क्या कश्मीर में जवानों पर पत्थरबाजी के लिए जिम्मेदार हैं महबूबा मुफ्ती?
लगातार अपील के बाद भी कश्मीर में सेना और जवानों पर फेंके जा रहे हैं पत्थर। सेना के अधिकारियों का कहना राज्य सरकार की ओर से दोषियों पर कड़ी कार्रवाई करने की बजाय उन्हें माफ कर दिया जाता है।
श्रीनगर। इंडियन आर्मी के चीफ जनरल बिपिन रावत की ओर से कश्मीर के युवाओं से अपील की गई है कि वे आतंकवादियों को समर्थन देना बंद करें। किसी भी एनकाउंटर के समय युवाओं की भारी भीड़ सामने आती है और जवानें पर पत्थर फेंकने लगती है। अपील के बाद भी माहौल में कोई बदलाव नहीं हो रहा है। ऐसे में कहीं न कहीं शायद राज्य सरकार की लापरवाही भी सामने आती है।

सरकार की ओर से लापरवाही
सेना के अधिकारियों की मानें तो कानून व्यवस्था राज्य सरकार का विषय है। पत्थरबाजी करने वालों को राज्य सरकार माफ कर देती है और उनके खिलाफ कोई भी बड़ा कदम नहीं उठाया जाता है। ऐसे में इन युवाओं को और प्रोत्साहन मिलता है और फिर से सड़कों पर वापस आ जाते हैं। खास बात है कि आतंकियों के अंतिम संस्कार में भी लोगों की भीड़ आती है और उस पर भी कोई एक्शन नहीं लिया जाता है। उनका मानना है कि सरकार को इस तरह के तत्वों का समर्थन बंद करना चाहिए और सेना के साथ खड़े होना चाहिए। सेना में राज्य सरकार के रवैये को लेकर भी खासी नाराजगी है। स्थानीय लोगों में आतंकियों के अंतिम संस्कार में शामिल होने का ट्रेंड बंद होगा, फिलहाल तो ऐसा नहीं लगता है। घाटी में एक आर्मी ऑफिसर की मानें तो जब आतंकी स्थानीय होता है तो लोगों का हुजूम उमड़ने लगता है। इसमें कोई भी तर्क नहीं है लेकिन यह फिर भी जारी है। इससे भी ज्यादा ऑपरेशन के बीच में नागरिक एनकाउंटर वाली जगह पर इकट्ठा हो जाते हैं और फिर सुरक्षा बलों पर पथराव करने लगते हैं। पुलिस भी इन सबमें खुद को असहाय महूसस करती है। राज्य सरकार की ओर से पुलिस को भी कोई निर्देश नहीं दिए गए हैं कि कैसे इन युवाओं को रोकना है। कई बार तो इन युवाओं के खिलाफ भी कोई केस दर्ज नहीं होता है।
आतंकियों के अंतिम संस्कार में भीड़
इंडियन आर्मी स्थानीय नागरिकों को सरेंडर करने का एक चांस देती है। कई ऐसे मौकें आए हैं जब आतंकी सेना के चक्रव्यूह में फंस जाता है और सेना उसे सरेंडर करने का मौका देती है। जब वह सरेंडर करने से मना कर देता है तो फिर सेना उसके परिवार की मदद लेती है ताकि वह हथियारों को छोड़ दे। जब आतंकी मना करते हैं तो फिर सुरक्षाबलों के पास एनकाउंटर के अलावा दूसरा विकल्प नहीं होता है। बुरहान वानी की मौत कश्मीर में अशांति की वजह बनी थी और नौ जुलाई 2016 से यहां पर अशांति की शुरुआत हो गई थी। यहां से ही आतंकियों के अंतिम संस्कार में शामिल होने का चलन चल निकला। काकपोरा में पिछले वर्ष जब लश्कर-ए-तैयबा के आतंकवादी रईस अहमद डार को मारा गया तब भी लोगों की भीड़ इकट्ठा हो गई थी। इसके बाद यहां पर आजादी के नारे लगने लगे। इाके बाद लश्कर के ही अबु कासिम की मौत पर भी कुछ ऐसा ही नजारा था। इस व्यक्ति के सिर पर पर 20 लाख का इनाम था। कुलगाम के लोगों ने इसे एक हीरो का दर्जा दिया हुआ था। पढ़ें-पत्थरों की जगह अब पेट्रोल बम जवानों पर फेकेंगे कश्मीर के उपद्रवी












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