झारखंड विधानसभा चुनाव : संथाल परगना की 7 सीटों पर कभी नहीं खिल पाया कमल
नई दिल्ली। संथाल परगना में सात ऐसी सीटें हैं जिन पर भाजपा, झारखंड विधानसभा चुनाव में आज तक जीत नहीं पायी है। ये सीटें हैं बरहेट, लिट्टीपाड़ा, पाकुड़, महेशपुर, शिकारीपाड़ा, जरमुंडी और सारठ। इन सीटों पर भाजपा की उम्मीदें पिछले तीन चुनाव से दम तोड़ती रहीं है। बरहेट इसमें सबसे हॉट सीट है। इस सीट पर पिछले चुनाव में हेमंत सोरेन जीत थे। लेकिन इस बार प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने भाजपा की संभावनाओं में जान फूंकने के लिए भरपूर मेहनत की है। बरहेट में नरेन्द्र मोदी ने खास तौर पर सभा की। उन्होंने इस सीट पर कमल खिलाने के लिए वोटरों से अपने अंदाज में अपील की। मोदी की सभा में जो भीड़ जुड़ी उससे भाजपा के खेमे में बहुत उत्साह है। संथाल परगना में इस बार भाजपा से अधिक मोदी के नाम पर गोलबंदी हो रही है। वोट भी मोदी के नाम पर ही पड़ेंगे। इन चुनाव क्षेत्रों में रघुवर सरकार के खिलाफ उठने वाले मुद्दे गौण पड़ गये हैं। इसलिए माना जा रहा है कि 2019 में भाजपा, झामुमो को चौंका सकती है।

नरेन्द्र मोदी के भरोसे भाजपा
संथाल परगना में विधानसभा की 18 सीटें हैं। इनमें मधुपुर और देवघर में चुनाव हो चुका है। बाकी 16 सीटों पर 20 दिसम्बर को चुनाव है। संथाल परगना में भाजपा का सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन 2005 और 2014 में रहा है जब उसने 7-7 सीटें जीती थीं। यानी भाजपा कभी इस क्षेत्र में दो अंकों में नहीं पहुंच पायी। जब कि झारखंड मुक्ति मोर्चा ने 2009 के चुनाव में 10 सीटें जीत कर भाजपा को बहुत पीछे छोड़ दिया था। अभी (2014) 7-6 के स्कोर से भाजपा आगे तो है लेकिन उसे मालूम है कि चुनौतियां कितनी कठिन हैं। ऐसे में भाजपा की कमान नरेन्द्र मोदी को संभालनी पड़ी। रणनीति यह बनी कि अगर महागठबंधन के सीएम पद के प्रत्याशी हेमंत सोरेन को ही दुमका और बरहेट के अखाड़े में चित कर दिया जाए तो विपक्ष अपने आप मात खा जाएगा। इस लिए भाजपा ने अपनी सारी ताकत हेमंत के खिलाफ लगा दी। मोदी उनके खिलाफ खूब गरजे। मोदी ने दुमका के बाद बरहेट में सभा की। आदिवासी बहुल बरहेट में मोदी को देखने और सुनने के लिए अच्छी भीड़ जमा हुई। अगर ये भीड़ वोट में तब्दील हुई तो फिर कमाल हो सकता है। वैसे बरहेट में कभी भाजपा जीत नहीं पायी है। 2005 के पहले झारखंड विधानसभा चुनाव में इस सीट पर झामुमो के थॉमस सोरेन जीते थे। 2009 में झामुमो के हेमलाल मुर्मू जीते। 2014 में बरहेट ने ही हेमंत सोरेन की इज्जत बजायी थी। यानी बरहेट झामुमो की सबसे मजबूत सीट है। इस सीट पर मोदी अगर भाजपा के लिए कोई करिश्मा कर देते हैं तो ये झारखंड चुनाव का सबसे बड़ा उलटफेर होगा।

