। मेरे पेट, कंधा और दोनों हाथों पर कुल चार गोलियां लगीं। कारगिल युद्ध में तोलोलिंग की पहाड़ी पर घायल होने वाला मैं पहला भारतीय सैनिक था। सबसे पहले लहू मेरा बहा था।''
रिटायर फौजी प्रहलाद सिंह महला के जेहन में 26 साल पुरानी कारगिल जंग की हर वो बात याद है, जिसमें अदम्य साहस है। दुश्मनों को देखते ही खून खौलना है। भारत मां की रक्षा के लिए जान की बाजी लगाना है और तोलोलिंग पर जीत का तिरंगा लहराना है। कारगिल विजय दिवस 2025 के मौके पर वनइंडिया हिंदी से खास बातचीत में प्रहलाद सिंह महला ने एक फौजी के जोश और जज्बे को सलाम करने वाली पूरी कहानी बयां की।

पाकिस्तान पर भारत की जीत की याद में हर साल 26 जुलाई को मनाए जाने वाले कारगिल विजय दिवस की पूर्व संध्या प्रहलाद सिंह महला को फोन किया तो ये कोबरा कमांडो दिगेंद्र सिंह के साथ असम के डिब्रूगढ़ एयरपोर्ट से अरुणाचल प्रदेश विश्वविद्यालय के रास्ते में थे। विश्वविद्यालय में कारगिल दिवस होने वाले समारोह में मुख्य अतिथि के तौर पर जा रहे थे। कमांडो दिगेंद्र सिंह वही फौजी हैं, जिन्होंने इस पहाड़ी पर भारतीय सेना को पहली जीत दिलवाई थी और पाकिस्तान के मेजर अनवर खान का सिर धड़ से अलग कर दिया था।
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भारतीय सेना की 16 ग्रेनेडियर में नायक सेक्शन कमांडर रहे प्रहलाद सिंह महला कहते हैं कि कारगिल सेक्टर में द्रास के पास करीब 17 हजार फीट ऊंचाई वाली तोलोलिंग पहाड़ी बर्फीली चोटी है। भारी बर्फ पड़ने पर भारतीय फौज तोलोलिंग की चोटी से काफी नीचे तक आ जाती है। इसी का फायदा उठाकर पाकिस्तान ने मई 1999 में घुसपैठ कर ली थी। जुबेर हिल के पास बकरा हट पर कब्जा जमा लिया था। हमारी 20 जवानों की टीम को घुसपैठियों का पता लगाने के लिए भेजा गया था।

पांच जवान शहीद व 12 हो गए थे घायल
घातक प्लाटून के 20 जवानों का तोलोलिंग की पहाड़ी पर 8 मई 1999 को घुसपैठियों से आमना-सामना हुआ। पहली गोली प्रहलाद सिंह महला को लगी। कुल 12 फौजी घायल हुए। पांच जवान हवलदार जयप्रकाश, हवलदार पदम सिंह, अमरदीप, मोहन कटाक और सुखदेव शहीद हो गए। यह टीम एक दिन और एक रात तक लगातार दुश्मनों का डटकर मुकाबला करती रही। फिर बैकअप टीम आ गई और उसने मोर्चा संभाल लिया। साथ में रेस्क्यू टीम भी थी। उसने घायल जवानों को आर्मी अस्पताल में पहुंचाया और शहीद सैनिकों के शव तोलोलिंग की पहाड़ी से नीचे लेकर आए।
समय से पहले होना पड़ा रिटायर
प्रहलाद सिंह महला ने बताया कि कारगिल की जंग में तोलोलिंग की पहाड़ी पर उनका काफी खून बहा था। उपचार के दौरान अस्पताल में जरूरत पड़ने पर ब्रिगेडियर अजीत सिंह ने इन्हें ब्लड दिया। काफी समय तक इलाज चला और साल 2001 में IMB (Invalidated Medical Board) रिटायरमेंट मिला। अगर सही सलामत रहते तो रिटायरमेंट साल 2020 में होता। शरीर पर चार गोलियों के निशान आज भी मौजूद हैं।
महला परिवार की चौथी पीढ़ी भी फौज में
प्रहलाद सिंह महला मूल रूप से राजस्थान के झुंझुनूं जिले के खंगा का बास देवराला के रहने वाले हैं। वर्तमान में इनका परिवार जयपुर के वैशाली नगर में रह रहा है। 10 दिसंबर 1988 को भारतीय सेना ज्वाइन करने वाले प्रहलाद सिंह महला अपने परिवार से तीसरी पीढ़ी थे। इनसे पहले इनके पिता थानाराम 7 राजपूताना राइफल्स में थे। दादा बिरड़ा राम भारतीय सेना में नायक पद रहे और अब चौथी पीढ़ी में इनके बेटे कैप्टन अमित महला आर्मी मेडिकल कोर में सेवा दे रहे हैं।
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