जगदीप धनखड़ सरकारी बंगला छोड़ अब इस नेता के घर पर हुए शिफ्ट, जानिए 40 साल पुराने रिश्ते की पूरी कहानी
Jagdeep Dhankhar News: पूर्व उपराष्ट्रपति जगदीप धनखड़ इस्तीफे के बाद से सार्वजनिक जगह से दूरी बनाए हुए हैं। ऐसे में उनको लेकर बड़ी खबर आई है। जगदीप धनखड़ अपना सरकारी बंगला छोड़कर दिल्ली के छतरपुर एन्क्लेव स्थित इंडियन नेशनल लोकदल (इनेलो) प्रमुख अभय सिंह चौटाला के फार्महाउस में शिफ्ट हो गए हैं। वो फार्महाउस में सोमवार (01 सितंबर) को शिफ्ट हुए हैं।
जगदीप धनखड़ का अभय सिंह चौटाला के फार्महाउस में शिफ्ट होना, कोई हैरानी की बात नहीं है क्योंकि धनखड़ और चौटाला परिवार का रिश्ता कोई नया नहीं है, बल्कि लगभग 40 साल पुराना और बेहद गहरा है। जगदीप धनखड़ चौटाला के फार्महाउस में तब तक रहेंगे, जब तक उनको अधिकारिक सरकारी बंगला मिल नहीं जाता।

🔴 जगदीप धनखड़ और चौटाला परिवार का रिश्ता
जगदीप धनखड़ और चौटालाओं की नजदीकी की कहानी 1989 से शुरू होती है। उस समय हरियाणा के सबसे बड़े जाट नेता और तत्कालीन मुख्यमंत्री चौधरी देवीलाल ने राजस्थान के इस युवा वकील में राजनीति का भविष्य देखा। धनखड़, जो खुद भी जाट समुदाय से आते हैं, हमेशा देवीलाल को अपना "गुरु" और "मार्गदर्शक" मानते रहे।
धनखड़ ने देवीलाल का ध्यान उस समय खींचा जब उन्होंने 25 सितंबर 1989 को दिल्ली के बोट क्लब पर देवीलाल के जन्मदिन पर आयोजित विपक्षी रैली के लिए राजस्थान से 500 वाहन जुटाए। इस रैली ने राजीव गांधी सरकार के खिलाफ विपक्ष की एकता को मजबूती दी और विपक्ष को बड़ा बल मिला।
🔴 राजनीति में पहली बड़ी एंट्री
1989 के लोकसभा चुनाव में विपक्षी गठबंधन ने जनता दल के बैनर तले चुनाव लड़ा। देवीलाल ने धनखड़ को झुंझुनूं सीट से टिकट दिया और उनके लिए जमकर प्रचार भी किया। चुनाव जीतने के बाद जब देवीलाल उपप्रधानमंत्री बने, तो धनखड़ को भी केंद्रीय संसदीय कार्य राज्य मंत्री बनाया गया।
लेकिन जल्द ही वी.पी. सिंह और देवीलाल के बीच मतभेद हुए। 1990 में जब देवीलाल को मंत्रिमंडल से हटाया गया, तो धनखड़ इकलौते मंत्री थे जिन्होंने देवीलाल के समर्थन में इस्तीफ़ा दे दिया। बाद में जब चंद्रशेखर प्रधानमंत्री बने तो देवीलाल फिर से उपप्रधानमंत्री बने और धनखड़ भी दोबारा मंत्री पद पर लौटे।
🔴 कांग्रेस में एंट्री और राजस्थान की राजनीति
जनता दल के बिखराव के बाद धनखड़ ने कांग्रेस जॉइन की। 1991 में वे अजमेर से कांग्रेस प्रत्याशी बने, लेकिन चुनाव हार गए। हालांकि 1993 में उन्होंने राजस्थान की किशनगढ़ सीट से कांग्रेस विधायक बनकर राजनीति में वापसी की।
दिलचस्प बात यह रही कि उसी चुनाव में देवीलाल के पोते और अभय चौटाला के भाई अजय चौटाला ने भी राजस्थान की नोहर सीट से इनेलो के टिकट पर जीत हासिल की। यानी एक ही चुनाव में दोनों परिवारों की अगली पीढ़ी ने राजनीतिक सफर की शुरुआत की।
🔴 चौटाला परिवार से अटूट लगाव
धनखड़ का चौटाला परिवार से जुड़ाव सिर्फ राजनीति तक सीमित नहीं रहा। जब 21 दिसंबर 2024 को इनेलो प्रमुख और देवीलाल के बेटे ओमप्रकाश चौटाला का निधन हुआ, तो धनखड़ सबसे पहले अंतिम संस्कार में पहुंचने वालों में शामिल थे। उन्होंने कहा था- "चौटाला साहब किसानों और गांवों के विकास को हमेशा प्राथमिकता देते थे। उनका जाना मेरे लिए व्यक्तिगत क्षति है।"
मार्च 2025 में एक कार्यक्रम में धनखड़ ने याद किया कि कैसे देवीलाल ने उन्हें 'प्लीडर' से 'लीडर' बनने की राह दिखाई और राजनीति में कदम रखने के लिए प्रेरित किया।
🔴 उपराष्ट्रपति पद से इस्तीफा और विवाद
21 जुलाई 2025 को संसद के मानसून सत्र के पहले दिन अचानक जगदीप धनखड़ ने उपराष्ट्रपति पद से इस्तीफ़ा दे दिया। अभय चौटाला ने इसे "षड्यंत्र" बताया और आरोप लगाया कि मोदी-शाह की जोड़ी ने उन्हें मजबूरन इस्तीफा दिलवाया।
अभय ने एक्स (पूर्व ट्विटर) पर लिखा-"बीजेपी किसान हितों की बात करने वाले नेता को बर्दाश्त नहीं कर सकती। धनखड़ जी ने स्वेच्छा से इस्तीफा नहीं दिया, बल्कि उन्हें इस्तीफ़ा देने के लिए मजबूर किया गया।"
🔴 परिवार जैसा रिश्ता
अभय चौटाला का कहना है कि धनखड़ उनके परिवार का हिस्सा हैं। उन्होंने कहा, "हम बचपन से ही धनखड़ जी के संपर्क में रहे हैं। दुख-सुख में उन्होंने हमेशा परिवार का साथ दिया है। उपराष्ट्रपति बनने के बाद भी हमारा रिश्ता वैसा ही बना रहा।"
देवीलाल के बेटे रणजीत सिंह, जो अभय चौटाला से अलग हो चुके हैं और हरियाणा की खट्टर सरकार में मंत्री भी रहे, वे भी धनखड़ को "परिवार का सदस्य" मानते हैं।
यही वजह है कि जब धनखड़ को अपने आधिकारिक आवास का इंतजार करना पड़ा, तो उन्होंने दिल्ली में कहीं और ठहरने के बजाय चौटाला परिवार के फार्महाउस को चुना। यह सिर्फ एक निवास स्थान नहीं, बल्कि चार दशकों के रिश्ते और विश्वास की मिसाल है।












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