लिट्टीपाड़ा सीट पर 40 साल तक पति-पत्नी का कब्जा
पाकुड़ जिले का लिट्टीपाड़ा विधानसभा क्षेत्र भी झामुमो का अभेद्य दुर्ग है। इस सीट पर झामुमो का 1977 से ही कब्जा है। साइमन मरांडी ने 1977, 1980, 1985 और उनकी पत्नी सुशीला हंसदा ने 1990, 1995, 2000 और 2005 में यहां से चुनाव जीता था। 2009 और 2017 के उपचुनाव में साइमन मरांडी ने फिर जीत हासिल की। यानी लिट्टीपाड़ा सीट पर पति और पत्नी का 40 साल तक कब्जा रहा। 2014 के चुनाव में इस सीट पर झामुमो के अनिल मुर्मू जीते थे। लेकिन उनके निधन के कारण यहां 2017 में उपचुनाव कराना पड़ा था। 2014 में बेटे को टिकट नहीं मिलने पर साइमन मरांडी ने झामुमो से विद्रोह कर दिया था और भाजपा में चले गये थे। उन्होंने 2014 का चुनाव भाजपा के टिकट पर लड़ा था लेकिन हार गये थे। ये साइमन के जीवन की पहली हार थी। 2017 में जब उपचुनाव हुआ तो साइमन फिर झामुमो का उम्मीदवार बन गये। उन्होंने जीत हासिल कर यहां झामुमो का कब्जा बरकरार रखा। हालांकि साइमन मरांडी ने 1977 का पहला चुनाव निर्दलीय लड़ कर जीता था। फिर वे झामुमो में शामिल हो गये थे। गौर करने की बात है कि साइमन मरांडी जैसे ताकतवर नेता भी लिट्टीपाड़ा में भाजपा को जीत दिलाने में नाकाम रहे थे। इस बार झामुमो ने साइमन मरांडी के पुत्र दिनेश मरांडी को मैदान में उतारा है। उनका मुकाबला भाजपा के दानियल किस्कू से है। अब देखना है कि नरेन्द्र मोदी इस सीट पर कितना असर डाल पाते हैं।

पाकुड़, महेशपुर, शिकारीपाड़ा, जरमुंडी, सारठ भी मुश्किल
पाकुड़ सीट पर 1990 और 1995 में भाजपा के बेनी प्रसाद गुप्ता जीते थे। इसके बाद भाजपा को यहां फिर कभी जीत नहीं मिली। 2000 के चुनाव में कांग्रेस के आलमगीर आलाम ने बेनी प्रसाद को हरा दिया था। इसके बाद अलमगीर आलाम ने 2005 और 2014 में यहां से चुनाव जीता। 2009 में झामुमो के अकील अख्तर यहां से जीते थे। महेशपुर में पिछले तीन चुनावों से भाजपा को जीत नहीं मिली है। 2005 में झामुमो के सुफल मरांडी, 2009 में झाविमो के मिस्त्री सोरेन और 2014 में झामुमो के स्टीफन मरांडी यहां से जीते थे। शिकारीपाड़ा सीट पर झामुमो के नलिन सोरेन लगातार छह बार चुनाव जीत चुके हैं। वे 38 साल से यहां के विधायक हैं। 2019 में वे झामुमो के सबसे मजबूत उम्मीदवारों में एक हैं। वे लगातार सातवीं जीत की तलाश में हैं। जरमुंडी में 2005 और 2009 में निर्दलीय हरिनारायण राय जीते थे। 2014 में कांग्रेस के बादल पत्रलेख को जीत मिली थी। सारठ में भाजपा को पिछले तीन चुनावों में जीत नहीं मिली थी। लेकिन 2014 में झाविमो से जीते रणधीर सिंह के भाजपा में चले आने की वजह से परोक्ष रूप से यहां कमल खिल गया। 2019 में रणधीर पर भाजपा के लिए खाता खोलने की बड़ी जिम्मेवारी है।
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