जस्टिस वर्मा पर महाभियोग की गाज: क्या भारत में पहली बार पद से हटेगा कोई जज, जानें पूरी प्रक्रिया
Mahabhiyog Kya Hota Hai: इलाहाबाद हाईकोर्ट के जस्टिस यशवंत वर्मा की मुश्किलें बढ़ गई हैं। कथित रूप से उनके सरकारी आवास पर अधजले नोट मिलने के मामले में अब लोकसभा में महाभियोग की प्रक्रिया शुरू हो गई है। जस्टिस वर्मा को हटाने के लिए विभिन्न दलों के 146 सांसदों ने प्रस्ताव दिया, जिसे लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला ने मंजूर कर लिया।
लोकसभा अध्यक्ष बिरला ने जस्टिस वर्मा के खिलाफ लगे आरोपों की जांच के लिए तीन सदस्यीय कमेटी बनाई है, जिसमें सुप्रीम कोर्ट के जज व पूर्व चीफ जस्टिस गुजरात हाईकोर्ट अरविंद कुमार, मद्रास, राजस्थान-छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट के पूर्व जज एमएम श्रीवास्तव और कर्नाटक हाईकोर्ट के वरिष्ठ वकील बीवी आचार्य को शामिल किया है। इन्हें जांच रिपोर्ट जल्द देने को कहा है।

किसी जज को महाभियोग से नहीं हटाया गया
भारत में अब तक जजों के खिलाफ कई बार महाभियोग की प्रक्रिया शुरू हुई है, हालांकि किसी भी जज को महाभियोग से उसके पद से नहीं हटाया गया है। जस्टिस वर्मा के केस में कमेटी की जांच रिपोर्ट आने तक प्रस्ताव लंबित रहेगा। दोनों सदनों में विशेष बहुमत से प्रस्ताव पास करवाना होगा। महाभियोग प्रक्रिया में प्रस्ताव पास होने के बाद उसे राष्ट्रपति को भेजा जाएगा। फिर हटाने की अधिसूचना जारी होगी।
जस्टिस वर्मा के खिलाफ महाभियोग क्यों?
14 मार्च 2025 को जस्टिस यशवंत वर्मा के दिल्ली स्थित सरकारी आवास पर अधजले नोटों की बोरियां मिली थी। तब वर्मा दिल्ली हाई कोर्ट के जज थे। बाद में उनका ट्रांसफर इलाहाबाद हाईकोर्ट में हो गया था। जज के आवास से नोट मिलने के मामले में दिल्ली हाई कोर्ट के चीफ जस्टिस ने जांच कराकर रिपोर्ट सीजेआई को दी।
तत्कालीन सीजेआई संजीव खन्ना ने जांच रिपोर्ट के आधार पर जस्टिस वर्मा को इस्तीफा देने व महाभियोग का सामना करने को कहा। वर्मा ने इस्तीफा देने से इनकार कर दिया था। इसलिए महाभियोग की प्रक्रिया शुरू की गई है।
किन सांसदों ने दिया प्रस्ताव?
