झारखंड चुनाव के तीन अहम किरदार जिनके बूते बन या फिर गिर सकती है सरकार
रांची। झारखंड विधानसभा के चुनाव में आज तक किसी दल को अकेले दम पर बहुमत नहीं मिला है। अब तक या तो मिलीजुली सरकार बनी है या फिर गठबंधन की सरकार बनी है। खंडित जनादेश वाले राज्य में उन दलों का महत्व बढ़ जाता है जिनकी बदौलत सरकार बनती या गिरती है। रघुवर दास 2014 में आजसू के समर्थन से मुख्यमंत्री बने थे। शिबू सोरेन या हेमंत सोरेन भी कांग्रेस और राजद के समर्थन से ही मुख्यमंत्री बने। बाबूलाल मरांडी जब 2000 में झारखंड के पहले मुख्यमंत्री बने थे तब उन्हें समता पार्टी और वनांचल कांग्रेस ने समर्थन दिया था। गैरभाजपा दलों का मानना है कि 2019 में भी किसी दल को पूर्ण बहुमत नहीं मिलने वाला है। अगर ऐसा होता है तो हेमंत सोरेन, बाबूलाल मरांडी और सुदेश महतो भावी राजनीति के 'की प्लेयर’ बन जाएंगे। इनके रुख पर ही सत्ता का समीकरण निर्धारित होगा। इसलिए इन तीन महारथियों जीत से कम कुछ भी मंजूर नहीं।

हेमंत सोरेन
हेमंत सोरेन महागठबंधन की तरफ से मुख्यमंत्री पद के प्रत्याशी हैं। महागठबंधन के लिए उनका जीतना सबसे जरूरी है। उनकी जीत पर ही गैरभाजपा सरकार की संभावना टिकी हुई है। शिबू सोरेन के उम्रदराज होने के बाद हेमंत ही झामुमो के सबसे बड़े नेता हैं। लेकिन वे अपनी जीत को लेकर पूरी तरह आश्वस्त नहीं हैं। इसलिए 2019 में भी उन्होंने दो सीटों से चुनाव लड़ने का फैसला लिया है। वे हर हाल में विधानसभा पहुंचना चाहते हैं। इसलिए कोई जोखिम नहीं लेना चाहते। 2014 में वे भाजपा के अर्जुन मुंडा का हस्र देख चुके हैं। मुख्यमंत्री पद के दावेदार अर्जुन मुंडा चुनाव हार जाने से मुख्यमंत्री नहीं बन पाये थे और ताज रघुवर दास के माथे पर सज गया था। 2014 में भी हेमंत ने दो सीटों से चुनाव लड़ा था। अगर बरहेट सीट से खड़े नहीं हुए होते तो उनका विधायक बनना भी मुश्किल था। दुमका सीट वे भाजपा की लुईस मरांडी से हार गये थे। हेमंत इस बार भी दुमका और बरहेट से चुनाव लड़ रहे हैं। बरहेट से वे 29 नवम्बर को और दुमका से 2 दिसम्बर को नामांकन करेंगे। दुमका शिबू सोरेन का गढ़ रहा है। इसके बाद भी हेमंत 2014 में यहां चुनाव हार गये थे। माना जा रहा था कि हेमंत इस बार दुमका सीट छोड़ देंगे और सिर्फ बरहेट से लड़ेंगे। लेकिन जीत पक्की करने के लिए उन्होंने दोनों जगह से चुनाव लड़ने का निर्णय लिया। दुमका से भाजपा उम्मीदवार लुईस मरांडी ने हेमंत के इस डर पर तंज भी कसा है।

