Jharkhand Last phase : झामुमो ने भूमि अधिकार कानून तो भाजपा ने NRC पर खेला चुनावी दांव

नई दिल्ली। संथाल परगना अभी झारखंड की चुनावी राजनीति का केन्द्र बन गया है। विधानसभा चुनाव के अंतिम चरण में यहां 16 सीटों पर 20 दिसम्बर को चुनाव है। संथाल परगना झारखंड की एक कमिश्नरी है जिसका मुख्यालय दुमका में है। इसमें छह जिले हैं- दुमका, गोड्डा, साहेबगंज, देवघर, जामताड़ा और पाकुड़। छोटानागपुर और कोल्हान क्षेत्र की तुलना में संथाल परगना के चुनावी मुद्दे कुछ अलग हैं। संथाल परगना अमर शहीद सिद्धो-कानो की भूमि है। 1855 में दोनों भाइयों ने अंग्रेजी राज के खिलाफ विद्रोह कर आदिवासियों की आजादी की मशाल जलायी थी। चुनावी मौसम में राजनीतिक दल यहां अलग-अलग मुद्दों के साथ मैदान में उतरे हैं। झामुमो ने भूमिहीन आदिवासियों के लिए भूमि अधिकार कानून बनाने का वायदा किया है। तो दूसरी तरफ भाजपा ने आदिवासी हितों की सुरक्षा के लिए नेशनल रजिस्टर फॉर सिटिजंस को मुद्दा बनाया है। संथाल परगना के दुमका, गोड्डा, पाकुड़, साहिबगंज, राजमहल जैसे शहरों में भूमि अधिकार कानून और एनआरसी से जुड़े बड़े-बड़े होर्डिंग्स इन मुद्दों के गवाह हैं।

एनआरसी को भुना रही भाजपा

एनआरसी को भुना रही भाजपा

संथाल परगना में बांग्लादेशी घुसपैठियों की समस्या एक बड़ा मुद्दा रहा है। 1970-71 में झारखंड के साहेबगंज और पाकुड़ समेत छह विधानसभा क्षेत्रों में बांग्लादेशियों के घुसपैठ की शिकायत मिलने लगी थी। 1980-81 में घुसपैठियों के खिलाफ आवाजें उठनी शुरू हो गयीं थीं। बाहरी लोगों के आने से आदिवासियों को सांस्कृतिक और आर्थिक रूप से नुकसान होने लगा। 1993 में साहेबगंज के तत्कालीन डिप्टी कमिश्नर डॉ. सुभाष शर्मा ने वोटर लिस्ट का पुनरीक्षण कराया था। इस पुनरीक्षण में ये बात सामने आयी थी कि साहेबगंज जिले के कई प्रखंडों में बांग्लादेशी घुसपैठिये आ कर बस गये हैं। डीसी ने इस मामले की जांच का आदेश दिया तो बिहार विधानसभा में हंगामा मच गया था। तब झारखंड बिहार का ही हिस्सा था। उस समय बिहार में लालू यादव का शासन था। राजनीतिक कारणों से ये मामला तब ठंडे बस्ते में डाल दिया गया था। 1994 में पटना हाईकोर्ट ने पाकुड़ के तत्कालीन डीएसपी और थाना प्रभारी को घुसपैठियों की मदद का दोषी करार दे कर जेल भेजने का आदेश दिया था। आरोपों के मुताबिक पश्चिम बंगाल की सीमा से सटे पाकुड़, साहेबगंज, जामताड़ा और गोड्डा में जिले में आज भी घुसपैठ हो रही है। 2019 के विधानसभा चुनाव में भाजपा आदिवासियों को भरोसा दिला रही है कि अगर उसकी सरकार बनी तो झारखंड में एनआरसी लागू कर घुसपैठियों को बाहर खदेड़गी।

भूमि अधिकार कानून

भूमि अधिकार कानून

झामुमो ने संथाल परगना के आदिवासियों को लुभाने के लिए सभी भूमिहीनों को जमीन देने का वायदा किया है। उसने अपने घोषणा पत्र में भूमि अधिकार कानून बनाने का जिक्र किया है। इस कानून के बनने के बाद सभी स्थानीय भूमिहानों को सरकार जमीन मुहैया कराएगी। इससे उनको स्थानीयत का पुख्ता प्रमाण मिल जाएगा। रघुवर सरकार की मौजूदा स्थानीय नीति को बदल कर आदिवासियों के हितों के अनुरूप बनायी जाएगी ताकि इसका लाभ वास्तविक लोगों को मिल सके। झारखंड में सभी आदिवासियों के पास अपनी जमीन नहीं है। वे वर्षों से जंगलों में रहते रहे हैं और उनके पास कोई खतियान नहीं है। झामुमो आदिवासियों के लिए जल, जंगल, जमीन की लड़ाई लड़ता रहा है। महागठबंधन के सीएम पद के उम्मीदावर हेमंत सोरेन ने वायदा किया है कि हम झारखंड में किसी आदिवासी को भूमिहान नहीं रहने देंगे।

 संथाल में कम मतों से जीत-हार तय

संथाल में कम मतों से जीत-हार तय

संथाल परगना में हमेशा भाजपा और झामुमो के बीच कांटे की टक्कर होती रही है। यहां बहुत कम मतों से ही जीत-हार तय होती है। 2014 के चुनाव में भाजपा ने राजमहल में 702 और बोरियो में 712 वोटों के अंतर से चुनाव जीता था। इसी तरह शिबू सोरेन की बहू और हेमंत सोरेन की भाभी सीता सोरेन ने जामा सीट पर 2 हजार 203 मतों से जीत हासिल की थी। दुमका में भाजपा, जरमुंडी में कांग्रेस और महेशपुर में झामुमो की जीत का दायरा साढ़े पांच हजार वोटों से भी कम था। इसलिए यहां मैदान मारने के लिए राजनीतिक दलों को जी तोड़ मेहनत करनी पड़ रही है। यहां कोई उम्मीदवार सेफ या सुरक्षित नहीं है। जब शिबू सोरेन और हेमंत सोरेन जैसे दिग्गज चुनाव हार सकते हैं तो फिर कोई दूसरा नेता अपनी जीत का दावा नहीं कर सकता। यहां कोई हार सकता है और कोई जीत सकता है।

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