Dhananjaya Y Chandrachud: जस्टिस चंद्रचूड़ के पिता के वो दोनों बड़े फैसले जानिए, जिसे बेटे ने ही पलट दिया
Justice DY Chandrachud देश के नए प्रधान न्यायाधीश बन गए हैं। वे भारत के ऐसे पहले सीजेआई हैं, जिनके पिता जस्टिस वाईवी चंद्रचूड़ भी चीफ जस्टिस थे और उनका कार्यकाल भी सबसे लंबा था। जस्टिस चंद्रचूड़ अपने अबतक के करियर में कई महत्वपूर्ण फैसलों के लिए जाने जाते हैं। लेकिन, जज के रूप में उनके नाम दो ऐसे फैसले भी हैं, जिसमें उन्होंने अपने पिता के निर्णयों को भी पलट दिया था और यह दोनों फैसले भारतीय लोकतंत्र के लिए मील के पत्थर साबित हुए हैं और इनका दूरगामी असर रहने वाला है।

आपातकाल के पक्ष में पिता के दिए गए फैसले को पलटा
जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़ 2017 में सुप्रीम कोर्ट के उन 9 जजों की संविधान पीठ का हिस्सा थे, जिसने निजता के अधिकार को मौलिक अधिकार माना था और 1975 में आपातकाल को सपोर्ट करने वाले एक विवादित आदेश को पलट दिया था। दरअसल, जस्टिस चंद्रचूड़ के पिता जस्टिस वाईवी चंद्रचूड़ ने देश में आपातकाल लगाने के राष्ट्रपति के आदेश को बरकरार रखा था। जबकि, देश पर आपातकाल थोपने का तत्कालीन इंदिरा गांधी सरकार का फैसला पूरी तरह से राजनीतिक था। इस दौरान कांग्रेस की तत्कालीन सरकार ने लोगों के लोकतांत्रिक अधिकारों को बेरहमी से कुचल दिया गया था, विपक्ष के अधिकतर नेताओं को जेलों में ठूंस दिया गया था, मीडिया का गला घोंट दिया गया था और यहां तक हजारों लोगों को जबरन उठाकर नसबंदी को भी अंजाम दिए जाने के आरोप लगाए गए थे।

जस्टिस खन्ना के नजरिए को स्वीकार किया
जस्टिस वाईवी चंद्रचूड़ तब सुप्रीम कोर्ट के उन पांच जजों की बेंच में शामिल थे, जिन्होंने 1976 में फैसला दिया था कि आपातकाल के दौरान लोगों के मौलिक अधिकारों को निलंबित किया जा सकता है और अपने अधिकारों की रक्षा के लिए लोग अदालतों का दरवाजा भी नहीं खटखटा सकते। उस बेंच में एकमात्र जज जस्टिस एचआर खन्ना ही थे, जिन्होंने चार जजों की राय को नकारते हुए और कांग्रेस सरकार खिलाफ जाते हुए कहा था कि 'कानून का शासन दांव पर लगा है.......प्रश्न यह है कि क्या कोर्ट के अधिकार के माध्यम से लागू होने वाला कानून बिल्कुल खामोश और मौन हो जाएगा........।' 41 साल बाद जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़ ने अपने पिता वाली बेंच के आदेश को 'गंभीर तौर पर त्रुटिपूर्ण' बताया और जस्टिस खन्ना की सराहना की। उन्होंने कहा, 'जस्टिस खन्ना का जो नजरिया है उसे निश्चित तौर पर स्वीकार किया जाए.........'

अडल्टरी अब अपराध नहीं रहा
जस्टिस चंद्रचूड़ ने जिस दूसरे मामले में अपने पिता के फैसले को पलटने में अहम भूमिका निभाई, वह व्यभिचार कानून है। 2018 में जस्टिस चंद्रचूड़ उस बेंच में शामिल थे, जिसने व्यभिचार कानून को सर्वसम्मति से खारिज कर दिया था। व्यभिचार कानून एक आदमी के द्वारा दूसरे आदमी के खिलाफ किए जाने पर उसे अपराध मानता था। जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़ की सदस्यता वाली बेंच के फैसले के बाद अडल्टरी अब देश में अपराध नहीं रह गया है और यह सिर्फ तलाक का आधार बनाया जा सकता है।

पिता ने अडल्टरी को संवैधानिक करार दिया था
1985 में जस्टिस वाईवी चंद्रचूड़ की अदालत ने व्यभिचार कानून को संवैधानिक रूप से मान्य करार दिया था। इस कानून का सेक्शन 497 कहता था- 'किसी आदमी की सहमति के बिना उसकी पत्नी के साथ यदि कोई व्यक्ति यौन संबंध बनाता है तो वह व्यभिचार का दोषी माना जाएगा।' जस्टिस वाईवी चंद्रचूड़ ने फैसले में लिखा था, 'आमतौर पर यह माना जाता है कि पुरुष ही बहकाने वाला होता है, महिला नहीं। साल-दर-साल स्थिति में बदलाव भी हुआ हो सकता है, लेकिन यह विधायिका पर निर्भर है कि क्या धारा 497 को उचित रूप से संशोधित किया जाना चाहिए, ताकि समाज में आए बदलाव पर गौर किया जा सके।'

'कानून समय के मुताबिक 'प्रासंगिक' होना चाहिए'
तीन दशक बाद उनके बेटे और देश के प्रधान न्यायाधीश जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़ ने यह फैसला दिया कि कानून समय के मुताबिक 'प्रासंगिक' होना चाहिए। उनके मुताबिक धारा 497 'विवाह में महिला के अधीनस्थ प्रकृति दिखाने का दोषी है।' जस्टिस चंद्रचूड़ ने कहा, 'अक्सर अडल्टरी तब होता है, जब शादी पहले ही टूट चुकी होती है और दंपति अलग रहते हैं। यदि इनमें से कोई भी किसी दूसरे व्यक्ति के साथ यौन संबंध बनाता है, क्या उसे धारा 497 के तहत सजा दी जानी चाहिए?'












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