बाबूलाल मरांडी
बाबूलाल मरांडी झारखंड के पहले मुख्यमंत्री हैं। उनका जनाधार भी है। लेकिन उनकी चुनावी किस्मत चढ़ाव उतार वाली रही है। 2014 में उनके दल झारखंड विकास मोर्चा के 8 विधायक जीते थे लेकिन वो खुद चुनाव हार गये थे। हैरानी बात ये थी कि उन्होंने दो जगहों से चुनाव लड़ा था और दोनों जगहों पर हार गये थे। धनवार सीट पर बाबूलाल को भाकपा माले के राज कुमार यादव ने करीब 11 हजार वोटों से हरा दिया था। गिरिडीह सीट पर बाबूलाल को करारी हार का सामना करना पड़ा था। वे तीसरे स्थान पर जा फिसले थे। इस सीट भाजपा के निर्भय शहाबादी ने झामुमो के सुदिव्य कुमार को हराया था। 2019 में बाबूलाल फिर धनवार सीट से खड़े हुए हैं। उन्होंने नामाकंन भी कर दिया है। धनवार विधानसभा क्षेत्र में ही मरांडी का पैतृक घर है। इस लिए उन्होंने इस सीट पर विश्वास बनाये रखा है। चर्चा है कि बाबूलाल इस बार भी दो सीटों पर चुनाव लड़ेंगे। उनकी दूसरी सीट जामा हो सकती है। 2014 के चुनाव में जामा से शिबू सोरेन की बहू सीता सोरेन जीती थीं। सीता सोरेन शिबू सोरेन के बड़े पुत्र (दिवंगत) दुर्गा सोरेन की पत्नी हैं। 2014 के चुनाव में भले मरांडी हार गये थे लेकिन 2019 में उन्हें भरोसा है कि जनता उन्हें समर्थन देगी तभी वे सभी सीटों पर चुनाव लड़ रहे हैं। मरांडी ने किसी दल से गठबंधन नहीं किया है। अगर पिछले स्कोर 8 को भी छू दिया तो 2019 में उनकी अहम स्थिति होगी।

सुदेश महतो
सुदेश महतो ऑल झारखंड स्टूडेंट्स यूनियन यानी आजसू के अध्यक्ष हैं। 2014 में 5 सीटें जीत कर उनकी पार्टी रघुवर सरकार में साझीदार थी लेकिन सुदेश खुद सिल्ली से चुनाव हार गये थे। वे किंगमेकर तो बने लेकिन निजी तौर पर सत्ता का स्वाद नहीं ले सके। 2018 में जब सिल्ली में उपचुनाव हुआ तो सुदेश फिर हार गये। दो चुनावी हार से सुदेश महतो की राजनीति साख को बहुत झटका लगा। इस बार उन्होंने पार्टी में नयी जान फूंकने के लिए भाजपा से राह जुदा कर ली। 2019 का विधानसभा चुनाव वे भाजपा के खिलाफ लड़ रहे हैं। उन्होंने सिल्ली से फिर नामांकन किया है। चर्चा थी कि सुदेश इस बार दो सीटों से चुनाव लड़ेंगे। लेकिन अब ये साफ हो गया है कि वे केवल एक सीट सिल्ली से ही चुनाव मैदान में हैं। पहले कहा जा रहा था कि सुदेश रामगढ़, ईचागढ़ या टुंडी में से भी किसी एक सीट पर किस्मत आजमा सकते हैं। लेकिन इन सीटों पर आजसू ने उम्मीदवारों की घोषणा कर दी है। इसलिए अब उनके दो सीट पर लड़ने की संभावना खत्म हो गयी है। सिल्ली से सुदेश महतो 3 बार विधायक रहे हैं। उन्होंने पहली बार यहां 2000 में जीत हासिल की थी। वे 26 साल की उम्र में ही विधायक बन गये थे। फिर ने 2005 और 2009 में लगातार जीते। वे झारखंड के गृह मंत्री और उपमुख्यमंत्री भी रहे। 2014 में उनकी हार काफी चौंकाने वाली थी। 2019 में सुदेश महतो का मुकाबला फिर झामुमो की सीमा महतो से हैं। सीमा महतो 2018 में सुदेश को हरा चुकी हैं। लेकिन सुदेश को इस बार खुद पर भरोसा है इस लिए उन्होंने केवल सिल्ली से ही चुनाव लड़ने का फैसला लिया है।
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