'बिजली परियोजना की अनावश्यक खुदाई से जमीन खिसक रही है', स्थानीय लोगों ने बताया क्यों धंस रहा है जोशीमठ

Joshimath:उत्तराखंड के चमोली जिले में स्थित जोशीमठ के 600 से अधिक घरों में दरार आ गई है। 68 से अधिक घरवालों को राहत कैंप में शिफ्ट किया गया है। पीएम नरेंद्र मोदी और सीएम धामी दोनों ने मामले पर लगातार समीक्षा कर रहे हैं।

Why is Joshimath sinking

उत्तराखंड के चमोली जिले में 6,000 फीट की ऊंचाई पर स्थित जोशीमठ का एक मशहूर शहर है। बद्रीनाथ, हेमकुंड साहिब, औली और फूलों की घाटी जैसे अन्य धार्मिक और ट्रेकिंग स्थलों की ओर जाने वाले यात्री आगे की यात्रा करने से पहले रात भर जोशीमठ में रुकते हैं। यह भारतीय सेना के लिए सामरिक महत्व का भी है। जोशीमठ को फिलहाल ''सिंकिंग जोन'' घोषित किया गया। पिछले कुछ दशकों में जोशीमठ में आबादी और निर्माण गतिविधियों की वजह से कई सारे विस्फोट हुआ है। हिमालयी तीर्थनगरी जोशीमठ के निवासियों ने अपनी दुर्दशा के लिए प्रमुख बिजली और सड़क बुनियादी ढांचा परियोजनाओं को दोष दिया है। जोशीमठ के लोगों को कहना है कि बिजली परियोजना की अनावश्यक खुदाई से जमीन खिसक रही है।

स्थानीय लोगों ने जोशीमठ को लेकर क्या-क्या कहा?

स्थानीय लोगों ने जोशीमठ को लेकर क्या-क्या कहा?

जोशीमठ के निवासियों की मांग है कि जिन प्रमुख बिजली और सड़क बुनियादी ढांचा परियोजनाओं की वजह से जोशीमठ का जमीन धंस रहा है, उसके लिए कहीं-न-कहीं सरकार जिम्मेदार है। हमारी मांग है कि सरकार उन सभी लोगों को पुनर्स्थापित करे और उन्हें नया घर दे। स्थानीय लोगों का कहना है कि उस कस्बे में 600 घरों के लोगों ने अपनी संपत्ति खो दी है।

उत्तराखंड के मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी के शहर का दौरा करने के एक दिन बाद लोगों ने जमीन खिसकने के लिए राष्ट्रीय थर्मल पावर कॉरपोरेशन (एनटीपीसी) तपोवन-विष्णुगढ़ को जिम्मेदार बताया। वहीं रविवार 08 जनवरी को तहसील मुख्यालय के बाहर अपना विरोध जताया। उनका साफ-साफ कहना है कि 'अपरिवर्तनीय' क्षति के लिए बिजली परियोजना जिम्मेदार है।

'विकास परियोजना तब रोका गया, जब जोशीमठ आपदा के कगार पर था'

'विकास परियोजना तब रोका गया, जब जोशीमठ आपदा के कगार पर था'

जोशीमठ बचाओ संघर्ष समिति के संयोजक अतुल सती ने कहा कि सरकार ने विकास परियोजना को केवल तब रोका जब शहर आपदा के कगार पर था। हमने वर्षों पहले चेतावनी दी थी कि एनटीपीसी का काम इस शहर को खतरे में ला देना। लेकिन किसी ने ध्यान नहीं दिया। अब आप जोशीमठ की स्थिति देखिए क्या हो गई है।

जोशीमठ क्षेत्र के सुनील गांव के दुकानदार दिनेश चौधरी ने सीमा सड़क संगठन द्वारा हेलंग-मारवाड़ी बाईपास के निर्माण पर बराबर जोर देते हुए कहा कि केवल परियोजनाओं को रोकने से काम नहीं चलेगा। सरकार को एनटीपीसी और बीआरओ परियोजनाओं पर पूर्ण विराम लगाना चाहिए। तभी जोशीमठ को बचाया जा सकेगा।'

'एक साल से आ रही है घरों में दरारें...'

'एक साल से आ रही है घरों में दरारें...'

जोशीमठ के निवासियों ने कहा कि वे एक साल से अधिक समय से अपने घरों में दरारों के बारे में सरकार से शिकायत कर रहे हैं। लेकिन जब उनके भवन में दरारें आई तब प्रशासन सक्रिय हुआ है। वास्तव में, जोशीमठ में दरारें अब सिर्फ घरों और इमारतों तक ही सीमित नहीं रह गई हैं, यहां तक कि ट्रेकिंग मार्गों पर सड़कों और चट्टानों में भी फ्रैक्चर दिखाई देते हैं।

'एक हफ्ते में सिर्फ 68 परिवारों को निकाला गया...'

'एक हफ्ते में सिर्फ 68 परिवारों को निकाला गया...'

देहरादून के सामाजिक कार्यकर्ता अनूप नौटियाल ने आरोप लगाया कि एक सप्ताह में, चमोली में जिला प्रशासन सिर्फ 68 परिवारों को निकालने में कामयाब रहा है और अब तक केवल 1,271 लोगों के लिए अस्थायी पुनर्वास की व्यवस्था कर सका है। उन्होंने कहा कि जिस धीमी गति से प्रशासन निकासी और पुनर्वास पर काम कर रहा था वह इस "आपातकाल" में काफी नहीं है।

जिला प्रशासन पर लापरवाही के आरोप!

जिला प्रशासन पर लापरवाही के आरोप!

नौटियाल ने आरोप लगाया, 04 जनवरी को जिला प्रशासन के पास 385 लोगों के पुनर्वास के लिए जगह थी। बचाव कार्य शुरू होने के 5 दिन बाद, कथित रूप से युद्धस्तर पर, प्रशासन 8 जनवरी तक 1,271 लोगों के पुनर्वास के लिए जगह बनाने में सफल रहा। यह आंकड़ा जोशीमठ की कुल आबादी का 6 फीसदी भी नहीं है। 2011 की जनगणना के अनुसार, जोशीमठ की आबादी 16,000 से अधिक है। प्रशासनिक अधिकारियों का कहना है कि शहर में वर्तमान में 20,000 से अधिक लोग रहते हैं।

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