किसकी राह में रोड़े अटकाएगा जेएनयू विवाद
जेएनयू मामले को लेकर पूरे देश की सरगर्मियां बढ़ी हुई हैं। लगातार सियासी पत्ते फेंटे जा रहे है। जिससे मजबूत दावेदारों की घेराबंदी की जा सके। रही बात जेएनयू मामले से यूपी को जोड़कर अगर देखा जाए तो बीजेपी सबसे मुखर हो चुकी है। क्योंकि सपा के सामने एक बार फिर आपराधिक ग्राफ और जातिवाद बड़ी चुनौती बनकर उभरने वाला है। तो सीधे तौर पर टक्कर भाजपा बनाम बसपा ही मानी जा रही है। दरअसल ये हमारा कहना नहीं है बल्कि ये राय है यूपी की जनता की।

यदि जेएनयू के लिहाज से बात की जाए तो अभी तक पूरी सक्रियता वामपंथी बनाम दक्षिणपंथियों की मानी जा रही थी। जिसमें सीधे तौर पर भाजपा का चेहरा देशद्रोही नारों का विरोध करने वालों में स्पष्टतया देखा जा सकता है। आईये जानने की कोशिश करते हैं कि जेएनयू मामला किस तरह से भाजपा की मुश्किलों में इजाफा कर सकता है।
अपने ही बन सकते हैं बंटाधार की वजह
जहां एक ओर बीजेपी का लगभग पूरा खेमा जेएनयू में हुई हरकत का हर सिरे से विरोध कर रहा था, जिनमें देशद्रोही नारे लगाने वालों में जेएनयू छात्र संघ के अध्यक्ष कन्हैया कुमार के भी शामिल होने की बात सामने आई थी।

लेकिन पटना साहिब से भाजपा सांसद शत्रुघन सिन्हा ने ट्विट के जरिए कन्हैया कुमार का समर्थन किया। जिससे भाजपा पर सवाल खड़े होना तय है। लोगों के जहन में यहां तक कि सवाल दस्तक भी देने लगे हैं कि क्यों हर बार शत्रुघन पार्टी लाइन से अलग थलग दिखाई देते हैं। इसे विपक्षी आंतरिक कलह का जामा पहनाकर पार्टी की नीति पर सवाल दाग सकते हैं।
खबरों के लिहाज से मीडिया में भी मतभेद
कन्हैया कुमार की पेशी के दौरान पटियाला हाउस कोर्ट में हुई मीडियाकर्मियों के साथ हुई बद्सलूकी भी एक मुद्दे के तौर पर बीजेपी के सामने खड़ी हो सकती है। हालांकि आम जनता का कहना है कि अमेरिका की तर्ज पर भारतीय मीडिया भी रिपब्लिकन और डेमोक्रेट्स में से अपनी सुविधानुसार हिमायत करने लगी है।

राजनीति के जानकारों का ये भी मानना है कि कुछ लोग रिपब्लिकन्स को बढ़ावा दे रहे हैं वहीं कुछ लोग डेमोक्रेट्स के साथ भी समर्थन देते नजर आयेंगे। लेकिन इन दोनों का साझा असर बीजेपी के लिए मुश्किलों का सबब बन सकता है।
सोशलबाज पीएम पर सोशल हमला
जिस तरह से लोकसभा चुनावों के दौरान नरेंद्र मोदी को घर-घर पहुंचाने के लिए सोशल मीडिया माध्यमों का इस्तेमाल हुआ जिसका उन्हें फायदा भी बखूबी मिला। लेकिन अब यदि गौर किया जाए तो विपक्षियों ने उतनी ही तत्परता के साथ विरोध की खातिर सोशल मीडिया पर खुद को पहले से काफी ज्यादा एक्टिव कर लिया है। फोटोशॉप के जरिए हो या फिर किसी अन्य मुददे को लेकर पीएम नरेंद्र मोदी की खिलाफत की खातिर अलग विचारधाराओं का झुंड कुछ न कुछ नया ही करता रहता है।

फिलवक्त उन्हें मुद्दे के तौर पर जेएनयू से बेहतर भला क्या लग सकता है। जिससे कयास लगाई जा रही है कि वे बीजेपी की यूपी के दृष्टिकोण से सियासी दांव को कमजोर करने की कीशिश करेंगे। देश में हो रही तमाम घटनाओं की वजह से लोग पीएम मोदी की कथित करिश्माई छवि को बिसरा कर उनके कामकाज को कठघरे में खड़ा करने लगे हैं। यूपी के लिहाज से भाजपा को पुरजोर करने की कोशिशें करनी होंगी।












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