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ISRO: 'डॉकिंग' के लिए तैयार भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान, जानिए भविष्य के मिशन पर इसका क्या होगा प्रभाव

ISRO: भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (ISRO) आने वाले दिनों में पहली बार दो छोटे सैटेलाइट्स को अंतरिक्ष में करीब लाकर जोड़ने (डॉकिंग) का प्रदर्शन करेगा। यदि यह सफल होता है, तो भारत अमेरिका, रूस और चीन के बाद यह क्षमता हासिल करने वाला चौथा देश बन जाएगा।

ISRO ने 12 जनवरी को "चेज़र" और "टारगेट" सैटेलाइट्स को तीन मीटर तक करीब लाने का परीक्षण किया। इसके बाद दोनों को सुरक्षित दूरी पर वापस ले जाया गया। यह प्रयोग 7 जनवरी और फिर 9 जनवरी को करना था, लेकिन तकनीकी कारणों से इसे टाल दिया गया।

ISRO

दोनों 220 किलोग्राम के सैटेलाइट्स को 30 दिसंबर को श्रीहरिकोटा से लॉन्च किया गया था। इन्हें 450 किमी की कक्षा में डालकर डॉकिंग की तैयारी की गई।
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डॉकिंग क्या है और यह क्यों जरूरी है?

डॉकिंग वह प्रक्रिया है, जिसमें दो तेज गति से चल रहे अंतरिक्ष यानों को एक ही कक्षा में लाकर आपस में जोड़ा जाता है। यह तकनीक बड़े अंतरिक्ष यानों और स्पेस स्टेशन बनाने में मदद करती है। डॉकिंग का इस्तेमाल भविष्य में स्पेस स्टेशन बनाने, अंतरिक्ष यात्रियों और जरूरी सामान को वहां पहुंचाने और चंद्रमा से सैंपल वापस लाने के लिए किया जाएगा।

पहला स्पेस डॉकिंग कब हुआ था?

1966 में अमेरिका ने "जेमिनी VIII" मिशन के दौरान पहली बार "एजिना टारगेट व्हीकल" के साथ डॉकिंग की थी। इस मिशन में नील आर्मस्ट्रॉन्ग भी शामिल थे, जो बाद में 1969 में चंद्रमा पर कदम रखने वाले पहले इंसान बने।

भारत क्यों कर रहा है यह मिशन?

2035 तक भारत का अपना स्पेस स्टेशन बनाने और 2040 तक चंद्रमा पर मानव मिशन भेजने का लक्ष्य है। इन उद्देश्यों को पूरा करने के लिए डॉकिंग तकनीक महत्वपूर्ण है। 2028 में ISRO "भारतीय अंतरिक्ष स्टेशन" का पहला मॉड्यूल लॉन्च करेगा। इसके अलावा, चंद्रयान-4 मिशन के दौरान भी यह तकनीक इस्तेमाल की जाएगी, जिसमें चंद्रमा से सैंपल लाकर पृथ्वी पर भेजे जाएंगे।

डॉकिंग मिशन के दौरान क्या होगा?

SpaDeX मिशन में "चेज़र" और "टारगेट" सैटेलाइट्स को धीरे-धीरे करीब लाया जाएगा। ये 5 किमी, 1.5 किमी, 500 मीटर, 225 मीटर, 15 मीटर और 3 मीटर की दूरी पर रुकेंगे। अंत में दोनों सैटेलाइट्स के रिंग्स जुड़ेंगे और लॉक हो जाएंगे।

इसके बाद, सैटेलाइट्स एक-दूसरे के साथ पावर और डेटा साझा करेंगे। मिशन के सफल होने पर सैटेलाइट्स को अलग कर दिया जाएगा और वे अगले दो वर्षों तक अंतरिक्ष में प्रयोग करेंगे।

भारत का डॉकिंग सिस्टम कैसा है?

ISRO का डॉकिंग सिस्टम "एंड्रोजिनस" है, यानी दोनों सैटेलाइट्स पर एक जैसे सिस्टम लगे हैं। यह सिस्टम कम मोटर (2) का इस्तेमाल करता है, जबकि अंतरराष्ट्रीय मानक में 24 मोटर लगती हैं। इसके अलावा, नए सेंसर और प्रोसेसर लगाए गए हैं, जैसे लेजर रेंज फाइंडर, रेंडेज़वस सेंसर और प्रोximity सेंसर। ये सैटेलाइट्स को एकदम सटीक तरीके से करीब लाने में मदद करेंगे। ISRO का यह मिशन भविष्य के मानव अंतरिक्ष अभियानों और स्पेस स्टेशन बनाने के लिए एक महत्वपूर्ण कदम साबित होगा।
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