मस्जिद में 'जय श्री राम' नारे पर बढ़ा विवाद! SC ने कर्नाटक HC से पूछा- अपराध क्यों माना जाए?
Jay Shri Ram Controversy: मस्जिद परिसर में 'जय श्री राम' का नारा लगाने के मामले में सुप्रीम कोर्ट ने कर्नाटक हाईकोर्ट के आदेश पर सवाल उठाते हुए राज्य सरकार से जवाब मांगा है। जस्टिस पंकज मित्तल और संदीप मेहता की पीठ पूछा कि अगर कोई 'जय श्री राम' का नारा लगाता है, तो इससे किसी की धार्मिक भावनाएं कैसे आहत होंगी?
परिसर में 'जय श्री राम' का नारा लगाने के आरोप में दर्ज एफआईआर को रद्द कर दिया गया था। यह मामला तब सामने आया, जब शिकायतकर्ता हैदर अली सीएम ने हाईकोर्ट के आदेश के खिलाफ विशेष अनुमति याचिका दायर की।

क्या है पूरा मामला?
घटना 25 सितंबर 2023 की है, जब कर्नाटक के दक्षिण कन्नड़ जिले के कडाबा पुलिस स्टेशन में एक शिकायत दर्ज हुई। आरोप था कि दो लोग, कीर्तन कुमार और सचिन कुमार एनएम, ने मस्जिद के अंदर जाकर 'जय श्री राम' के नारे लगाए। शिकायतकर्ता का कहना था कि यह कार्रवाई धार्मिक भावनाओं को आहत करने और सांप्रदायिक सौहार्द को बिगाड़ने के उद्देश्य से की गई थी।
क्या था हाईकोर्ट का फैसला ?
कर्नाटक हाईकोर्ट ने 13 सितंबर 2024 को एफआईआर रद्द करते हुए, कहा कि यह समझ से परे है कि अगर कोई 'जय श्री राम' का नारा लगाता है, तो इससे किसी की धार्मिक भावनाएं कैसे आहत होंगी? कोर्ट ने यह भी कहा कि हिंदू और मुस्लिम समुदाय क्षेत्र में सद्भाव के साथ रहते हैं।
शिकायतकर्ता की आपत्ति
याचिकाकर्ता का तर्क है कि हाईकोर्ट ने जांच को रोककर वैध अभियोजन को बाधित किया है। उन्होंने कहा कि इस घटना की गंभीरता को देखते हुए जांच पूरी होनी चाहिए ताकि सच सामने आ सके।
सुप्रीम कोर्ट की प्रतिक्रिया
अदालत की टिप्पणी
न्यायमूर्ति पंकज मिथल और न्यायमूर्ति संदीप मेहता की बेंच ने पूछा कि क्या मस्जिद के अंदर 'जय श्री राम' का नारा लगाना अपराध है? क्या यह आईपीसी की धारा 153A के तहत आता है? कोर्ट ने कहा कि हाईकोर्ट का आदेश कहता है कि यह अपराध के तत्वों को नहीं छूता है।
राज्य सरकार से जवाब
सुप्रीम कोर्ट ने कर्नाटक पुलिस और राज्य सरकार से मामले पर जवाब मांगा है। कोर्ट ने वरिष्ठ वकील देवदत्त कामत को निर्देश दिया कि याचिका राज्य सरकार के वकील को सौंपें।
सुनवाई का समय
सुप्रीम कोर्ट ने मामले की अगली सुनवाई जनवरी 2025 में तय की है।
कानूनी तर्क और धाराएं ?
आईपीसी की धारा 153A
- यह धारा धार्मिक भावनाएं भड़काने और सांप्रदायिक सौहार्द को बिगाड़ने के प्रयासों को अपराध मानती है।
- शिकायतकर्ता का कहना है कि यह घटना इस धारा के तहत अपराध है।
जांच की जरूरत
- याचिका में तर्क दिया गया कि हाईकोर्ट ने बिना पूरी जांच के एफआईआर रद्द कर दी।
- उन्होंने कहा कि मामले की फॉरेंसिक और सीसीटीवी जांच से सच्चाई सामने आ सकती है।
शिकायतकर्ता का तर्क
- घटना मस्जिद परिसर में हुई थी, जो धार्मिक स्थल है।
- याचिकाकर्ता का कहना है कि इससे मुस्लिम समुदाय की धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुंची और सांप्रदायिक तनाव का खतरा बढ़ गया।
- उन्होंने यह भी कहा कि यह मामला उन दुर्लभतम मामलों में से नहीं है, जहां अभियोजन को शुरुआती स्तर पर ही रद्द किया जाए।
एक्सपर्ट्स की राय
- इस मामले में कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि सुप्रीम कोर्ट का निर्णय धार्मिक स्थलों पर नारे लगाने के कानूनी और सामाजिक प्रभाव को स्पष्ट कर सकता है।
- यह मामला धारा 153A के दायरे और धार्मिक स्वतंत्रता की सीमाओं को परिभाषित करने में महत्वपूर्ण साबित हो सकता है।
क्या है आगे की प्रक्रिया ?
- राज्य सरकार का जवाब: कर्नाटक सरकार को इस मामले में अपना पक्ष रखने का निर्देश दिया गया है।
- जनवरी 2025 में सुनवाई : सुप्रीम कोर्ट इस मामले की विस्तृत सुनवाई अगले साल करेगी।
- जांच का भविष्य: अगर कोर्ट ने जांच की अनुमति दी, तो कर्नाटक पुलिस मामले को फिर से जांच के लिए खोल सकती है।
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