क्या राहुल गांधी की अगुवाई में लगातार कमजोर हो रही है कांग्रेस?
पांच राज्यों में हुए विधानसभा चुनावों के नतीजे आने के साथ ही इस बात पर सुगबुगाहट भी शुरु हो गई है कि क्या कांग्रेस को अपने उपाध्यक्ष राहुल गांधी के अलावा अन्य नेताओं को भी आगे लाना चाहिए।
नई दिल्ली। पांच राज्यों में हुए विधानसभा चुनावों के नतीजे आने के साथ ही इस बात पर सुगबुगाहट भी शुरु हो गई है कि क्या कांग्रेस को अपने उपाध्यक्ष राहुल गांधी के अलावा अन्य नेताओं को भी आगे लाना चाहिए।

वोटों को कांग्रेस के पक्ष में लामबंद नहीं कर पा रहे राहुल गांधी
एक तरफ यूपी और उत्तराखंड में हार के लिए विपक्षी राहुल गांधी को जिम्मेदार ठहरा रहे हैं तो वहीं दूसरी तरफ कांग्रेसी पंजाब, गोवा और मणिपुर में पार्टी के प्रदर्शन के आधार पर राहुल गांधी का बचाव कर रहे हैं। पर पांच राज्यों के चुनावों में भाजपा की दो राज्यों में हुई महत्वपूर्ण जीत कांग्रेस को आत्मचिंतन करने पर जरूर मजबूर करेगी कि आखिर राहुल गांधी जोश और होश में होने के बावजूद मतदाताओं को कांग्रेस के पक्ष में वोट करने के लिए लामबंद क्यों नहीं कर पा रहे हैं।
चुनावों में मिलती हार
पश्चिम बंगाल, केरल, तमिलनाडु, उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, दिल्ली, महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश, राजस्थान, छत्तीगढ़, असम, अरुणाचल प्रदेश जैसे राज्यों में कांग्रेस को लगातार हार मिलती रही है और कांग्रेस का वोट बैंक लगातार कम होता गया। पर इस बीच कांग्रेस की तरफ से खुलकर कभी भी राहुल गांधी ने इसकी जिम्मेदारी नहीं ली। साथ ही जब भी विपक्ष ने इस मुद्दे पर राहुल गांधी को घेरना चाहा तो कांग्रेस ने सामने आकर राहुल गांधी का बचाव किया। पर कांग्रेस पार्टी ने दूसरे युवा नेताओं को आगे आने का मौका भी नहीं दिया। ज्योर्तिआदित्य सिंधिया, सचिन पायलट, मिलिंद देवड़ा, प्रिया दत्त जैसे नेताओं को प्रयोग पूरी तरह से दरकिनार कर सिर्फ राहुल गांधी पर फोकस किया। विपक्ष को भी आसान निशाना मिल गया और उसने अपने तरीकों से राहुल गांधी की छवि को ऐसा कर दिया कि उनकी कही बातों का मजाक बनाने लगे।
कार्यकताओं को नए सिरे से न जोड़ पाना
कहते है कि जब अपने प्रतिद्वंदी से कोई सीखना बंद कर देता है तो उसके लिए आगे बढ़ने के रास्ते कम होते जाते हैं। यह बात इसलिए भी सामने आती है कि कांग्रेस के कमजोर होने के साथ-साथ उसका जमीनी कार्यकर्ता इन सब के बीच कहीं दूर हो गया है। भाजपा जहां अपने कार्यकताओं और स्वयंसेवकों के बल पर चुनाव लड़ती है तो वहीं कांग्रेस अपने हाई प्रोफाइल नेताओं के जरिए चुनाव जीतना चाहती है। इसका सबसे बड़ा घाटा यह हुआ कि जमीनी स्तर पर काम करने वाले लोग कांग्रेस से दूर होते गए और कांग्रेस ने फिर से उन्हें अपने साथ जोड़ने की पूरी कोशिश भी नहीं की। जो कभी कांग्रेस का कार्यकर्ता था वो बड़ी संख्या में आज भाजपा का कार्यकर्ता बन चुका है। लोकसभा चुनाव 2014 से लेकर विधानसभा चुनाव 2017 तक में कांग्रेस छोड़कर बीजेपी में आए नेता आज केंद्र सरकार में मंत्री से लेकर राज्यों में मंत्री के पदों पर बैठे हुए हैं। जो अप्रत्यक्ष रूप से कांग्रेस की हार को बताता है।
दिल्ली में ज्यादा समय बिताना बना कारण
राहुल गांधी भले ही कांग्रेस के उपाध्यक्ष बन गए हों, पर उन्होंने अपनी मुख्य विरोधी पार्टी बीजेपी से कुछ नहीं सीखा। भाजपा एक तरफ जहां संगठन से लेकर छोटे-छोटे स्वयं सेवक संगठनों के संग पार्टी को मजबूत बनाने काम कर रही है। तो वहीं राहुल गांधी चुनाव जीतने के लिए पॉलिटिकल मैनेजर पर ही निर्भर हो कर रह गए। ऐसे में खुद से कुछ नया सीखना और करना राहुल गांधी की तरफ से जनता को देखने को नहीं मिला। ऐसी चीजें लगातार कांग्रेस के खिलाफ जा रही है। पर कांग्रेस का आलाकमान इससे सीखने की कोशिश नहीं कर रहा है।
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