21 जुलाई 2025 को नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी और पूर्व कानून मंत्री व भाजपा नेता रविशंकर प्रसाद समेत विभिन्न पार्टियों के कुल 146 सांसदों ने जस्टिस वर्मा के खिलाफ महाभियोग की प्रक्रिया शुरू करने का प्रस्ताव रखा था।
इन जजों के खिलाफ महाभियोग प्रस्ताव
देश में भले ही आज तक किसी भी जज को महाभियोग चलाकर हटाया नहीं जा सका, मगर कई जजों के खिलाफ महाभियोग का प्रस्ताव लाया जा चुका है। कभी प्रस्ताव लोकसभा या राज्यसभा में पास नहीं हो सका तो किसी मामले में खुद जज ने ही महाभियोग से हटाए जाने से पहले इस्तीफा दे दिया।
- 1. जस्टिस दीपक मिश्रा: साल 2018 में तत्कालीन सीजेआई, प्रशासनिक अनियमितता के आरोप में महाभियोग। राज्यसभा में प्रस्ताव। चेयरमैन (वेंकैया नायडू) ने खारिज किया।
- 2. जस्टिस जेबी पारदीवाला: साल 2015 में गुजरात हाई कोर्ट के जज रहते हुए विवादित टिप्पणी पर मामला महाभियोग तक जा पहुंचा। टिप्पणी हटाए जाने पर प्रस्ताव वापस लिया गया।
- 3. जस्टिस पीडी दिनाकरण: साल 2011 में सिक्किम हाई कोर्ट के चीफ जस्टिस के खिलाफ भ्रष्टाचार के आरोप लगे। महाभियोग प्रक्रिया शुरू होने से पहले इस्तीफा दे दिया।
- 4. जस्टिस सौमित्र सेन: साल 2011 में कोलकाता हाई कोर्ट के जज, ट्रस्ट फंड में गड़बड़ी के आरोप लगे। महाभियोग का प्रस्ताव राज्यसभा में पहुंचा। इस्तीफा दे दिया।
- 5. जस्टिस वी रामास्वामी: साल 1991 में सुप्रीम कोर्ट के जज पर वित्तीय अनियमितताओं के आरोप लगे। प्रस्ताव को साधारण बहुमत मिला, लेकिन आवश्यक 2/3 बहुमत नहीं मिलने के कारण प्रस्ताव लोकसभा में ही पास नहीं हो पाया।
जज को हटाने की महाभियोग प्रक्रिया क्या है?
महाभियोग का मतलब है कि संसद की तय प्रक्रिया के ज़रिए किसी जज को उसके पद से हटाना, अगर उसने गंभीर गलती (सिद्ध कदाचार) की हो या वह अपने काम में अयोग्य (अक्षमता) हो। यह प्रक्रिया संविधान और न्यायाधीश (जांच) अधिनियम, 1968 के तहत होती है।
कब और क्यों जज हटाया जा सकता है?
अगर जज पर सिद्ध कदाचार (proved misbehaviour) हो, जैसे भ्रष्टाचार या न्यायिक पद का दुरुपयोग। अगर जज काम करने में अयोग्य (incapacity) हो, जैसे गंभीर बीमारी या मानसिक/शारीरिक अक्षमता।
चरण-दर-चरण प्रक्रिया
- 1. प्रस्ताव शुरू करना: संसद के किसी भी सदन (लोकसभा या राज्यसभा) में यह प्रस्ताव रखा जा सकता है। लोकसभा में कम से कम 100 सांसद और राज्यसभा में 50 सांसद का समर्थन जरूरी है।
- 2. अनुमति लेना: प्रस्ताव आने के बाद, लोकसभा में स्पीकर या राज्यसभा में चेयरमैन तय करते हैं कि इसे मंजूरी दें या नहीं। अगर मंजूरी मिलती है, तो आगे जांच शुरू होती है।
- 3. जांच समिति का गठन: एक सुप्रीम कोर्ट का जज। एक हाई कोर्ट का मुख्य न्यायाधीश और एक प्रतिष्ठित न्यायविद (प्रसिद्ध कानूनी विशेषज्ञ) की समिति आरोपों की पूरी जांच करती है और रिपोर्ट देती है कि आरोप सही हैं या नहीं।
- 4. संसद में मतदान: अगर समिति कहती है कि आरोप साबित हैं, तो प्रस्ताव संसद के दोनों सदनों में रखा जाता है। इसे पास करने के लिए दोनों सदनों में कुल सदस्य संख्या का बहुमत और उपस्थित व मतदान करने वालों में से दो-तिहाई बहुमत चाहिए।
- 5. राष्ट्रपति का आदेश: दोनों सदनों में पास होने के बाद, प्रस्ताव राष्ट्रपति के पास जाता है। राष्ट्रपति आदेश जारी कर उस जज को पद से हटा देते हैं।












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