पाकिस्तान में कमर तोड़ महंगाईः 'अब बिरयानी की जगह चने-चावल पकाती हूं’
पाकिस्तान में महंगाई की शिकायत तो जनता ने हर सरकार के दौर में की है मगर पिछले कुछ महीनों के दौरान क्या ग़रीब और क्या मध्यम वर्ग, हर तबक़े का आदमी परेशान है.
ज़ाहिर तौर पर खाते-पीते परिवार भी महंगाई का रोना रोते हैं, लेकिन आम नौकरीपेशा नागरिकों के लिए यह एक बड़ी जंग है जो उन्हें हर दिन लड़नी पड़ रही है.
रावलपिंडी की रहने वाली ख़ालिदा ख़्वाजा कहती हैं कि महंगाई एक ऐसी सुरंग है जिसके आख़िरी सिरे पर कोई उजाला नहीं है. वो मध्यम वर्गीय परिवार से आती हैं और आजकल उनके लिए एकमात्र राहत की बात 'अपना मकान' और 'बच्चों की संपूर्ण शिक्षा' है.
वो कहती हैं कि अब जब वे अपने बच्चों की शादी करने के बारे में सोच रही हैं तो महंगाई ने कमर ही तोड़ दी है.
वो कहती हैं, "ऐसे में हम किसी और की शादी में जाने से पहले कई बार सोचते हैं, अपने घर में शादियां करना तो फ़िलहाल बहुत ही मुश्किल लग रहा है."
ख़ालिदा के घर का बजट जानने से पहले कुछ आंकड़े जान लेते हैं ताकि यह पता चले कि मंहगाई क्यों सबकी जान ले रही है.
सब्ज़ी, दूध, अंडे, खाने पीने की चीज़ें कितनी महंगी?
अगर पिछले साल से तुलना करें तो पाकिस्तान के सांख्यिकी विभाग के अनुसार, चालू वर्ष की जुलाई में महंगाई पिछले साल के हिसाब से लगभग 25 प्रतिशत बढ़ी है.
दाल की क़ीमत 35 से 92 प्रतिशत तक बढ़ गई है.
प्याज़ की क़ीमत लगभग 60 फ़ीसद तक जबकि गोश्त की क़ीमत 26 फ़ीसद बढ़ी है.
सब्ज़ियों के दाम 40 प्रतिशत और फलों के दाम 39 प्रतिशत बढ़े हैं.
दूध 25 प्रतिशत और अंडे व चायपत्ती 23 प्रतिशत महंगी हुई है.
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अन्य चीज़ें कितनी महंगी हुईं?
यह हाल तो खाने-पीने के सामान का है, अब एक नज़र अन्य वस्तुओं पर भी डाल लेते हैं.
नहाने-धोने के साबुन-पाउडर और यहां तक कि माचिस की डिबिया की क़ीमत भी 25 फ़ीसद बढ़ गई है.
कपड़ों की क़ीमत 18 प्रतिशत, जूतों की 19 प्रतिशत और प्लास्टिक के सामान की क़ीमत भी 19 फ़ीसद बढ़ी है.
पिछले साल के मुक़ाबले गाड़ियों के ईंधन के मूल्य में होश उड़ाने वाली वृद्धि हुई है जो लगभग 95 प्रतिशत है.
बिजली की दर 87 प्रतिशत बढ़ी है.
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'अब बिरयानी मसाला फ़ालतू ख़र्चा लगता है'
ख़ालिदा ख़्वाजा बताती हैं कि आज एक आम घर में बजट संभालना कितना मुश्किल है.
ख़ालिदा ख़्वाजा के चार बच्चे हैं जबकि घर में फ़िलहाल दो लोग रोज़गार में हैं. उनके पति छोटा-सा कारोबार करते हैं और उनके एक बेटे ने हाल ही में प्राइवेट सेक्टर में नौकरी शुरू की है.
जब हमने उनसे पूछा कि क्या महंगाई के साथ उनकी आमदनी भी बढ़ी है तो उनका कहना था, "औसत आमदनी वही है जो तीन साल पहले थी. ज़रूरतें भी वही हैं लेकिन महंगाई से ख़र्चा बेतहाशा बढ़ गया है. किराने की दुकान पर पांच हज़ार रुपये लेकर जाओ तो ढंग के दो थैले भी नहीं भरते और जेब पूरी खाली हो जाती है."
वो कहती हैं, "हर बार टोकरी में कुछ डालने से पहले यह सोचती हूं कि क्या इसके बग़ैर भी गुज़ारा हो सकता है. बस यही सोचते-सोचते आधी चीज़ें तो वैसे ही वापस रख देती हूं. पहले ज़रूरी चीज़ों के अलावा भी कुछ पसंद आ जाए तो रख लेती थी…अब तो बिरयानी मसाला भी नहीं ख़रीदती हूं क्योंकि लगता है कि यह भी फ़ालतू ख़र्चा है."
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'अब बिरयानी की जगह चने चावल पकाती हूं'
ख़ालिदा पूछती हैं कि क्या खाना-पीना छोड़ा जा सकता है? 'क्या तेल, घी या आटा-दाल छोड़ सकते हैं?'
वो कहती हैं, "मुर्गी और गोश्त तो वैसे ही पहुंच से बाहर हैं. पहले हर वक़्त ताज़ा खाना पकता था, अब कोशिश रहती है कि दोपहर का पका रात में भी चल जाए."
वो आगे कहती हैं, "पहले बिरयानी पकाती थी, अब चने-चावल पकाती हूं. यही कटौतियां हैं जो हम कर सकते हैं."
बिजली बिल के बारे में बात करते हुए वो कहती हैं, "बिजली का बिल सब पर भारी है. हम दो में से एक एसी चलाते हैं और वह भी बहुत गर्मी पड़ने पर. इसके अलावा फ़्रिज चलता है और वॉशिंग मशीन हफ़्ते में एक बार. लेकिन बिजली का बिल इस महीने 30 हज़ार का आया."
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'रिश्तेदारों के यहां जाने का मतलब पेट्रोल का ख़र्चा'
पेट्रोल के बढ़ते दाम का ज़िक्र करते हुए ख़ालिदा कहती हैं, "मर्द तो अधिकतर मोटरसाइकिल ही इस्तेमाल करते हैं. फ़ैमिली साथ हो तो हम गाड़ी इस्तेमाल करते हैं, लेकिन अब रिश्तेदारों वग़ैरह के यहां जाना बहुत ही कम हो गया है क्योंकि इसका मतलब होता है पेट्रोल का खर्चा और किसी के घर खाली हाथ भी नहीं जा सकते."
ख़ालिदा ख़्वाजा के अनुसार महंगाई इतनी बढ़ गई है कि रोज़मर्रा की ज़रूरतें ही नहीं पूरी हो पाती हैं और ऐसे में किसी इमर्जेंसी के लिए कुछ नहीं बचता.
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