पुराने सहयोगियों को फिर साथ लाने की मुहिम में जुटी बीजेपी, क्या विपक्षी एकता से घबरा गई है?
विपक्षी एकता की बढ़ती कोशिशों के बीच बीजेपी ने भी एनडीए को मजबूत करने के लिए नए सिरे से कोशिशें शुरू की हैं। टीडीपी और शिरोमणि अकाली दल से नजदीकियां बढ़ रही हैं।

बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार करीब 20 विपक्षी दलों को एकजुट करने की कोशिशों में जुटे हुए हैं। उनका मुख्य एजेंडा 2024 के लोकसभा चुनाव में भाजपा खासकर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का चुनावी रास्ता रोकना है। संयोग से इसी दौरान भारतीय जनता पार्टी और उसके पुराने सहयोगियों के बीच भी फिर से निकटता बढ़ने लगी है
एनडीए के 25 साल पूरे होने वाले हैं
हाल ही में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने पार्टी नेताओं से कहा था कि वह एनडीए में शामिल सहयोगी दलों को भरोसा दिलाएं कि भाजपा अपने साथियों को पूरा मौका और सम्मान देती है। उन्होंने राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (एनडीए) के 25 साल पूरे होने पर भी कार्यक्रम आयोजित करने का सुझाव दे रखा है। भाजपा इसे गठबंधन की राजनीति की सफलता के तौर पर पेश करेगी।
2019 में चंद्रबाबू नायडू ने भाजपा विरोधी मुहिम चलाई थी
इन हालातों के बीच जिस तरह से केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह और भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष जेपी नड्डा ने आंध्र प्रदेश के पूर्व सीएम चंद्रबाबू नायडू से उनके घर जाकर मुलाकात की है, उसके कई सियासी मायने निकाले जा रहे हैं। क्योंकि नायडू ने पांच साल पहले 2019 के लोकसभा चुनाव में पीएम मोदी और बीजेपी के खिलाफ उससे भी धारदार मुहिम चलाई थी, जैसा कि अभी जेडीयू सुप्रीमो नीतीश चला रहे हैं। वह भी जेडीयू की तरह लंबे समय तक एनडीए में रहकर बाहर हुए थे।
भाजपा केंद्र में बंपर जीती, आंध्र में गायब हो गई टीडीपी
तब भाजपा केंद्र में तो बंपर जीत के साथ सत्ता में लौटी थी, लेकिन आंध्र में टीडीपी का पूरी तरह से बंटाधार हो गया था। बीजेपी भी आंध्र में सीन से पूरी तरह साफथी। लेकिन, बदले हालातों में टीडीपी और बीजेपी दोनों एक-दूसरे की जरूरत बनते नजर आ रहे हैं। जबकि, तब दोनों ही ओर से ऐसा लगा था कि बस अब और नहीं।
नए संसद भवन के उद्घाटन में शामिल हुए थे एसएडी-टीडीपी
वैसे टीडीपी की तरह ही शिरोमणि अकाली दल भी अभी एनडीए में नहीं है। लेकिन, दोनों ही दलों ने हाल ही में नए संसद भवन के उद्घाटन समारोह में शामिल होकर अपना दृष्टिकोण साफ कर दिया था। उन्होंने करीब 20 विपक्षी दलों के अभियान से खुद को दूर रखा। इसके अलावा दिल्ली पर जो मोदी सरकार अध्यादेश लाई है, उसे भी राज्यसभा से पास कराने के लिए बीजेपी को सहयोगियों के समर्थन की जरूरत है।
एनडीए को पहले की तरह सक्रिय करने की जरूरत
जहां तक अभी एनडीए की बात है तो वह ज्यादा औपचारिक ही नजर आता है। अलबत्ता, राष्ट्रपति चुनाव, उपराष्ट्रपति चुनाव और संसद सत्र के दौरान भाजपा ने अपने सहयोगी दलों के साथ जरूर तालमेल बनाए रखा है। लेकिन, अब चर्चा है कि बीजेपी को भी एनडीए को पहले की तरह ही ज्यादा सक्रिय करने की जरूरत महसूस हो रही है। ऐसे में नायडू से भाजपा के शीर्ष नेताओं की मुलाकात काफी मायने रखती है।
कृषि कानून के मसले पर अलग हुआ था अकाली दल
शिरोमणि अकाली दल कभी एनडीए का सबसे पुराना हिस्सा हुआ करता था। लेकिन, कृषि कानून के मुद्दे पर देर से ही सही, इसने सरकार और गठबंधन से अलग होने का फैसला किया। लेकिन, अब वह कानून ही नहीं है। लिहाजा एसएडी का फिर से भाजपा के साथ आने में कोई राजनीतिक अड़चन नहीं है।
अकाली दल से भी भाजपा की बढ़ रही हैं नजदीकियां
ज्यादा दिन नहीं हुए। एसएडी के दिग्गज नेता प्रकाश सिंह बादल को श्रद्धांजलि देने पीएम मोदी चंडीगड़ गए थे। बाद में शाह और नड्डा भी अलग-अलग मौकों पर उनके गांव जाकर उन्हें श्रद्धा-सुमन अर्पित कर आए। संकेत साफ है कि पंजाब की राजनीति के लिए दोनों को एक-दूसरे की आवश्यकता महसूस हो रही है। वैसे भी एसएडी ने पंजाब विधानसभा चुनाव में अपनी स्थिति का अंदाजा लगा लिया है।
तेलंगाना चुनाव के लिए टीडीपी से चर्चा?
कुछ राजनीतिक विश्लेषक मानते हैं कि टीडीपी और बीजेपी के बीच अभी जो खिचड़ी पक रही है, उसका लक्ष्य लोकसभा या आंध्र प्रदेश विधानसभा चुनाव से पहले तेलंगाना विधानसभा चुनाव है। क्योंकि, कर्नाटक में भाजपा करारी हार हारी है। तेलंगाना को लेकर उसे काफी उम्मीदें हैं। जानकारों को लगता है कि अगर टीडीपी-भाजपा में गठबंधन होता है तो हैदराबाद, रंगा रेड्डी जिले के अलावा खम्मम, वारंगल और महबूबनगर में सीमांध्र की आबादी का फायदा बीजेपी को मिल सकता है, जो टीडीपी समर्थक बताए जाते हैं।
लेकिन, कुछ एक्सपर्ट का यह भी मानना है कि टीडीपी के साथ गठबंधन का बीजेपी के प्रदर्शन पर तेलंगाना में विपरीत असर भी पड़ सकता है। वैसे तेलंगाना बीजेपी के अध्यक्ष बंदी संजय टीडीपी के साथ गठबंधन की चर्चाओं को सिर्फ अटकलबाजियां बता रहे हैं।
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