झारखंड में भाजपा के पूर्व नेता की बदौलत ही खुल पाया राजद का खाता
नई दिल्ली। झारखंड चुनाव में राजद को केवल एक सीट मिली है। महागठबंधन में सबसे खराब प्रदर्शन उसी का रहा। फिर भी लालू और तेजस्वी खुश हैं। उन्हें अपनी हार से गम कम है। इस बात से बेहद खुशी है कि भाजपा सत्ता से बेदखल हो गयी। लालू रांची जेल (रिम्स में इलाजरत) में हैं। हेमंत की नयी सरकार लालू के लिए नया सवेरा लेकर आएगी। अपनी सरकार होगी, अपनी बात होगी। तेजस्वी भले अपनी चिंता जाहिर नहीं कर रहे हैं लेकिन वे अंदर ही अंदर परेशान हैं । उन्हें मलाल है कि गठबंधन के पक्ष में हवा रहने के बाद भी राजद को केवल एक सीट ही क्यों मिली ? क्या लालू का नाम भी अब बेअसर हो रहा है ? भाजपा से खुन्नस पालने वाले लालू को झारखंड में अगर एक जीत भी मिली तो वह भाजपा के ही एक पूर्व नेता ने ही दिलायी। वर्ना लालू के विश्वासपात्र एक नेता भी नहीं जीत पाये।

राजद को सात में से केवल एक पर जीत
महागठबंधन में झामुमो ने 43 सीटों पर चुनाव लड़ कर 30 में जीत हासिल की। कांग्रेस ने 31 में से 16 सीटों पर जीत दर्ज की। राजद को सात सीटें मिलीं थीं लेकिन वह एक पर ही जीत पाया। लालू यादव ने तो 14 उम्मीदवारों के सिम्बल पर दस्तखत कर दिये थे। राजद के नेता इतनी ही सीटों पर चुनाव लड़ने के लिए अड़े हुए थे। ये तो हेमंत सोरेन की सूझबूझ थी कि उन्होंने राजद को सात सीटों पर लड़ने के लिए राजी कर लिया। हेमंत लालू से मिले थे। उन्होंने बताया था कि अगर राजद अलग चुनाव लड़ेगा तो वह 2014 के नतीजों को याद कर लें। जिस सीट पर जो प्रत्याशी जीतने लायक हैं, उसे ही मैदान में उतारा जाए। लालू को भी बात समझ में आ गयी थी। उन्हें झुकना पड़ा। अब ये बात सच साबित हो गयी कि अगर राजद अधिक सीटों पर चुनाव लड़ता तो महागठबंधन को बहुत नुकसान उठाना पड़ता। तब शायद ही उसे 47 सीटें मिल पातीं।

लालू का नाम फिर भी राजद फीका
राजद को केवल चतरा सीट पर जीत मिली है। यहां सत्यानंद भोक्ता ने राजद को दस साल बाद जीत दिलायी। सत्यानंद भोक्ता भाजपा के मजबूत नेता रहे हैं। उन्होंने 2000 और 2005 में भाजपा के टिकट पर यहां से जीत हासिल की थी। 2009 में राजद के जनार्दन पासवान चतरा सीट पर जीते थे। 2014 में भाजपा के जयप्रकाश भोक्ता जीते थे। इस बार भाजपा ने जयप्रकाश का टिकट काट कर राजद के जनार्दन पासवान को अपना उम्मीदवार बनाया था। जनार्दन के भाजपा में आने से नाराज सत्यानंद राजद में चले गये। सत्यानंद का पाला बदलना सफल रहा। उन्होंने भाजपा के जनार्दन पासवान को 24 हजार से अधिक वोटों से हरा दिया। यानी राजद को एकमात्र सीट भाजपा के पूर्व नेता ने दिलायी। राजद के समर्पित नेता माने जाने वाले उम्मीदवार हार गये। संजय सिंह यादव, लालू के नजदीकी नेता माने जाते हैं। वे हुसैनाबाद से विधायक भी रहे हैं। लेकिन 2019 में हवा के बावजूद वे एनसीपी के कमलेश सिंह से लगभग दस हजार वोटों से हार गये। छतरपुर में राजद के विजय राम को भाजपा की पुष्पा देवी ने 26 हजार 792 वोटों से हरा दिया। बरकट्ठा सीट राजद के खालिद खलील तो मुकाबले में ही नहीं रहे। उन्हें केवल 3 हजार 641 वोट मिले। यहां निर्दलीय अमित यादव ने भाजपा के जानकी यादव को हराया। कोडरमा, देवघर और गोड्डा में राजद ने जरूर कांटे का मुकाबला दिया लेकिन हार ही मिली। कोडरमा में भाजपा की नीरा यादव ने राजद के अभिताभ कुमार को 1797 वोटों से हराया। देवघर में भाजपा के नारायण दास ने राजद के सुरेश पासवान को 2624 वोटों से हराया। गोड्डा में भाजपा के अमित मंडल ने राजद के संजय प्रसाद यादव को 4512 मतों से मात दी।

बिहार में हो सकता है असर
झारखंड चुनाव में कांग्रेस का प्रदर्शन राजद से बेहतर रहा। कांग्रेस ने अपने कोटे की लगभग आधी सीटें जीत लीं। बिहार के महागठबंधन में ये दोनों दल शामिल हैं। लोकसभा चुनाव के समय बिहार में राजद और कांग्रेस खूब लड़े थे। सीट बंटवारे में कांग्रेस को राजद से दबना पड़ा था। इससे दोनों को नुकसान हुआ था। कांग्रेस को तो एक सीट मिल भी गयी थी लेकिन चार सांसदों वाले राजद का खाता भी नहीं खुला था। झारखंड चुनाव में कांग्रेस ने अब तक का अपना सर्वश्रेष्ठ (16) प्रदर्शन किया है। इस जीत के बाद उसका हौसला बढ़ा हुआ है। प्रियंका गांधी के रूप में उसे वोट दिलाऊ नेता भी मिल गया है। अक्टूबर 2020 में जब बिहार में विधानसभा का चुनाव होगा तो कांग्रेस पहले की तरह याचक की मुद्रा में नहीं रहेगी। राजद की ताकत अब धीरे-धीरे कम हो रही है। उसे भी जीत के लिए सहयोगियों की जरूरत होगी। यह सच है कि बिहार और झारखंड की राजनीति परिस्थितियां अलग-अलग हैं लेकिन ब्रांड लालू का फीका होना राजद के लिए बड़ा धक्का है।
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